हिंदू समाज अंबेडकर का ऋणी महंत अवैद्यनाथ,भेदभाव रहित मठ है गोरखनाथ
छुआछूत ने ही हिंदुत्व को किया कमजोर: जातिवाद पर प्रहार, समरसता का उद्घोष अंबेडकर के सम्मान में अवैद्यनाथ की वैचारिक क्रांति

14 अप्रैल अंबेडकर जयंती विशेष-स्लग
- डॉ. अंबेडकर का संघर्ष हिंदुत्व के विरुद्ध नहीं, बल्कि जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ था
- हिंदू समाज को डॉ. अंबेडकर का ऋणी होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने सामाजिक एकता को बनाए रखने का मार्ग चुना
- सच्चा हिंदुत्व पूजा-पद्धति में नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना में निहित
- छुआछूत भारतीय समाज का सबसे बड़ा कलंक है, जो हिंदू समाज की एकता को करता है कमजोर
- दलितों की नाराजगी का विरोध नहीं, बल्कि उसके कारणों का आत्ममंथन ही समाधान
- यदि कोई दलित योग्य है, तो उसे पुजारी बनने से रोकना धर्म के मूल सिद्धांतों के विपरीत
- आरक्षण केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में समाज का नैतिक दायित्व
- महंत अवैद्यनाथ और डॉ. अंबेडकर के विचार सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के सशक्त आधार

लखनऊ । भारतीय समाज आज जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें सामाजिक समरसता, समानता और भाईचारे के मूल्य बार-बार चुनौती के घेरे में दिखाई देते हैं। जातीय विभाजन, सामाजिक असमानता और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने समाज के ताने-बाने को कमजोर करने का कार्य किया है। ऐसे समय में गोरखनाथ मठ के पूर्व पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु, राष्ट्रसंत महंत अवैद्यनाथ के विचार न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए मार्गदर्शक भी सिद्ध होते हैं। महंत अवैद्यनाथ का व्यक्तित्व केवल धार्मिक नेतृत्व तक सीमित नहीं था, बल्कि वे सामाजिक सुधार के एक सशक्त प्रतीक भी थे। उन्होंने जीवनभर छुआछूत, जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष किया। उनके विचारों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि वे हिंदुत्व के प्रबल समर्थक होते हुए भी डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। वे स्पष्ट रूप से कहा करते थे कि अंबेडकर का संघर्ष हिंदुत्व के विरुद्ध नहीं, बल्कि हिंदू समाज में व्याप्त जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ था। महंत अवैद्यनाथ का मानना था कि यदि दलित समाज में आक्रोश है, तो उसके पीछे ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक उपेक्षा के पर्याप्त कारण हैं। वे कहते थे कि दलितों की नाराजगी को नकारना या उसका विरोध करना समाधान नहीं है, बल्कि समाज को आत्ममंथन कर उन कारणों को दूर करना चाहिए, जिन्होंने इस असंतोष को जन्म दिया। उनका यह दृष्टिकोण उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ वर्ग डॉ. अंबेडकर को हिंदुत्व विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। अवैद्यनाथ का यह भी मानना था कि हिंदू समाज को डॉ. अंबेडकर का ऋणी होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने तमाम प्रलोभनों और दबावों के बावजूद इस्लाम या ईसाई धर्म को स्वीकार नहीं किया और अंततः बौद्ध धर्म को अपनाया, जो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से ही जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार यदि अंबेडकर चाहते, तो वे करोड़ों दलितों को अन्य धर्मों में परिवर्तित कर सकते थे, जिससे भारतीय समाज की एकता पर गहरा प्रभाव पड़ता। सामाजिक समरसता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता केवल विचारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने इसे व्यवहार में भी उतारा। जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने दलित पुजारी की पहल की, तब महंत अवैद्यनाथ ने अयोध्या के संत महंत रामचंद्र दास परमहंस के सहयोग से इस विचार को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कदम सामाजिक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक संदेश था। आज जब सामाजिक समरसता का प्रश्न पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है, महंत अवैद्यनाथ और डॉ. अंबेडकर के विचारों का पुनर्पाठ अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यह केवल इतिहास की चर्चा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के भारत के निर्माण की दिशा में एक वैचारिक हस्तक्षेप है।

महंत अवैद्यनाथ हिंदुत्व की आध्यात्मिकता और सामाजिक न्याय का संगम
गोरखनाथ मठ के पूर्व पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ केवल एक धार्मिक संत नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक चेतना के प्रखर प्रवक्ता भी थे। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा हिंदुत्व केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना में निहित है। उन्होंने हिंदुत्व को एक समावेशी विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग को सम्मान और अवसर प्राप्त हो। महंत अवैद्यनाथ का मानना था कि यदि हिंदू समाज को सशक्त और संगठित बनाना है, तो सबसे पहले उसे अपने भीतर व्याप्त जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसी कुरीतियों का समूल नाश करना होगा। वे स्पष्ट शब्दों में कहते थे कि सामाजिक अन्याय के रहते किसी भी प्रकार की धार्मिक एकता संभव नहीं है।
डॉ. अंबेडकर के प्रति सम्मान वैचारिक विरोध नहीं, सामाजिक सुधार का दृष्टिकोण
डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति महंत अवैद्यनाथ का सम्मान उनके व्यापक और दूरदर्शी चिंतन को दर्शाता है। वे इस धारणा को सिरे से खारिज करते थे कि अंबेडकर हिंदुत्व के विरोधी थे। उनके अनुसार, अंबेडकर का संघर्ष हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ नहीं, बल्कि उसमें व्याप्त सामाजिक कुरीतियों विशेषकर जातिवाद और अस्पृश्यता के विरुद्ध था। अवैद्यनाथ कहा करते थे कि यदि दलित समाज में आक्रोश है, तो वह निराधार नहीं है। सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव ने इस वर्ग को गहरी पीड़ा दी है। इसलिए समाज को उनकी नाराजगी को समझते हुए आत्ममंथन करना चाहिए। यह दृष्टिकोण न केवल सहानुभूति का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
छुआछूत के विरुद्ध आजीवन संघर्ष
महंत अवैद्यनाथ ने छुआछूत को भारतीय समाज का सबसे बड़ा कलंक बताया। उनका मानना था कि यह कुरीति न केवल सामाजिक एकता को कमजोर करती है, बल्कि मानवता के मूल्यों के भी विरुद्ध है। उन्होंने विभिन्न सामाजिक अभियानों और जनजागरण कार्यक्रमों के माध्यम से इस बुराई के खिलाफ आवाज उठाई। वे अक्सर कहा करते थे कि मंदिर, जो आस्था और आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं, वहां किसी भी व्यक्ति के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना धर्म के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि यदि कोई दलित व्यक्ति योग्य है, तो वह पुजारी क्यों नहीं बन सकता? यह विचार उस समय की सामाजिक संरचना के लिए एक क्रांतिकारी चुनौती थी।
दलित पुजारी की पहल सामाजिक क्रांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम
जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने दलित पुजारी की अवधारणा को आगे बढ़ाया, तब महंत अवैद्यनाथ ने इस पहल का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने अयोध्या के संत महंत रामचंद्र दास परमहंस के सहयोग से फलाहारी बाबा को पटना के महावीर मंदिर में पुजारी के रूप में स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कदम केवल एक धार्मिक नियुक्ति नहीं था, बल्कि सामाजिक समानता और समरसता का सशक्त संदेश था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि महंत अवैद्यनाथ अपने विचारों को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उन्हें व्यवहार में भी उतारते थे।
धर्म परिवर्तन का प्रश्न और अंबेडकर का निर्णय
महंत अवैद्यनाथ का मानना था कि डॉ. अंबेडकर का बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय भारतीय समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। उनके अनुसार, अंबेडकर ने तमाम प्रलोभनों और दबावों के बावजूद इस्लाम या ईसाई धर्म को स्वीकार नहीं किया और बौद्ध धर्म को चुना, जो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से ही जुड़ा हुआ है। अवैद्यनाथ कहा करते थे कि यदि अंबेडकर चाहते, तो वे करोड़ों दलितों को अन्य धर्मों में परिवर्तित कर सकते थे, जिससे भारतीय समाज की एकता को गहरा आघात पहुंचता। इस दृष्टिकोण से वे अंबेडकर को हिंदू समाज का ऋणी मानते थे।
आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय का सशक्त माध्यम
महंत अवैद्यनाथ ने आरक्षण व्यवस्था को सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करने का एक प्रभावी साधन माना। उनका विश्वास था कि यह नीति दलितों और पिछड़े वर्गों को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा के अवसर प्रदान करती है, जिससे वे मुख्यधारा में शामिल हो सकते हैं। वे यह भी मानते थे कि आरक्षण केवल एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक नैतिक दायित्व है। इससे समाज में संतुलन और समानता स्थापित करने में सहायता मिलती है।
गोरखनाथ मठ सामाजिक समरसता का केंद्र
गोरखनाथ मठ ने महंत अवैद्यनाथ के नेतृत्व में सामाजिक समरसता और जनसेवा के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। मठ ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने का प्रयास किया। यह परंपरा आज भी योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है। आज के समय में, जब जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण की प्रवृत्तियां समाज को विभाजित कर रही हैं, महंत अवैद्यनाथ और डॉ. अंबेडकर के विचार अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं। उनका संदेश स्पष्ट है कि सामाजिक समरसता और समानता के बिना किसी भी राष्ट्र की प्रगति संभव नहीं है।
* महंत अवेद्यनाथ ने डॉ. अंबेडकर को हिंदू समाज का “ऋणी” बताया।
* उनका मानना था कि अंबेडकर का संघर्ष हिंदुत्व नहीं, बल्कि जातिवाद के विरुद्ध था।
* छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ उन्होंने सामाजिक आंदोलन चलाए।
* दलितों के मंदिर प्रवेश और पुजारी बनने के अधिकार का समर्थन किया।
* बौद्ध धर्म को भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का अंग बताया।
* आरक्षण व्यवस्था को सामाजिक न्याय का प्रभावी साधन माना।
* गोरखनाथ मठ ने सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
* वर्तमान सामाजिक चुनौतियों के संदर्भ में उनके विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं।



