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सामाजिक समरसता के प्रतीक महंत अवैद्यनाथ: गुरु से शिष्य तक चली राष्ट्र और धर्म की साधना,योगी की जुड़ गई भावना

महंत अवैद्यनाथ की पुण्यतिथि 12 सितम्बर स्मृति शेष

  • ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ जी को शत-शत नमन
  • जाति धर्म ऊंच नीच के भेदभाव से रहित रहा महंत अवैद्यनाथ का व्यक्तित्व
  • सामाजिक समरसता, सनातन संस्कृति और राष्ट्रहित के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले गोरक्षपीठ के ब्रह्मलीन पीठाधीश्वर परमपूज्य महंत अवैद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।

अमित मौर्य महंत अवैद्यनाथ जी केवल एक संत और धार्मिक नेता नहीं थे, बल्कि उन्होंने समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को समाप्त करने और हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए निरंतर प्रयास किया। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश था कि भगवान राम किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय के नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की आस्था और मर्यादा के प्रतीक हैं।

रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़े उनके प्रयासों में भी सामाजिक समरसता का यह भाव दिखाई देता है। 1989 में अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के दौरान पहली शिला दलित समाज से आने वाले कामेश्वर चौपाल के हाथों रखे जाने का उल्लेख मिलता है।

सामाजिक समरसता को बनाया जीवन का संकल्प

महंत अवैद्यनाथ जी का मानना था कि हिंदू समाज की शक्ति उसकी एकता में है। उन्होंने जाति-पाति के भेदभाव के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से अभियान चलाया और समाज के वंचित वर्गों के साथ सहभोज जैसे कार्यक्रमों में भाग लिया।
उनके सामाजिक जीवन से जुड़े कई प्रसंग आज भी चर्चा में आते हैं। काशी के डोमराज के घर जाकर भोजन करना उनमें से एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है। इसी प्रकार मंदिरों में सभी वर्गों की भागीदारी और पुजारी के रूप में विभिन्न जातियों के लोगों को अवसर देने की दिशा में भी उन्होंने आवाज उठाई।
उनके लिए सामाजिक समरसता केवल भाषण का विषय नहीं थी, बल्कि यह उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

राम मंदिर आंदोलन में महंत अवैद्यनाथ की भूमिका

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि को लेकर चले लंबे आंदोलन में महंत अवैद्यनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने राम मंदिर निर्माण को केवल धार्मिक मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि हिंदू समाज की एकता और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े विषय के रूप में प्रस्तुत किया।
1989 में राम मंदिर के शिलान्यास कार्यक्रम और उसके बाद के आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, उनके मार्गदर्शन में शिलान्यास की पहली शिला दलित समाज के प्रतिनिधि कामेश्वर चौपाल ने रखी थी।
यही वह दृष्टि थी, जिसमें मंदिर निर्माण के साथ सामाजिक भेदभाव की दीवारों को तोड़ने का संदेश भी निहित था।कैसे हुई योगी आदित्यनाथ की अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ से पहली मुलाकात?

एक विद्यार्थी की प्रतिभा ने खींचा संत का ध्यान

योगी आदित्यनाथ और महंत अवैद्यनाथ के संबंधों की कहानी गुरु-शिष्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
प्रचलित विवरणों के अनुसार, युवा अजय सिंह बिष्ट यानी योगी आदित्यनाथ विद्यार्थी जीवन में वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया करते थे। विद्यार्थी परिषद के एक कार्यक्रम में तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए छात्रों ने अपने विचार रखे। जब युवा अजय ने अपनी बात रखी तो उनके वक्तव्य और विचारों ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित किया। महंत अवैद्यनाथ भी उनसे प्रभावित हुए।

“कहां से आए हो?”

बताया जाता है कि कार्यक्रम के बाद महंत अवैद्यनाथ ने उस युवा छात्र को अपने पास बुलाया और पूछा—
“कहां से आए हो?”
अजय ने बताया कि वह उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र के पंचूर गांव से हैं।
यह संयोग भी उल्लेखनीय था कि महंत अवैद्यनाथ का संबंध भी उत्तराखंड के उसी क्षेत्र से था और दोनों के गांवों के बीच दूरी बहुत अधिक नहीं थी।
महंत ने युवा अजय से कहा कि अवसर मिले तो गोरखपुर आकर उनसे मिलें।
यही छोटी-सी मुलाकात आगे चलकर भारतीय राजनीति और गोरक्षपीठ के इतिहास की एक बड़ी कहानी की शुरुआत बनी।
गोरखपुर की ओर योगी आदित्यनाथ मन खिंचता चला गया।

पढ़ाई के बीच भी गुरु गोरखनाथ की तपस्थली का आकर्षण

पहली मुलाकात के बाद युवा अजय सिंह बिष्ट के मन में महंत अवैद्यनाथ के प्रति गहरा प्रभाव बना।
बाद में उन्होंने ऋषिकेश के एक महाविद्यालय में एमएससी में प्रवेश लिया। लेकिन उनका मन गोरखपुर और गुरु गोरखनाथ की तपस्थली की ओर लगातार आकर्षित होता रहा।
इसी दौरान महंत अवैद्यनाथ की तबीयत खराब हुई। युवा अजय उनसे मिलने गोरखपुर पहुंचे।
यह मुलाकात उनके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई।

गुरु ने कहा—रामजन्मभूमि की लड़ाई को आगे कौन ले जाएगा?

प्रचलित जीवन-वृत्तांतों के अनुसार, बीमारी के दौरान महंत अवैद्यनाथ ने युवा अजय से रामजन्मभूमि आंदोलन का उल्लेख किया और अपनी चिंता व्यक्त की कि यदि उनके बाद इस संघर्ष को आगे बढ़ाने वाला कोई न हुआ तो आंदोलन की दिशा क्या होगी।
युवा अजय ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे चिंता न करें और शीघ्र ही गोरखपुर आने की बात कही।
यह संवाद आगे चलकर गुरु और शिष्य के बीच बनने वाले उस संबंध की नींव बना, जिसने गोरक्षपीठ को एक नई पीढ़ी का नेतृत्व दिया।

22 वर्ष की उम्र में संन्यास की राह
परिवार से विदा लेकर गोरखपुर पहुंचे अजय

वर्ष 1992 में युवा अजय सिंह बिष्ट अपने परिवार से गोरखपुर जाने की बात कहकर निकले और फिर उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।
वर्ष 1994 में उन्होंने महंत अवैद्यनाथ से दीक्षा ग्रहण की और सांसारिक जीवन का त्याग करके संन्यास स्वीकार किया। उस समय उनकी उम्र लगभग 22 वर्ष थी।
अजय सिंह बिष्ट अब योगी आदित्यनाथ के रूप में नई पहचान के साथ सामने आए।
यह केवल नाम परिवर्तन नहीं था। यह उनके जीवन की दिशा का पूर्ण परिवर्तन था—परिवार और व्यक्तिगत जीवन से निकलकर समाज, धर्म, राष्ट्र और गोरक्षपीठ की सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ना।

गुरु ने पहचानी शिष्य की क्षमता
उत्तराधिकारी बनने की यात्रा

महंत अवैद्यनाथ ने अपने युवा शिष्य में नेतृत्व की असाधारण क्षमता देखी।
योगी आदित्यनाथ धीरे-धीरे गोरक्षपीठ की गतिविधियों में सक्रिय होते गए और पूर्वांचल के सामाजिक तथा सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका बढ़ती गई।
उपलब्ध विवरणों में महंत अवैद्यनाथ द्वारा योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी बनाए जाने का उल्लेख मिलता है। कुछ स्रोत इसके लिए 1990 के दशक के मध्य का समय बताते हैं।
इसके बाद गुरु और शिष्य का संबंध केवल आध्यात्मिक नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में भी एक निरंतरता का प्रतीक बन गया।

1998 में संसद पहुंचे योगी आदित्यनाथ
सबसे कम उम्र के सांसदों में एक

1998 में योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उस समय वे युवा सांसद के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे।
महंत अवैद्यनाथ स्वयं भी गोरखपुर से लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। इस प्रकार गुरु से शिष्य तक गोरखपुर की राजनीतिक-सामाजिक विरासत का हस्तांतरण हुआ।
योगी आदित्यनाथ 1998 से 2017 तक लगातार गोरखपुर से सांसद रहे और प्रत्येक चुनाव के साथ उनका जनाधार मजबूत होता गया।

सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर
2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता की कमान

लगभग दो दशक तक संसद में गोरखपुर का प्रतिनिधित्व करने के बाद वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
इसके बाद 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पुनः बहुमत मिलने के बाद योगी आदित्यनाथ ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
इस प्रकार वे उत्तर प्रदेश के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हुए जिन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अपना पहला कार्यकाल पूरा किया और फिर दोबारा सत्ता में लौटे।

गोरक्षपीठ और रामजन्मभूमि आंदोलन की पुरानी कड़ी
1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग

रामजन्मभूमि और अयोध्या के इतिहास की चर्चा करते समय 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हिंदू-मुस्लिम सहयोग के प्रसंग को भी याद किया जाता है।
अयोध्या में बाबा रामचरण दास और मौलवी अमीर अली अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष में साथ आए थे। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से जुड़े एक प्रकाशन में बाबा रामचरण दास को 1857 के विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाने वाला बताया गया है और उनके 1858 में फांसी दिए जाने का उल्लेख है।
अन्य ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, बाबा रामचरण दास और मौलवी अमीर अली को 18 मार्च 1858 को अयोध्या के कुबेर टीला क्षेत्र में फांसी दी गई थी।
यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उस दौर में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध हिंदू और मुस्लिम समाज के कुछ नेताओं ने मिलकर संघर्ष किया था।

आरएसएस से बहुत पहले की कहानी—लेकिन तथ्य को समझना जरूरी

अयोध्या और गोरक्षपीठ के इतिहास को लेकर कई स्थानीय और परंपरागत विवरणों में यह दावा मिलता है कि गोरक्षपीठ से जुड़े संतों ने रामजन्मभूमि से संबंधित गतिविधियों में बहुत पहले से भूमिका निभाई थी।
हालांकि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी, जबकि 1857 और 1858 की अयोध्या की घटनाएं उससे लगभग सात दशक पहले की हैं। इसलिए इन दोनों कालखंडों को अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों में देखना जरूरी है।
1857 का आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक विद्रोह था, जिसमें अयोध्या क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम सहयोग के कई उदाहरण मिलते हैं।

गुरु की विरासत और शिष्य का संकल्प
महंत अवैद्यनाथ से योगी आदित्यनाथ तक

महंत अवैद्यनाथ की सबसे बड़ी विरासत केवल गोरक्षपीठ की पीठाधीश्वरी परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, धार्मिक आस्था और समाज को संगठित करने का संदेश भी है।
योगी आदित्यनाथ ने अपने गुरु की इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का दावा किया है। उनके सार्वजनिक जीवन में गोरक्षपीठ की परंपरा, रामजन्मभूमि आंदोलन और सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों की निरंतर छाप दिखाई देती है।
गुरु ने जिस शिष्य की प्रतिभा को विद्यार्थी जीवन में पहचान लिया था, वही शिष्य आगे चलकर गोरक्षपीठ का नेतृत्वकर्ता बना, संसद पहुंचा और अंततः उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना।

एक गुरु, एक शिष्य और एक लंबी परंपरा

महंत अवैद्यनाथ और योगी आदित्यनाथ की कहानी केवल एक गुरु और शिष्य की कहानी नहीं है।
यह उस परंपरा की कहानी है जिसमें एक संत अपने उत्तराधिकारी में केवल धार्मिक नेतृत्व नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी भी देखता है।
महंत अवैद्यनाथ ने सामाजिक समरसता को महत्व दिया, रामजन्मभूमि आंदोलन में भूमिका निभाई और अपने शिष्य में भविष्य का नेतृत्व देखा। योगी आदित्यनाथ ने उसी गोरक्षपीठीय परंपरा से निकलकर पहले सांसद और फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा तय की।
आज महंत अवैद्यनाथ जी की पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए यही कहा जा सकता है कि गुरु का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो जाए, लेकिन उनके विचार, संस्कार और उनके द्वारा तैयार किए गए शिष्य के माध्यम से उनकी परंपरा लंबे समय तक समाज में जीवित रहती है।

ब्रह्मलीन परमपूज्य महंत अवैद्यनाथ जी महाराज को कोटि-कोटि नमन।
उनकी सामाजिक समरसता, राष्ट्रसेवा और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पण को शत-शत प्रणाम।

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