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कॉकरोच जनता पार्टी ने देश के मूल भूत मुद्दों को उठाया,ये बात मोदी को रास न आया

आखिर कब मोदी सरकार मनमानी करती रहेगी

दिल्ली/अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर हालिया जंतर मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन ने शिक्षा व्यवस्था की अनिमियताओ लापरवाहियों की सभी परतें खोल दी। मुख्य न्यायाधीश की सुनवाई के दौरान फर्जी वकीलों के संदर्भ में की गई टिप्पणी को जिस तरह हताश युवा पीढ़ी ने सोशल मीडिया द्वारा तर्क कुतर्क से आग लगाई।न्यायाधीश जी की स्पष्टीकरण के बावजूद भी आग रुकने के बजाय प्रचंड हो गई। किसी ने युवाओं की वास्तविक सामूहिक चेतना कहा तो, कहीं राष्ट्र विरोधी षड्यंत्र अवसरवादिता की नीति विदेशी तत्वों की साजिशो की सुगबुहाट हुई। लेकिन युवाओं का क्रोध बनावटी नहीं बल्कि बल्कि लगातार पेपर लीक धांधली नियुक्त से लेकर कोर्ट की लंबी लड़ाइयां हताशा से स्वचालित पैदा क्रोध था। यह किसी दक्षिणपंथी पूंजीवादी समाजवादी की किताबों से प्रेरित नहीं था ।ग्रामीण अंचल और मध्य युवा से मध्य युवा शहरी वर्ग के विद्यार्थी जो लगातार प्रयागराज दिल्ली के मुखर्जी नगर में सत्रह,अठारह घंटे के बाद दिन-रात एक करके एक नौकरी का सपना देखते हैं। एक तरफ आकाश सी ऊंची उम्मीदें दूसरी तरफ पाताल से गहरी लंबित अटकी ढुलमुल नीतियों की भेंट चढ़ती सरकारी भर्ती
विद्रोही युवा की चीखें अब अप्रत्याशित नहीं बल्कि हाथ में लिए कीपैड से हंसते-हंसते रोता है आत्म सम्मान को ठेस लगे फिर भी मीमस और रील्स से व्यंग समाज देश को सच का आईना युवा दिखता है ।इतिहास गवाह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेट ट्रोलिंग ट्रंप के पहले कार्यकाल की ख्याति में भूमिका को सभी ने स्वीकार किया।
चाहे इटली का फाइव स्टार मूवमेंट हो या साउथ कोरिया का युवा
आज के समय में तथ्य और आख्यान तक विमर्श की राजनीति हो रही है।
महज आरक्षण खत्म होगा तथ्य नहीं था पिछले चुनाव में एक भ्रामक रूपरेखा तैयार कर मुद्दा बना के सत्ता पार्टी को बैसाखी के सहारे ले आई।

सत्य क्या तथ्य क्या डिजिटल क्रांति ने सब बदल दिया।

डिजिटल क्रांति में आने के बाद प्रिंट इलेक्ट्रिक प्रिंट इलेक्ट्रानिक सोशल मीडिया सब एक ही हो गए हैं ।तीर कमान से निकला तो फिर निकल ही गया चाहे कुछ भी हो स्पष्टीकरण दें। हर हाथ में फोन रील,मीम्स ने अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई की आड़ में तिल का ताड़ ,तर्क कुतर्क सृजन विध्वंस को बहुत ही सहज बना दिया है ।कॉकरोच पार्टी का अविविश्वास केवल सत्ता पक्ष पर ही नहीं विपक्ष पर भी है ।तभी दूर विदेश बैठे अभिजीत के उद्देश्य पर संदेह लाजमी होगा ।लेकिन इस युवा पार्टी ने घोषित घोषणापत्र में जो शर्तें रखी हैं। करिश्माई नेतृत्व से नीतिगत रणनीतिक फैसला लेगी तो या सोशल मीडिया के शोर शराबे में सिमट के खो जाएगी ।कुछ भविष्य में क्या होगा पता नही।
दूर विदेश बैठे अभिजीत के उद्देश्य पर संदेह लाजमी है। लेकिन समूचे युवाओं ने जो घोषणा पत्र में घोषणाएं रखी है। उन पर सतही तौर पर काबिले तारीफ है। रणनीत से नीतिगत ।1974 बिहार में जे जेपी आंदोलन , इमरजेंसी के दौरान , मंडल आयोग का आंदोलन ,तो कहीं अन्ना आंदोलन मैं ही अन्ना हूं जिसने राजनीतिक दलों को सुधारो के लिए मजबूर कर दिया था एवं नए राजनीतिक दलों का सृजन किया था ।अभी बिना पंजीकृत पार्टी की मांग को विश्वनीयता को नकारा नहीं जा सकता है ।हमारे नीति नियंत्रण थिंक टैंक को गौर करना होगा कि करोड़ों फॉलोअर्स से आधे से सच्चे होंगे तो भी एक करोड़ फॉलोअर्स किन्ही कारणों से दूर गर्मी प्रशासन के भय से जंतर मंतर नहीं पहुंचे मानते हैं लेकिन सच्चाई को स्वीकार करने में भी संकोच न करें। भारतीय युवा विद्रोही होकर अपनी आवाज सत्ता आम जनमानस शासन तक पहुंचने में सफल रहे हैं ।लाखों की सैलरी पाने वाले मीडिया एंकरों को आवश्यक मुद्दों से दूर होकर पत्रकारिता से वर्ग विशेष किसी को खुश करने में लगे उनकी संपत्ति निष्पक्ष जांच स्वतंतत्र निष्पक्ष आवाज बने जो समयानुसार जायज मांग है ।

दल बदलू राजनीति व्यक्तियों की भेट चढ़ता हमारा जरूरी मुद्दे ।

हमारे माननीय जो सुबह एक पार्टी में तो शाम को दूसरे पार्टी में नारे देते दिखाई पड़ते हैं। जो काम राजनीतिक राजनीतिक सदन से अपेक्षित था वह युवा पार्टी के कर्णधारों ने आईना दिखाया ।
तीसरी मांग विश्वविद्यालय के छात्र अध्यक्ष नेता जो सत्ता पक्ष या राजनीतिक महत्वाकांक्षा से दबे मुद्दे नहीं उठा पाए । उनके आवश्यक मुद्दे उनका दुख दर्द इस युवाओं ने उठाई।
चौथी मांग लगातार सेवानिवृत न्यायाधीशों को राज्यसभा में जाना न्यायिक निस्पक्षता और स्वतंत्रता पर संदेह पैदा करता था ।भारतीय जनतंत्र कार्यपालिका विधायिका न्यायपालिका की स्वतंत्रता वैधानिक कार्यक्रम पर उंगली उठ रही थी ।युवाओं ने भारतीय लोकतंत्र के दुखती नब्ज अनसुलझे सुलगते सवाल को एक मंच दिया ।गैर निर्वाचित सत्ता और विदेशी लाभ भी सभी को एकतरफ दरकिनार सभी को निष्पक्ष सिर्फ एक सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करे।
हम बड़े बौद्धिक वैश्विक आर्थिक मंदी में असुरक्षित युवाओं को समझने में कैसे असफल सफल हो गए ।
संवाद से समाधान की डोर कैसे टूटी ? मात्र डिग्री शैक्षिक योग्यता बाजार की स्पर्धा में हम युवाओं से संवाद क्यों नहीं कर पाए ?कई बार नई पीढ़ी का खानपान रहन-सहन पहचान जीवन शैली संस्कृत ताने बाने में नहीं खाते हैं !कुछ राष्ट्रद्रोही लोग ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर युवाओं को भ्रमित करने में लगे ऐसे में स्वामी विवेकानंद के चिंतन शैली याद आती है। युवाओं की अथाह रचनात्मक तथा सामर्थ्य के प्रति वे आग्रही तथा उत्साही थे ।विवेकानंद जी ने हमेशा युवाओं की क्षमता और निष्ठा पर विश्वास किया था। भविष्य के गर्तमें समाहित उनके अंतर दृष्टि से कुछ भी अछूता नहीं था स्वामी दयानंद विवेकानंद जैसे दृष्टिकोण सकारात्मक नजरिया रखते तो शायद आज भारतीय युवा स्वयं को छला पीड़ित और कुंठित भटका हुआ ना महसूस करता ।युवाओं के पास आदर्श तो बहुत है नेतृत्व करने वाले लीडर की जरूरत है ।बस जब अठारह साल का युवा वोट करता है नेतृत्व करने वाले लेकिन उसके 80 साल का राजनेता । राजनीतिक असंतोष नीति नियंत्रण द्वारा वातानुकूलित कमरों में ऊंची इमारत में बैठे वास्तविकता से दूर नीति बनाना सब कारण है । समाज का डर, प्रशासन का डर ,पुलिस का डर इन सबको युवाओं ने या तो इतना डरपोक या तो अत्यधिक विद्रोही बना दिया है वही इस व्यवस्था के कुचक्र के अभिमन्यु है वही अर्जुन है ।सारी दुनिया भारत को देख रही हैआधी से ज्यादा आबादी युवा वर्ग जो देश जो देश का प्रतिनिधित्व करता है उसने अन्ना आंदोलन दामिनी का दर्द से लेकर का और शाहीन बाग के विरोध में उसके बाद बंद होने वाली दुकान व्यापार और ठप होती आम लोगों की जिंदगी ।दिल्ली दंगे और तिरंगे का अपमान कोई भूला नहीं है ।क्या हमारे युवा पीढ़ी में जेलेंस्की को नहीं देखा नोबेल शांति विजेता यूनुस खान और जनेररेशन जेड का इस्तेमाल कर प्रधानमंत्री बने बालेन शाह को भी नहीं देखा ।अपने ही देश में भारतीय जनतंत्र की झूठ लुभावने और बूढ़े अन्ना जी को धोखा देकर दिल्ली पर दो कार्यकाल तक राज करने वाले केजरीवाल के किस्से कैसे भूले ।

युवा पीढ़ी के क्रोध आवेश को सकारात्मक ढंग से वार्ता संवाद से समस्या को सुलझाएं

अन्यथा राष्ट्र विरोधी युवाओं की सीढ़ी के रास्ते सत्ता तक पहुंचने में स्वप्न सरकार में ज्यादा मुश्किल ना होगी। क्या युवा पीढ़ी के आक्रोश को अधिक भ्रमित कर अवसरवादिता की राजनीति करने वाले नए सियासी मंसूबे की फिराक में तो नहीं है। क्या पड़ोसी देशों से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जो भयावह घटित हुआ है कहीं उसी का आगाज तो नहीं है किसी भी जलती हुई बसें, टूटे हुए बैरिकेट्स ,सड़क पर मचे हंगामों से नहीं, युवाओं को उनके नजरिए से समझना होगा ।युवाओं के क्रोध को पत्थरों पेट्रोल पंप या सार्वजनिक संपत्तियों को क्षति पहुंचाने में नहीं उनको राष्ट्र के निर्माण में लगाना होगा। युवाओं को संवेदनाओं को महत्व दें सुने नहीं तो एक दिन विश्व गुरु की दुहाई देने वाले विश्व उपहास का कारण बनेंगे ।आगामी विधानसभा चुनाव में भी इसके प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। युवाओं चुप रहने वाले नहीं है अपने उपस्थिति दर्ज करने का दर्ज करने से चूकेंगे नहीं तब अभी भी देर नहीं हुई है जब जागो तभी सवेरा समझदारी इसी में है कि समय रहते हुए जग जाए और इस अंधेरे से युवाओं को देश को समाज को बचाएं।

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