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राम मंदिर ट्रस्ट से उठे नए सवाल: मंदिर में अब सीईओ की तैनाती से मचा बवाल

  •  मंदिर की व्यवस्था या कॉरपोरेट मॉडल?
  •  चार महीने पहले रिटायर हुए एयर मार्शल को बड़ी जिम्मेदारी
  •  5585 आवेदनों के बीच चयन, लेकिन सवालों की फेहरिस्त और लंबी
  •  ऑपरेशन सिंदूर से अयोध्या तक पहुंची कहानी पर कांग्रेस के सवाल
  •  चढ़ावे की कथित गड़बड़ियों से ध्यान हटेगा या हिसाब भी होगा?

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को अपना पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ नियुक्त किया है। खबर यह है कि ट्रस्ट के गठन के करीब छह साल बाद पहली बार किसी को सीईओ बनाया गया है। अब सवाल यह है कि आखिर राम मंदिर को भी कॉरपोरेट कंपनी की तरह सीईओ की जरूरत क्यों पड़ गई?

वैसे मंदिर का इतिहास भले हजारों साल पुराना बताया जाता हो, लेकिन ट्रस्ट खुद अभी छह साल का ही है। इसलिए ‘इतिहास में पहली बार’ जैसी बात सुनकर थोड़ा ठहरना भी चाहिए। लेकिन असली दिलचस्पी इस बात में है कि एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी को मंदिर ट्रस्ट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया है।

सेना से सीधे मंदिर प्रबंधन तक!

जितेंद्र मिश्रा 30 अप्रैल को भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत्त हुए और अब कुछ ही महीनों बाद उन्हें राम मंदिर ट्रस्ट की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल गई। सामान्य तौर पर वरिष्ठ सरकारी और सैन्य अधिकारियों के सेवानिवृत्ति के बाद निजी अथवा व्यावसायिक संस्थानों में नियुक्ति से जुड़े नियम और ‘कूलिंग ऑफ’ जैसी व्यवस्थाएं होती हैं।

अब सवाल यह है कि राम मंदिर ट्रस्ट की कानूनी और प्रशासनिक स्थिति इस मामले में क्या है? क्या इसके लिए कोई विशेष अनुमति ली गई? क्या रक्षा मंत्रालय से अनुमति मिली? या ट्रस्ट को निजी व्यावसायिक संस्था की श्रेणी में नहीं माना जाता?

इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए। क्योंकि पारदर्शिता का तकाजा यही है कि नियुक्ति जितनी बड़ी हो, उससे जुड़े सवालों के जवाब भी उतने ही स्पष्ट हों।

5585 उम्मीदवार और फिर एयर मार्शल साहब!

बताया गया है कि सीईओ पद के लिए ट्रस्ट को 5585 आवेदन मिले थे। इनमें से 111 उम्मीदवारों को छांटा गया और फिर 16 उम्मीदवारों को अयोध्या बुलाकर साक्षात्कार किया गया। सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रमोद कोहली की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने अंतिम तीन नामों की सूची दी और अंततः जितेंद्र मिश्रा के नाम पर मुहर लगी।

यह चयन प्रक्रिया अपने आप में बताती है कि पद को हल्के में नहीं लिया गया। लेकिन 5585 आवेदनों की भीड़ में सबसे ऊपर पहुंचे व्यक्ति की नियुक्ति को लेकर सवाल पूछना भी कोई अपराध नहीं है।

बल्कि सवाल यही होना चाहिए कि चयन के मानदंड क्या थे?
क्या प्रशासनिक अनुभव प्रमुख आधार था?
क्या सुरक्षा प्रबंधन?
क्या वित्तीय प्रबंधन?
क्या बड़े संस्थान को संचालित करने का अनुभव?

अगर चयन प्रक्रिया पारदर्शी है तो इन सवालों के जवाब देने में परेशानी नहीं होनी चाहिए।

योग्यता पर सवाल नहीं, नियुक्ति के संदेश पर सवाल

जितेंद्र मिश्रा की योग्यता को लेकर शायद ही कोई गंभीर आपत्ति हो। उन्होंने करीब 39 वर्षों तक भारतीय वायुसेना में सेवा दी। फाइटर पायलट के रूप में उनका लंबा अनुभव रहा। वे फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर, चीफ टेस्ट पायलट, अग्रिम एयरबेस के एयर ऑफिसर कमांडिंग और एयर मुख्यालय में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।

उनके पास 3000 घंटे से अधिक उड़ान का अनुभव बताया जाता है। जनवरी 2025 में उन्होंने वेस्टर्न एयर कमांड की कमान संभाली और बाद में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी इसी कमान का नेतृत्व किया।

यानी आदमी योग्य है—इसमें कोई शक नहीं।

लेकिन लोकतंत्र में सवाल व्यक्ति की योग्यता से आगे भी जाते हैं। सवाल यह है कि उस योग्यता का इस्तेमाल किस संस्थान के लिए और किस संदेश के साथ किया जा रहा है?

ऑपरेशन सिंदूर से राम मंदिर तक—सवाल यहीं से शुरू होता है

कांग्रेस ने इस नियुक्ति को ऑपरेशन सिंदूर से जोड़कर सवाल उठाया है। पार्टी ने पूछा है कि क्या इस नियुक्ति के पीछे ऑपरेशन सिंदूर से संबंधित कोई राजनीतिक संदेश है?

इस संदेह को सही या गलत साबित करना अलग बात है। लेकिन सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जिस अधिकारी ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण सैन्य कमान संभाली हो, वह अचानक देश के सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील धार्मिक संस्थानों में से एक की प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालने लगे तो स्वाभाविक रूप से चर्चा होगी।

यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए—किसी सैन्य अधिकारी की नियुक्ति अपने आप में राजनीतिकरण का प्रमाण नहीं है। लेकिन नियुक्ति के समय, संदर्भ और संस्थागत प्रभाव पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है।

मंदिर में भक्ति कम, मैनेजमेंट ज्यादा?      

अब जरा उस तस्वीर को देखिए जिसमें एक तरफ मंदिर है, करोड़ों श्रद्धालु हैं, भारी चढ़ावा है, धार्मिक आयोजन हैं और दूसरी तरफ सीईओ, प्रशासनिक ढांचा, प्रबंधन और बड़े अधिकारियों की नियुक्तियां हैं।

क्या यह मंदिर है या तेजी से विकसित होता हुआ कोई बड़ा कॉरपोरेट संस्थान?

हो सकता है कि आधुनिक दौर में बड़े मंदिरों का प्रबंधन पेशेवर तरीके से करना जरूरी हो। करोड़ों श्रद्धालुओं की व्यवस्था, सुरक्षा, दान, निर्माण, कर्मचारी, तकनीकी प्रबंधन और प्रशासन कोई छोटा काम नहीं है।

लेकिन जब व्यवस्था कॉरपोरेट शैली में हो रही हो तो फिर हिसाब-किताब भी कॉरपोरेट शैली का होना चाहिए—कितना पैसा आया, कहां खर्च हुआ, किसे ठेका मिला, किसे भुगतान हुआ और कितनी रकम कहां गई?

भक्ति के साथ पारदर्शिता भी होनी चाहिए।

चढ़ावे का हिसाब कौन देगा?

राम मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था के साथ भारी मात्रा में चढ़ावा भी आता है। पिछले समय में मंदिर परिसर और उससे जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं तथा चढ़ावे को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

अगर कहीं चोरी या वित्तीय गड़बड़ी हुई है तो उसका निष्पक्ष जांच के जरिए पता लगना चाहिए। दोषी कौन है, यह जांच और अदालत तय करे। लेकिन केवल नए पदाधिकारी नियुक्त कर देने से पुराने सवाल खत्म नहीं हो जाते।

लोगों को यह भी जानने का अधिकार है कि श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया गया पैसा आखिर कहां जाता है।

सीईओ नया आ गया, लेकिन पुराने हिसाब की फाइल भी खुलेगी या नहीं?

यही असली सवाल है।

हर सवाल का जवाब ‘जय श्रीराम’ नहीं हो सकता

राम मंदिर भारत में केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रहा। यह दशकों तक भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा है। भाजपा ने मंदिर निर्माण के मुद्दे को लेकर लंबे समय तक चुनावी राजनीति की और अंततः सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ।

22 जनवरी 2024 को मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी ने इसे और बड़ा राजनीतिक-धार्मिक आयोजन बना दिया।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद यह स्वाभाविक है कि राम मंदिर से जुड़े किसी भी बड़े प्रशासनिक निर्णय पर सवाल उठेंगे।

लोकतंत्र में हर सवाल का जवाब ‘जय श्रीराम’ कहकर नहीं दिया जा सकता।
राम का नाम श्रद्धा का विषय है, लेकिन ट्रस्ट का पैसा सार्वजनिक जवाबदेही का विषय है।

मंदिर की राजनीति और राजनीति का मंदिर

राम मंदिर का निर्माण भाजपा की राजनीति के सबसे बड़े वादों में रहा। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि मंदिर पूरी तरह राजनीति से अलग संस्था है। चाहे इसे कोई पसंद करे या न करे, इसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसीलिए जब किसी बड़े सैन्य अधिकारी को इस संस्था की महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी मिलती है तो राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है।

सवाल यह नहीं कि एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा भाजपा के हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या मंदिर ट्रस्ट अपने निर्णयों में पूर्ण संस्थागत स्वतंत्रता, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित कर रहा है?

सेना को राजनीति से दूर रखना क्यों जरूरी है?

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि सेना ने राजनीतिक सत्ता पर कब्जा नहीं किया। पड़ोसी पाकिस्तान का इतिहास इसके विपरीत उदाहरण देता है।

इसलिए भारतीय सेना की राजनीतिक निष्पक्षता लोकतंत्र की ताकत है। सैन्य अधिकारियों का सम्मान इसलिए भी किया जाता है क्योंकि वे राजनीतिक दलों से ऊपर राष्ट्र और संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।

ऐसे में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों की नियुक्तियों पर सवाल उठना असम्मान नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सैन्य सेवा की प्रतिष्ठा को किसी राजनीतिक संदेश के लिए इस्तेमाल न किया जाए।

राम मंदिर को अब जवाब भी देना होगा

राम मंदिर ट्रस्ट के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल मंदिर चलाने की नहीं, बल्कि विश्वास बनाए रखने की है।

श्रद्धालु मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए आते हैं। वे यह उम्मीद भी करते हैं कि उनकी श्रद्धा से मिला पैसा ईमानदारी से इस्तेमाल होगा।

इसलिए नए सीईओ की नियुक्ति के साथ-साथ ट्रस्ट को पुराने सवालों पर भी जवाब देना चाहिए।

  • चढ़ावे का पूरा हिसाब क्या है?
  • कथित वित्तीय गड़बड़ियों की जांच कहां तक पहुंची?
  • दोषियों पर क्या कार्रवाई हुई?
  • ट्रस्ट के खर्च और ठेकों में कितनी पारदर्शिता है?
  • सीईओ की नियुक्ति के लिए तय मानदंड सार्वजनिक क्यों न किए जाएं?
  • इन सवालों के जवाब मिलने चाहिए।

आखिर संदेश क्या है?

जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को केवल उनकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर देखा जाए तो मामला सरल है—एक अनुभवी, वरिष्ठ और अनुशासित अधिकारी को बड़े संस्थान की जिम्मेदारी दी गई।

लेकिन अगर इसे व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखें तो सवाल थोड़ा पेचीदा हो जाता है।

  • क्या यह केवल प्रशासनिक नियुक्ति है?
  • क्या मंदिर को बेहतर प्रबंधन की जरूरत थी?
  • क्या सैन्य प्रशासन का अनुभव इसके लिए सबसे उपयुक्त माना गया?
  • या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक-सामाजिक संदेश भी है?
  • इन सवालों के जवाब वक्त देगा। लेकिन सवाल पूछने का अधिकार आज भी जनता के पास है।

मंदिर बड़ा हो रहा है तो जवाबदेही भी बड़ी हो

राम मंदिर जितना बड़ा धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतीक बनता जाएगा, उसके प्रबंधन से जुड़ी पारदर्शिता की मांग भी उतनी ही बढ़ेगी।

सीईओ की नियुक्ति से मंदिर का प्रबंधन आधुनिक हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में आधुनिक प्रबंधन की पहली शर्त है—पारदर्शिता।

भक्तों को भगवान के दर्शन चाहिए, सरकार को राजनीति चाहिए, ट्रस्ट को प्रशासन चाहिए और जनता को हिसाब चाहिए।

चारों की जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन एक बात समान है—राम मंदिर किसी की निजी जागीर नहीं है।

इसलिए नया सीईओ आए, नया प्रबंधन बने, नई व्यवस्था हो—स्वागत है। मगर साथ में पुरानी फाइलें भी खुलें, पुराने सवालों के जवाब भी मिलें और चढ़ावे का हिसाब भी सामने आए।

क्योंकि भगवान के मंदिर में आस्था का कारोबार नहीं होना चाहिए और अगर कारोबार जैसा प्रबंधन हो रहा है, तो फिर हिसाब भी वैसा ही साफ होना चाहिए।

आखिर राम के नाम पर राजनीति करने वालों से इतना तो पूछा ही जा सकता है—
मंदिर बन गया साहब, अब हिसाब कब बनेगा?

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