
* कोयला घोटाले में आईपैक के डायरेक्टर विनेश चंदेल अरेस्ट, ईडी कोर्ट ने दी 10 दिन की कस्टडी
* राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान- चुनाव के दौरान ईडी के कदम से भाजपा को नुकसान
* भाजपा की रैलियों में लोग आ नहीं रहे, गारंटियों पर भरोसा नहीं
* हिमंता की तरह ममता को बदनाम करना चाहती है भाजपा
* बंगाल में 23 अप्रैल को वोटिंग का पहला चरण
काव्या सिंह कोलकाता। पश्चिम बंगाल के चुनाव में अब कुछ दिन बाकी हैं और इस बीच प्रवर्तन निदेशालय, यानी ईडी ने कोयला तस्करी मामले में इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपीएसी) के निदेशक विनेश चंदेल को गिरफ्तार कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा काम किया है।
राजनीतिक पंडितों के अनुसार, बंगाल चुनाव में दो-तिहाई बहुमत से जीत का अगर भाजपा का दावा ठीक है तो वह विनेश चंदेल को चुनाव के बाद भी अरेस्ट कर सकती थी। इससे पार्टी को मौजूदा सीएम ममता बनर्जी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को साबित करने में आसानी होती। लेकिन चुनाव के दौरान मतदान से पहले हुई इस गिरफ्तारी ने भाजपा के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। इससे यह तकरीबन साफ हो गया है कि बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी ही चुनाव जीत रही है।

गिरफ्तारी की टाइिमंग पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि भाजपा को इस बात का डर है कि अगर ममता बनर्जी की पार्टी चुनाव जीत गईं तो उनके लिए आईपैक पर कार्रवाई करना मुश्किल होगा और फिर इसका कोई सियासी फायदा भी नहीं मिलेगा। ऐसे में भाजपा के लिए बेहतर होगा कि चुनाव में इस राजनीतिक मुद्दे को भुनाया जाए। उधर, तृणमूल सूत्रों के अनुसार, भाजपा ने यह कदम बेहद हताशा में उठाया है, क्योंकि पार्टी को अपनी रैलियों और चुनावी सभाओं में वोटरो का इस कदर रुझान नहीं मिल रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण राज्य में SIR को लेकर लोगों का भारी गुस्सा है। भाजपा को जमीनी स्तर पर इसका सामना करने में दिक्कत आ रही है। आपको बता दें कि बंगाल के SIR में चुनाव आयोग ने 91 लाख लोगों के मतदान का अधिकार खत्म कर दिया है। यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है। दूसरी अहम बात यह है कि आईपैक के मामले को उठाकर भाजपा सीएम ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा सकती है, क्योंकि यह मामला कोयला तस्करी से जुड़ा है। आईपैक वर्ष 2021 से तृणमूल कांग्रेस और बंगाल सरकार को राजनीतिक परामर्श सेवाएं दे रही है। इससे पहले आठ जनवरी को भी जांच एजेंसी ने इस मामले में आइपैक के दफ्तर और इसके संस्थापक व निदेशक प्रतीक जैन के कोलकाता स्थित आवास पर छापे मारे थे। इस दौरान विवाद उस वक्त बढ़ गया जब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंच गईं।
अब तक की जांच में क्या मिला?
ईडी के मुताबिक अब तक की गई जांच में वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग के साथ ही हिसाब-किताब और बिना हिसाब-किताब वाले फंड के मिलने, बिना किसी व्यावसायिक प्रमाण पत्र के असुरक्षित ऋण प्राप्त करना, फर्जी बिल और चालान जारी करना, तीसरे पक्ष से धन प्राप्त करना और अंतरराष्ट्रीय हवाला सहित हवाला चैनलों के माध्यम से नकदी का लेन-देन शामिल है। प्रवर्तन निदेशालय ने मंगलवार को दावा किया कि इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपीएसी) के ठिकानों पर मारे गए छापों के दौरान बरामद दस्तावेजी सबूत एक राजनीतिक दल के कार्यालय में भी मिले हैं। ईडी की रिमांड कॉपी के अनुसार यह भी आरोप लगाया गया है कि तलाशी के तुरंत बाद आईपीएसी कर्मचारियों के खातों से संवेदनशील ईमेल हटा दिए गए थे। इससे पहले दिल्ली की एक अदालत ने कथित कोयला तस्करी मामले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के संबंध में आईपीएसी के निदेशक विनेश चंदेल को 10 दिनों के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की हिरासत में भेज दिया।
यह है पूरा मामला
ईडी का यह मामला नवंबर 2020 में सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। इसमें बंगाल के आसनसोल के कुनुस्तोरिया और काजोरा इलाकों में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की खदानों से जुड़े बहु-करोड़ रुपये की कोयला तस्करी का आरोप लगाया गया था। ईडी के अनुसार, कोयला तस्करी नेटवर्क से जुड़े एक हवाला आपरेटर ने करोड़ों रुपये के लेनदेन को आईपैक की पंजीकृत कंपनी इंडियन पीएसी कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड तक पहुंचाया। एजेंसी का दावा है कि आईपैक उन संस्थाओं में शामिल है, जिन्हें इन हवाला फंड्स से जोड़ा गया है। जांच एजेंसी पहले यह भी दावा कर चुकी है कि बंगाल में कथित कोयला तस्करी से जुटाए गए करीब 20 करोड़ रुपये आइपैक तक पहुंचाए गए थे। ये रकम मुंबई की एक फर्म के जरिए ट्रांसफर की गई, जो दिल्ली शराब नीति मामले की जांच के दौरान भी एजेंसी के रडार पर आई थी।
बंगाल में बाहरी वि. बंगाली का मूड
राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में इस बार आम जनता का मूड बाहरी विरुद्ध बंगाली या मूल निवासी है। भाजपा ने बाहरी के मसले को तूल देने के लिए राज्य में चुनाव आयोग की मदद से SIR करवाया, लेकिन वोट कटने के बाद दोबारा यही मुद्दा पलटकर भाजपा की फांस बन चुका है। जिनके वोट कटे, वे अब तमाम कागजातों के साथ खुद के मूल निवासी होने का दावा करते हुए भाजपा के खिलाफ हो गए हैं। वहीं, जिनके वोट नहीं कटे वे ममता बनर्जी को इसका क्रेडिट दे रहे हैं। उन्हें भाजपा की गारंटी का भरोसा नहीं हो रहा है। यही कारण है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के तमाम बड़े नेताअसें को चुनावी रैलियों में भीड़ बुलानी पड़ रही है। लोग अपनी मर्जी से नहीं आ रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा को अब जीत दूर दिखाई दे रही है। तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि जिस तरह से असम में कांग्रेस ने सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ मतदान से चंद दिन पहले मोर्चा खोलकर बाजी पलटने की कोशिश की, ठीक उसी तरह का नैरेटिव पार्टी ममता बनर्जी के खिलाफ भी खड़ा करना चाहती है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आईपैक के खिलाफ भाजपा की कार्रवाई को अब राज्य के लोग समझ चुके हैं और ऐसे में इसका संदेश वोटरों में यही जाएगा कि हार की हताशा में भाजपा ने सेल्फ गोल कर दिया है।
उत्तर बंगाल होगा निर्णायक
उत्तर बंगाल को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। वह वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से ही इलाके में लगातार बेहतर प्रदर्शन करती रही है। लेकिन इस बार असम से सटे कुछ इलाकों में भारी गुटबाजी के कारण उसकी स्थिति कुछ कमजोर हुई है। पहले चरण में जिन इलाकों में मतदान होना है उनमें उत्तर बंगाल की सीटें भी शामिल हैं। ममता बनर्जी भी जानती हैं कि तृणमूल कांग्रेस वहां कमजोर है। इसी वजह से उन्होंने अपने चुनाव अभियान ही उत्तर बंगाल से शुरू किया है। वो अब तक एक दर्जन से ज्यादा चुनावी रैलियों को संबोधित कर चुकी हैं। अपने तमाम भाषण में वो भाजपा के संकल्प पत्र में किए गए वादों को हवा-हवाई बताते हुए कहती रही हैं कि चुनाव बाद कोई भी नेता बंगाल में नजर नहीं आएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में अब पारंपरिक मुद्दे वोटरों को प्रभावित नहीं करते। रोजमर्रा के जीवन में महंगाई, रसोई गैस की किल्लत और एसआईआर के दौरान कटे नाम ही उनके लिए ज्यादा अहम हैं।




