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योगी व अखिलेश में एआई वीडियो से वार हो रहा ज्यादा, बाबा का होगा फायदा,टीपू का बिगड़ जाएगा कायदा

एआई के अखाड़े में उतर आया यूपी का चुनावी युद्ध

  • टोंटी चोर से गांजा फूंकते योगी तक पहुंची सियासी जंग
  • बीजेपी ने खोला एआई का मोर्चा, सपा ने शुरू किया जवाबी पलटवार
  • अखिलेश का योगी पर सीधा हमला, सोशल मीडिया बना नया रणक्षेत्र
  • अपमान की राजनीति का फायदा किसे, नुकसान किसका?
  • साधु की छवि पर वार कहीं सपा के लिए उलटा न पड़ जाए
  • मोदी-शाह पर चुप्पी, योगी पर आक्रामकता—सपा की रणनीति पर सवाल

वाराणसी। उत्तर प्रदेश की सत्ता की लड़ाई अभी चुनावी मैदान में पूरी तरह उतरी भी नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया ने पहले ही उसके लिए अखाड़ा तैयार कर दिया है। लखनऊ से लेकर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों तक योगी बनाम अखिलेश की पुरानी राजनीतिक भिड़ंत अब पोस्टर-बैनर और भाषणों से आगे निकलकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से तैयार वीडियो तक पहुंच गई है। जिस सियासी लड़ाई की एक चर्चित शुरुआत अखिलेश यादव के खिलाफ ‘टोंटी चोर’ जैसे बेहद आपत्तिजनक राजनीतिक टैग से हुई थी, वही जंग अब डिजिटल दुनिया में नए-नए रूप धर रही है। बीजेपी की तरफ से एआई आधारित राजनीतिक कंटेंट के इस्तेमाल के बाद समाजवादी पार्टी ने भी जवाबी डिजिटल हमले तेज कर दिए हैं। अखिलेश यादव की ओर से योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए एआई वीडियो सार्वजनिक रूप से चलवाए जाने को इसी बदलते चुनावी तौर-तरीके का संकेत माना जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि किसका वीडियो ज्यादा वायरल होता है, बल्कि यह है कि मतदाता उसके संदेश को किस तरह ग्रहण करता है। राजनीतिक प्रचार में व्यंग्य और कटाक्ष कोई नई चीज नहीं है, लेकिन एआई ने इसकी धार और पहुंच दोनों कई गुना बढ़ा दी है। कुछ सेकंड में किसी नेता की आवाज, चेहरा, हावभाव और पूरा दृश्य बदला जा सकता है। यही वजह है कि आने वाले यूपी चुनाव में सोशल मीडिया का यह हथियार प्रचार और दुष्प्रचार के बीच की रेखा को और धुंधला कर सकता है।
लेकिन एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी खड़ा है कि क्या योगी की छवि को जितना ज्यादा व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जाएगा, उसका फायदा वास्तव में समाजवादी पार्टी को मिलेगा। योगी आदित्यनाथ की साधु और योगी की पहचान का उत्तर भारतीय समाज में एक अलग भावनात्मक प्रभाव है। इसलिए उनके चरित्र और व्यक्तिगत छवि पर लगातार हमला कहीं सहानुभूति पैदा करने के बजाय उनके समर्थक आधार को और मजबूत न कर दे, यह देखने वाली बात होगी।

टोंटी चोर से एआई तक

अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ के बीच राजनीतिक टकराव कोई नया नहीं है। सत्ता परिवर्तन के बाद सरकारी आवास से कथित रूप से टोंटियां गायब होने के विवाद को लेकर अखिलेश यादव पर ‘टोंटी चोर’ का राजनीतिक कटाक्ष लंबे समय तक बीजेपी के प्रचार का हिस्सा बना रहा। समाजवादी पार्टी ने इसे अखिलेश यादव को बदनाम करने वाला निम्नस्तरीय राजनीतिक अभियान बताया। अखिलेश यादव कई मौकों पर उस दौर के अधिकारियों को लेकर भी बेहद तीखे तेवर दिखाते रहे हैं। उनका आरोप रहा है कि राजनीतिक सत्ता के संरक्षण में उन्हें बदनाम करने के लिए प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल किया गया। वह संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी देते रहे हैं और सत्ता में लौटने पर हिसाब चुकता करने की बात कहते रहे हैं। यहीं से एक राजनीतिक संदेश भी निकला कि अखिलेश व्यक्तिगत हमले को व्यक्तिगत राजनीतिक जवाब में बदलने से पीछे नहीं हटेंगे। अब वही लड़ाई डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है।

एआई बना नया चुनावी हथियार

राजनीतिक दलों के लिए एआई अब महज तकनीकी कौतूहल नहीं रह गया है। चुनावी संदेश को हास्य, व्यंग्य, पैरोडी और तीखे राजनीतिक हमले में बदलने के लिए इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। योगी सरकार और बीजेपी समर्थक डिजिटल इकोसिस्टम की ओर से एआई आधारित वीडियो सामने आने के बाद सपा की तरफ से भी जवाबी कंटेंट की बाढ़ दिखाई देने लगी है। अखिलेश यादव को केंद्र में रखकर तैयार किए जा रहे डिजिटल वीडियो का मकसद स्पष्ट है कि बीजेपी के नैरेटिव का उसी भाषा और उसी प्लेटफॉर्म पर जवाब देना। यानी अब चुनावी लड़ाई का एक मोर्चा बूथ पर होगा और दूसरा मोबाइल स्क्रीन पर। जिस पार्टी का वीडियो ज्यादा तेजी से लोगों तक पहुंचेगा, जिसे समर्थक ज्यादा शेयर करेंगे और जो विरोधी खेमे को ज्यादा बेचैन करेगा, वह डिजिटल युद्ध में बढ़त का दावा करेगी। मगर वायरल होना और वोट में बदलना दो अलग चीजें हैं। यही अंतर आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण होगा।

‘गांजा फूंकते योगी’ और ‘छोटा फैंटा’ जैसी भाषा

राजनीतिक व्यंग्य की सीमा अब तेजी से नीचे खिसक रही है। सोशल मीडिया पर योगी आदित्यनाथ को लेकर बेहद व्यक्तिगत और अपमानजनक संबोधनों का इस्तेमाल हो रहा है। ‘गांजा फूंकते योगी’ अथवा ‘छोटा फैंटा’ जैसे कटाक्ष इसी डिजिटल राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा हैं। समस्या यह है कि राजनीतिक व्यंग्य जब नीतियों और शासन के सवालों से हटकर व्यक्ति के चरित्र, वेशभूषा या धार्मिक पहचान को निशाना बनाने लगे तो उसका राजनीतिक परिणाम हमेशा हमलावर के पक्ष में नहीं जाता। समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ा जोखिम यही है। अखिलेश यादव यदि बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, विकास, किसानों, युवाओं और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर योगी सरकार को घेरते हैं तो बहस शासन के प्रदर्शन पर रहती है। लेकिन हमला यदि लगातार योगी की व्यक्तिगत छवि और साधु पहचान पर केंद्रित होता है तो राजनीतिक बहस का केंद्र बदल सकता है।

साधु की छवि पर हमला कहीं उलटा न पड़े

भारतीय समाज में साधु-संतों और योगियों के प्रति सम्मान की एक गहरी सांस्कृतिक परंपरा है। योगी आदित्यनाथ की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा इसी पहचान से जुड़ा हुआ है। गोरखनाथ पीठ से उनकी पहचान और भगवा वस्त्र उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को सामान्य राजनेताओं से अलग बनाते हैं। इसलिए योगी को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करने वाले कंटेंट का एक अनपेक्षित परिणाम यह हो सकता है कि उनके समर्थक इसे केवल राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान पर हमला मान लें।
यही वह बिंदु है जहां समाजवादी पार्टी की आक्रामक रणनीति उसके लिए उलटी भी पड़ सकती है। राजनीति में विरोधी की कमजोरी पर हमला करना रणनीति है, लेकिन विरोधी के मजबूत भावनात्मक आधार को अनजाने में मजबूत कर देना रणनीतिक भूल भी साबित हो सकता है। सपा को इसलिए तय करना होगा कि उसे योगी सरकार की नीतियों पर हमला करना है या योगी की व्यक्तिगत छवि को निशाना बनाना है। दोनों के राजनीतिक परिणाम एक जैसे नहीं होंगे।

मोदी-शाह पर चुप्पी क्यों

इस पूरे अभियान में एक और सवाल महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर समाजवादी पार्टी का हमला जितना मुखर दिखाई देता है, उतनी तीव्रता से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को निशाना बनाने से पार्टी अक्सर बचती दिखाई देती है। इसके पीछे राजनीतिक गणित क्या है, यह सपा की रणनीति समझने वाले बेहतर जानते हैं। लेकिन जनता के बीच यह सवाल जरूर उठ सकता है कि यदि बीजेपी की नीतियों से मुकाबला करना है तो हमला केवल लखनऊ की सत्ता पर क्यों केंद्रित है। विपक्ष के लिए यह चुनाव केवल योगी सरकार का रिपोर्ट कार्ड नहीं होगा। केंद्र और राज्य की सत्ता, दोनों के कामकाज को जनता अपने तरीके से जोड़ेगी। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में सपा का हमला लखनऊ तक सीमित रहता है या दिल्ली तक पहुंचता है।

असली लड़ाई वायरल वीडियो नहीं, धारणा की

एआई वीडियो चुनाव जीत सकते हैं या नहीं, इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना तय है कि वे चुनावी धारणा बनाने में भूमिका निभाएंगे। एक वीडियो समर्थकों को उत्साहित कर सकता है। दूसरा विरोधियों को भड़का सकता है। तीसरा लाखों लोगों तक पहुंच सकता है लेकिन वोट पर उसका कोई असर न पड़े। चौथा वीडियो इतना विवाद पैदा कर सकता है कि मूल मुद्दा ही गायब हो जाए। इसलिए आने वाले चुनाव में राजनीतिक दलों के सामने केवल कंटेंट बनाने की चुनौती नहीं होगी। उन्हें यह भी तय करना होगा कि किस सीमा तक हमला करना है। अखिलेश यादव के सामने विशेष चुनौती यही है कि वह योगी सरकार के खिलाफ जबरदस्त राजनीतिक असंतोष पैदा कर सकते हैं, लेकिन अगर अभियान लगातार व्यक्तिगत उपहास में बदलता गया तो बीजेपी को ध्रुवीकरण और सहानुभूति दोनों का अवसर मिल सकता है।

बीजेपी के सामने भी खतरा कम नहीं

एआई और सोशल मीडिया का आक्रामक इस्तेमाल बीजेपी के सामने भी खतरा कम नहीं अगर अतिरंजना, फर्जी सामग्री या भ्रामक दावों तक पहुंचा तो उसका उलटा असर भी हो सकता है। डिजिटल दुनिया में झूठी या संदर्भ से काटी गई सामग्री को पकड़ना भी पहले से आसान है। चुनावी युद्ध अभी बाकी है, फिलहाल उत्तर प्रदेश में चुनावी प्रचार युद्ध का माहौल गर्म होना शुरू हो चुका है। एआई इसका नया हथियार है और सोशल मीडिया उसका रणक्षेत्र। कभी-कभी विरोधी की सबसे मजबूत पहचान पर प्रहार उसे और मजबूत कर देता है।
और यही इस पूरे एआई युद्ध का सबसे दिलचस्प सवाल है। क्या सपा के डिजिटल हमले योगी की जमीन खिसकाएंगे, या बीजेपी उन्हें योगी के पक्ष में सहानुभूति और भावनात्मक लामबंदी में बदल देगी।

* टोंटी चोर टैग से शुरू हुई पुरानी जंग अब एआई वीडियो तक पहुंची
* दोनों खेमे सोशल मीडिया पर एआई को बना रहे चुनावी हथियार
* अखिलेश ने दूसरी बार योगी को निशाने पर लेकर जवाबी हमला तेज किया
* योगी की धार्मिक-साधु वाली छवि पर हमला सपा के लिए बन सकता है जोखिम
* मोदी-शाह के बजाय योगी पर ज्यादा आक्रामकता की रणनीति चर्चा में
* 2027 के पहले यूपी में डिजिटल प्रचार युद्ध ने पकड़ी रफ्तार

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