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क्यो न माना जाए बच्चों की मौत का सीएम योगी,व डीजी फायर सुजीत पांडेय ही नैतिक जिम्मेदार,निकम्मी हो चुकी है योगी सरकार

लखनऊ कोचिंग अग्निकांड

  • यूपी में बसने की ख्‍वाहिश है? चंदन, लकड़ी, राल लेते आना
  • अवैध इमारतों के नीचे दबता यूपी, फोटो पर माला चढाने का वक्‍त
  • कानपुर-वाराणसी: नोटिसों के जंगल में फलता अवैध साम्राज्य
  • गोरखपुर-प्रयागराज: बुलडोजर से तेज भागता निर्माण माफिया
  • जनप्रतिनिधि जब अफसर बिक जाएं, तो शहर जलते हैं

 

कुमार सौवीर लखनऊ। उत्तर प्रदेश के महानगरों में अवैध निर्माण अब महज नगर नियोजन का संकट नहीं रह गया है। यह सीधे-सीधे लोगों की जान लेने वाली ऐसी संगठित आपराधिक व्यवस्था बन चुका है, जिसके केंद्र में बिल्डर माफिया, भ्रष्ट अफसर और राजनीतिक संरक्षण की त्रयी बैठी हुई है। राजधानी लखनऊ से लेकर कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज और बरेली तक विकास प्राधिकरणों की फाइलों में हजारों अवैध निर्माण दर्ज हैं, लेकिन जमीन पर वे सीना तानकर खड़े हैं। सवाल यह है कि जब नक्शा पास नहीं था, फायर एनओसी नहीं थी, निर्माण मानकों का पालन नहीं हुआ, तब ये इमारतें आखिर बनी कैसे? और अगर बनीं, तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकारी दफ्तरों में बैठे लोगों ने आंखें ही नहीं मूंदी थीं, बल्कि कीमत लेकर आंखें बंद रखी थीं?
इस सवाल का सबसे भयावह उत्तर रविवार को लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया इलाके में मिला। आवासीय इलाके में खड़ी एक तिमंजिला इमारत, जिसमें कोचिंग सेंटर, गेमिंग जोन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थीं, आग की लपटों में घिर गई। देखते ही देखते 15 युवाओं की जिंदगी समाप्त हो गई। अधिकांश वे छात्र थे, जो अपने सपनों को आकार देने के लिए वहां पहुंचे थे। लेकिन उन सपनों से पहले ही भ्रष्टाचार ने उनकी मौत का नक्शा तैयार कर दिया था। सबसे भयावह तथ्य यह है कि इस इमारत के खिलाफ वर्षों पहले कार्रवाई का आदेश दिया गया था। ध्वस्तीकरण की तलवार भी चली, मगर कुछ ही समय बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। आखिर किसके दबाव में? किसकी जेब गर्म हुई? किन अफसरों ने अपनी जिम्मेदारी को रिश्वत की मेज पर गिरवी रख दिया? यह सवाल अब केवल प्रशासनिक नहीं, आपराधिक जांच का विषय है।
यह पहली बार नहीं है। 12 अप्रैल 2018 को भी लखनऊ में एक भीषण अग्निकांड ने कई परिवारों को तबाह किया था। हर हादसे के बाद जांच बैठती है, मुआवजा घोषित होता है, कुछ अधिकारियों का तबादला हो जाता है, लेकिन अवैध निर्माण का कारोबार पहले से अधिक ताकत के साथ लौट आता है। इसका अर्थ साफ है कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि कानून लागू करने वालों की नीयत की है।
राजधानी की हालत ऐसी है कि हजारों आवासीय भवनों में खुलेआम बैंक्वेट हॉल, रेस्तरां, कोचिंग सेंटर और व्यवसायिक प्रतिष्ठान चल रहे हैं। विकास प्राधिकरण नोटिस भेजता है, लेकिन कार्रवाई वहां जाकर रुक जाती है, जहां से प्रभाव और पैसा शुरू होता है। यही कहानी कानपुर की है। औद्योगिक नगरी में अवैध प्लॉटिंग, बिना अनुमति के बहुमंजिला निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी आम बात हो चुकी है। एक ओर बुलडोजर की तस्वीरें जारी होती हैं, दूसरी ओर उन्हीं क्षेत्रों में नए अवैध निर्माण उग आते हैं। इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि अवैध निर्माण माफिया की जड़ें प्रशासन के भीतर तक फैली हुई हैं।
वाराणसी की तस्वीर और भी विडंबनापूर्ण है। एक ओर गंगा और वरुणा के संरक्षण की बात होती है, दूसरी ओर नदी किनारे हरित पट्टी और प्रतिबंधित क्षेत्रों में अवैध निर्माण लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हजारों निर्माण चिन्हित हुए, लेकिन कार्रवाई मुट्ठीभर पर ही सीमित रही। बाकी सब व्यवस्था की मिलीभगत के संरक्षण में फलते-फूलते रहे। धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का शहर धीरे-धीरे कंक्रीट के ऐसे जंगल में बदलता जा रहा है, जहां कानून की जगह संपर्क और पैसे का राज है।
गोरखपुर और प्रयागराज भी इससे अछूते नहीं हैं। गोरखपुर में बिना मास्टर प्लान के कॉलोनियां बस गईं, डूब क्षेत्रों में निर्माण हो गए, और बाढ़ के खतरे को नजरअंदाज कर व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े कर दिए गए। प्रयागराज में संगम क्षेत्र तक अवैध निर्माण की छाया पहुंच चुकी है। बुलडोजर चलते हैं, लेकिन उनके पीछे नए निर्माण शुरू हो जाते हैं। यह चूहे-बिल्ली का खेल नहीं, बल्कि प्रशासन और माफिया के बीच वर्षों से चली आ रही ऐसी सांठगांठ है, जिसकी कीमत आम लोग अपनी जान देकर चुका रहे हैं।
योगी सरकार ने बुलडोजर नीति को अपनी पहचान बनाया है। लेकिन पुरनिया जैसी घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि बुलडोजर आखिर चलता कब है? हादसे से पहले या हादसे के बाद? अगर अवैध इमारतें वर्षों तक फलती-फूलती रहें और प्रशासन केवल त्रासदी के बाद सक्रिय हो, तो यह कार्रवाई नहीं, बल्कि अपराध के बाद की रस्मअदायगी कही जाएगी।
सच तो यह है कि अवैध निर्माण की हर इमारत ईंट, गारे और सीमेंट से नहीं बनती। उसमें भ्रष्टाचार की मोटी परतें लगी होती हैं। उसमें रिश्वत की सरिया डाली जाती है। उसमें राजनीतिक संरक्षण की छत डाली जाती है। और जब ऐसी इमारतें जलती हैं या गिरती हैं, तो केवल दीवारें नहीं ढहतीं, बल्कि शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता भी मलबे में बदल जाती है।
पुरनिया की आग केवल एक हादसा नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की शहरी व्यवस्था पर लगा वह दाग है, जो पूछ रहा है—आखिर और कितनी मौतों के बाद अफसरों की जवाबदेही तय होगी? और क्या कभी ऐसा दिन आएगा, जब अवैध निर्माण कराने वाले ही नहीं, उन्हें संरक्षण देने वाले अफसर भी उसी कठघरे में खड़े दिखाई देंगे, जहां आज पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहे हैं?

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