
– गुस्से में की गई बंपर वोटिंग से किसे फायदा? दूसरे चरण की 142 सीटों पर क्या खेला होगा? जानिए रिकॉर्ड मतदान के जमीनी नतीजे
– बंगाल के वोटरों का गुस्सा करीब 93 फीसदी वोटिंग में बदला
– भाजपा बोलीं- बंपर वोटिंग ममता सरकार के खिलाफ, तृणमूल का दावा- वोटरों के गुस्से से भाजपा का सूपड़ा साफ
– क्या अभिषेक के एक मैसेज ने बंगाल का सियासी खेल बदल दिया?
– क्या एक बार और सत्ता में वापसी के बाद ममता बनर्जी दिल्ली के तख्त पर दावा पेश करेंगी?
– 4 मई को नतीजे से पहले अचूक संघर्ष में पाएं सारे सवालों के जवाब
देवयानी मजूमदार कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गुरुवार को 152 सीटों पर हुए मतदान में बंपर वोटिंग हुई। चुनाव आयोग के ताजा आंकड़े 93 फीसदी वोटिंग की बात कर रहे हैं। लेकिन आंकड़ों की समीक्षा के बाद ये 95 प्रतिशत या उससे अधिक भी हो सकते हैं। यह बंगाल का अभी तक का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत है।
वहीं, तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर 85.13% वोटिंग हुई। दोनों राज्यों में आजादी के बाद अब तक सबसे ज्यादा वोटिंग हुई है। इससे पहले तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मतदान 2011 में 78.29% था, जबकि बंगाल में 2011 में 84.72% मतदान दर्ज किया गया था। बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने वोटिंग के बाद कहा- बंगाल की जनता ने SIR के खिलाफ बंपर वोटिंग की है। गृह मंत्री शाह ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस का सूरज ढल चुका है।

भाजपा के गढ़ में बंपर वोटिंग का मतलब क्या?
पहले चरण के तहत 16 जिलों में 44,376 बूथों पर लगभग 3.6 करोड़ मतदाता थे। चुनाव आयोग के मुताबिक, पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुरा और झाड़ग्राम जैसे जिलों में सबसे अधिक मतदान दर्ज किया गया, जबकि कुछ क्षेत्रों में ईवीएम की खराबी और छोटी-मोटी घटनाओं की सूचना भी मिली। कुल मिलाकर मतदान शांतिपूर्ण रहा, हालांकि मुर्शिदाबाद समेत कुछ जगहों पर हिंसा की अलग-अलग घटनाएं सामने आईं।
अब आते हैं बंपर वोटिंग के कारणों पर
सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि बंगाल में गुरुवार को जिन 16 जिलों में वोट पड़े, वे भाजपा के मजबूत किले की तरह थे। इन 152 सीटों में भाजपा ने 59 सीटें 2021 में जीती थीं। ऐसे में उत्तर बंगाल की दार्जिलिंग से सटी पहाड़ियों की बात करें या फिर गोरखाओं की आबादी वाले सिलिगुड़ी और कलिम्पोंग जैसे इलाकों की, जहां गोरखाओं को रिझाने के लिए भाजपा ने सत्ता में आते ही अलग गोरखालैंड की मांग का समाधान करने का ऐलान किया है। उसी तरह मेदिनीपुर का इलाका, जहां 2021 में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया था। दक्षिणी दिनाजपुर में करीब 94 फीसदी वोटिंग हुई। दक्षिण दिनाजपुर में कुल 6 विधानसभा सीटें आती हैं, जहां मुसलमानों की आबादी लगभग 25 प्रतिशत है और हिंदुओं की आबादी 73.5 प्रतिशत है। यानी जिन सीटों पर हिन्दू वोटर्स निर्णायक हैं, उस जिले में सबसे ज्यादा मतदान हुआ है। कूचबिहार जिले में 94 प्रतिशत मतदान हुआ है, बीरभूम में 93.2 प्रतिशत, जलपाईगुड़ी में 92.7 प्रतिशत और मुर्शिदाबाद ज़िले में भी लगभग इतना ही 92.7 प्रतिशत मतदान हुआ है। मुर्शिदाबाद में पश्चिम बंगाल की 22 विधानसभा सीटें आती हैं. और इस जिले में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। यहां मुसलमानों की आबादी 65 प्रतिशत से ज्यादा है जबकि हिन्दुओं की आबादी सिर्फ 33 प्रतिशत है।
वोट नहीं दोगे तो भाजपा नाम काट देगी
ज्यादा वोटिंग के कारणों के बारे में राजनीतिक विश्लेषणकर्ता कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व ने मतदान से एक सप्ताह पहले अपने कैडरों के जरिए बूथ स्तर पर वोटरों को यह सेदश भिजवाया था कि अगर वोट नहीं डालोगे तो भाजपा तुम्हारे वोट काट देगी। सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग के माध्यम से लोगों में SIR का जो डर फैलाया था, उसका टीएमसी ने बहुत ही चतुराई से बेहतरीन उपयोग किया और वोटरों में यह संदेश भिजवा दिया कि वोट काटने के पीछे भाजपा ही है। इसका नतीजा यह हुआ कि वोटरों ने भाजपा के खिलाफ थोकबंद वोटिंग की।
काम आया अभिषेक फैक्टर
इस बार के बंगाल चुनाव के दौरान पहले ही यह माना जा रहा था कि सीएम ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को कोई ऐसा टास्क देंगी, जिससे यह साबित हो कि वे बंगाल की गद्दी संभावलने लायक हैं। बताया जाता है कि ममता ने बंगाल के पहले चरण के चुनाव में अभिषेक को 152 सीटों पर बूथ स्तर तक के प्रबंधन की खूली छूट दी थी। ठीक वैसे ही जैसे भाजपा नेतृत्व ने गृह मंत्री अमित शाह को इस बार बंगाल के पूरे चुनाव में अपने स्तर पर रणनीति बनाने की खुली छूट दी थी। तृणमूल कांग्रेस के एक बेहद जानकार नेता का कहना है कि बंगाल के वोटरों को एक संदेश के जरिए थोकबंद वोटिंग करवाने की रणनीति असल में अभिषेक के दिमाग की ही उपज थी। ऐसा माना जा रहा है कि बीते 15 साल से बंगाल की सत्ता संभाल रहीं सीएम ममता बनर्जी अपने भतीजे को कुर्सी सौंपकर अब दिल्ली की राजनीति में उतरना चाहती हैं। अगर पहले दौर की 152 सीटों पर चुनाव के नतीजे तृणमूल पार्टी के पक्ष में आते हैं तो ममता के लिए बेफिक्र होकर अभिषेक को बंगाल की सत्ता सौंपना आसान होगा।
अत्मसम्मान के लिए निकलीं महिला वोटर्स?
बंगाल में पहले चरण के चुनाव में गुरुवार को सुबह 7 बजे से वोटिंग शुरू हुई, लेकिन मतदान केंद्रों पर सुबह 4 बजे से ही मतदाताओं की कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। इनमें महिला वोटर्स की संख्या आधी से ज्यादा थी। इसी से यह अंदाजा लग गया था कि इस बार की वोटिंग में महिला वोटर्स की संख्या ज्यादा होगी। इसके दो कारण बताए जा रहे थे- एक ममता बनर्जी की लक्ष्मी भंडार योजना, जिसमें इस बार 500 रुपए बढ़ाने का वादा किया गया था, वहीं भाजपा की महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए देने की स्कीम। लेकिन एक तीसरा फैक्टर भी था, जिसे अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों ने अनदेखा कर दिया। वह रहा, महिलाओं के आत्मस्वाभिमान, गरिमा और आजादी। इन तीनों ही बातों में बंगाल का रिकॉर्ड ममता बनर्जी के राज में बढ़िया है। माना जा रहा है कि शुरू के तीन फैक्टर पर आखिरी का फैक्टर भारी पड़ा और भाजपा के कथित महिला विरोधी प्रचार से नाराज होकर महिला वोटर्स इतनी बड़ी संख्या में गुस्से के कारण निकलीं।
वोटरों ने SIR के नुकसान की भरपाई कर दी
बंगाल के करीब 12 फीसदी वोट SIR की प्रक्रिया में कट गए। बाद में जिन 27 लाख वोटरों ने अपीलीय ट्रिब्यूनलों के सामने तमाम कागजातों के साथ वोटर होने का दावा पेश किया, उनमें से भी केवल 136 लोगों को ही मताधिकार हासिल हो पाया। इसका नुकसान ममता की तृणमूल पार्टी को जरूर हुआ। लेकिन इस करीब डेढ़ फीसदी के नुकसान की बंपर वोटिंग में भरपाई हो गई। SIR की प्रक्रिया में भाजपा की कोशिश यह थी कि पहले चरण में जिन सीटों पर तृणमूल और भाजपा के बीच हार-जीत का अंतर 5 से 10 हजार और 10-20 हजार वोटों का है, वहां पर टीएमसी के वोट कटने से भाजपा को सीधे तौर पर फायदा हो और भाजपा उत्तर बंगाल, खासकर मेदिनीपुर के हिस्से में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल कर सके। भाजपा को पहले चरण के चुनाव में उत्तर बंगाल से 90 से अधिक सीटें जीतने का टारगेट था। लेकिन बंपर वोटिंग ने लगता है उसे भी घ्वस्त कर दिया है।
लोगों ने बेखौफ होकर वोट डाला
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 77 सीटों पर सिमट गई थी। तब हिंसा और डर एक निर्णायक फैक्टर माना गया। लेकिन 2026 के इस पहले चरण ने यह साफ दिखा दिया कि आम जनता ने भयमुक्त होकर बेखौफ वोट डाला है। भाजपा को इस कदर वोटिंग की उम्मीद नहीं थी, जो SIR प्रक्रिया से सत्ताधारी दल को हुए नुकसान को भी फेल कर दे। अब अगले चरण की 142 सीटों में से भाजपा ने 78 सीटें जीतने का टारगेट रखा है। पिछले चुनाव में उसने 18 सीटें जीती थीं। अंतिम चरण का चुनाव 29 अप्रैल को होना है। इस एक सप्ताह के समय में बंगाल के वोटरों का जनादेश अब बदलने वाला नहीं है। अंतिम चरण ममता बनर्जी के गढ़ में होगा। वहां भी अगर वोटरों का रुझान इसी तरह का रिकार्डतोड़ रहा तो भाजपा को दोनों चरणों में अपना टारगेट पार करने के लिए नामुमकिन सी लड़ाई जीतनी पड़ेगी। बंगाल में खेला किसके पक्ष में होगा, यह 4 मई के नतीजे ही तय करेंगे।




