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शकुंतलम इंफ्राडेवलपर्स प्रा.लि.का प्रोजेक्ट रिद्धि सिद्धि हुआ फ़िसड्डी, वीडीए उपाध्यक्ष पूर्ण बोरा ने थाम लिया बिल्डर से नोटों की गड्डी

तालाब-भीटा निगलकर खड़ा हुआ 15 मंजिला टॉवर!ये है बिल्डर का पावर

  • सरकारी जमीन पर 250 से ज्यादा फ्लैटों का नक्शा पास
  • राजस्व अदालत के आदेश के बाद भी वीडीए की चुप्पी
  • नरउर में 1.127 हेक्टेयर जमीन का मामला पुराने अभिलेखों में तालाब-भीटा
  • निजी नाम कैसे चढ़े और किस आधार पर बनी बहुमंजिला परियोजना?
  • 30 फीट से अधिक चौड़ा रास्ता दिखाकर कैसे मिली मंजूरी?
  • 2010 के चकबंदी आदेश की वैधता पर भी सवाल
  • एसडीएम ने निजी नामों की प्रविष्टियां निरस्त कर जमीन को तालाब-भीटा के रूप में दर्ज करने का दिया आदेश वीडीए ने आदेश की प्रति न मिलने का दिया हवाला

वाराणसी। काशी में विकास के नाम पर आसमान छूती इमारतें खड़ी हो रही हैं, लेकिन राजातालाब तहसील के नरउर गांव से उठा सवाल जमीन से कहीं ज्यादा व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा है। जिस 1.127 हेक्टेयर जमीन पर राजस्व न्यायालय ने पुराने अभिलेखों के आधार पर तालाब और भीटा की मूल प्रकृति बहाल करने का आदेश दिया, उसी जमीन से जुड़ी परियोजना में 250 से अधिक फ्लैटों वाले बहुमंजिला टॉवर का नक्शा कैसे स्वीकृत हो गया? सरकारी भूमि की प्रविष्टियां निजी नामों में कैसे पहुंचीं, फिर जमीन की खरीद-बिक्री किस आधार पर हुई और अंततः उस पर 15 मंजिल से अधिक ऊंची इमारत खड़ी करने की अनुमति कैसे मिली? इन सवालों का जवाब अब संबंधित विभागों को देना होगा। मामला ग्राम नरउर के गाटा संख्या 4 और 5 से जुड़ा है। वाद संख्या 2461/2023 (सरकार बनाम अकबाल नरायन व अन्य) में उपजिलाधिकारी राजातालाब की अदालत ने राजस्व अभिलेखों और तहसीलदार की रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद संबंधित भूमि पर दर्ज निजी नामों की प्रविष्टियां निरस्त कर उसे पुनः भीटा एवं तालाब के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया। आदेश में गाटा संख्या 4क, 4ख और 4ग की कुल 0.858 हेक्टेयर तथा गाटा संख्या 5क, 5ख और 5ग की 0.269 हेक्टेयर भूमि शामिल है। कुल रकबा 1.127 हेक्टेयर है।
इसी भूमि से जुड़े प्रकरण में शकुंतलम इंफ्राडेवलपर्स प्रा. लि. की रिद्धि-सिद्धि आवासीय परियोजना को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परियोजना में 250 से अधिक फ्लैटों का नक्शा स्वीकृत हुआ है। ऐसे में सवाल केवल नक्शे की मंजूरी का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया का है जिसमें जमीन के मूल राजस्व रिकॉर्ड, निजी स्वामित्व, रास्ते की उपलब्धता और निर्माण की अनुमति के बीच की कड़ियों की जांच होनी चाहिए थी। यदि राजस्व अदालत के निष्कर्ष और नक्शा स्वीकृति के दस्तावेजों में विरोधाभास है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा?

 

पुराने अभिलेखों में तालाब-भीटा, फिर निजी नामों की एंट्री कैसे?

एसडीएम की अदालत ने तहसीलदार राजातालाब की 6 जनवरी 2023 की रिपोर्ट के साथ 1291 फसली बंदोबस्त अभिलेखों तथा 1356 और 1359 फसली खसरों सहित चकबंदी से संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण किया। उपलब्ध आदेश-विवरण के मुताबिक, भूमि की मूल प्रकृति भीटा और पोखरी/तालाब की पाई गई। इसके बाद अकबाल नरायन सिंह पुत्र विश्वनाथ, अवधनरायन, शिवजग, रामजनम, सूर्यबली और मानू प्रताप सहित संबंधित खातेदारों के नाम निरस्त कर अभिलेखों को मूल श्रेणी के अनुरूप दुरुस्त करने का आदेश दिया गया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पुराने राजस्व अभिलेख भूमि की प्रकृति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे थे, तो बाद के वर्षों में निजी नामों की प्रविष्टियां किस आधार पर हुईं? नामांतरण और चकबंदी की प्रक्रिया में कौन-से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए? क्या पुराने अभिलेखों का समुचित परीक्षण हुआ था? क्या किसी स्तर पर ऐसी चूक हुई, जिसने सार्वजनिक उपयोग की भूमि को निजी खरीद-बिक्री और आवासीय परियोजना तक पहुंचने का रास्ता दिया?
इन प्रश्नों का जवाब अनुमान से नहीं, मूल अभिलेखों, आदेशों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच से मिलना चाहिए। लेकिन एसडीएम के आदेश के बाद इस पूरे प्रकरण की गंभीरता और बढ़ गई है। अब यह पता लगाना जरूरी है कि निजी नामों की प्रविष्टियां किन परिस्थितियों में हुईं और जमीन के हस्तांतरण की पूरी प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ी।

तालाब-भीटा की जमीन से जुड़ी परियोजना को नक्शा किस आधार पर?

रिद्धि-सिद्धि परियोजना इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जमीन की बिक्री के बाद यह शकुंतलम इंफ्राडेवलपर्स प्रा. लि. तक पहुंची और इस पर बहुमंजिला आवासीय टॉवर की योजना बनी। परियोजना में 250 से अधिक फ्लैटों का नक्शा स्वीकृत होने की बात सामने आई है। नक्शे में 30 फीट से अधिक चौड़ा रास्ता दर्शाए जाने की जानकारी भी दी जा रही है। ऐसे में वीडीए की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। नक्शा स्वीकृत करते समय जमीन के स्वामित्व की पुष्टि किन दस्तावेजों से की गई? भूमि का स्वीकृत भू-उपयोग क्या था? पहुंच मार्ग के लिए दिखाई गई जमीन किसकी थी और उसका राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता था? क्या नक्शा स्वीकृति से पहले मौके का निरीक्षण किया गया था? यदि किया गया, तो निरीक्षण रिपोर्ट में क्या दर्ज है? 30 फीट से अधिक चौड़ा रास्ता नक्शे में दिखा देना और उस रास्ते का कानूनी रूप से उपलब्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए रास्ते की जमीन, स्वामित्व और वैधता की जांच भी उतनी ही जरूरी है जितनी मुख्य भूखंड की। यदि रास्ता विवादित भूमि से जुड़ा है, तो यह देखना होगा कि नक्शा स्वीकृत करने वाली फाइल में उस संबंध में कौन-से प्रमाण मौजूद थे। यहां पहले नक्शे, स्वामित्व दस्तावेजों और निरीक्षण रिपोर्ट की जांच आवश्यक है।

एसडीएम का आदेश सामने, वीडीए के हाथ क्यों बंधे?

मामले में वीडीए की ओर से नगर नियोजक ने नक्शा स्वीकृत होने की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्हें एसडीएम के आदेश की प्रति प्राप्त नहीं हुई है और नक्शे की वैधता को लेकर किसी ने औपचारिक आपत्ति भी दर्ज नहीं कराई है। यह स्पष्टीकरण कई नए सवाल खड़े करता है। यदि आदेश की प्रति नहीं मिली थी, तो क्या अब उसे प्राप्त करने और उसके तथ्यों की जांच कराने की पहल की गई? क्या संबंधित भूमि के राजस्व रिकॉर्ड और नक्शा स्वीकृति की फाइल का मिलान कराया गया? क्या परियोजना के स्वीकृत नक्शे और भूमि की वर्तमान कानूनी स्थिति की समीक्षा शुरू हुई? आदेश की प्रति न मिलना एक प्रशासनिक स्थिति हो सकती है, लेकिन उससे उठे सवालों का जवाब अपने आप नहीं मिल जाता। जब मामला सरकारी भूमि की प्रविष्टियों, तालाब-भीटा की प्रकृति और सैकड़ों फ्लैटों वाली परियोजना से जुड़ा हो, तब संबंधित विभाग से अपेक्षा है कि वह प्रमाणित दस्तावेज प्राप्त कर कानूनी स्थिति स्पष्ट करे। यह भी महत्वपूर्ण है कि एसडीएम के आदेश का परियोजना की जमीन, नक्शा और निर्माण पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ता है, इसका निर्णय संबंधित अभिलेखों और लागू कानूनों के परीक्षण के बाद ही किया जा सकता है। लेकिन समीक्षा की आवश्यकता को केवल आदेश की प्रति न मिलने के आधार पर अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जाना चाहिए।

2010 के चकबंदी आदेश ने खोले सवाल

प्रकरण में वर्ष 2010 में चकबंदी अधिकारी सदर, वाराणसी द्वारा अकबाल नरायन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में नियम-109 के तहत पारित आदेश भी जांच के केंद्र में है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, एसडीएम की अदालत ने आधार वर्ष में भूमि के सरकारी नाम दर्ज होने और धारा-52 के प्रकाशन के बाद उस प्रविष्टि के अंतिम होने के पहलू पर विचार किया। इसके आधार पर सरकारी प्रविष्टि को हटाकर निजी नाम दर्ज करने की प्रक्रिया के क्षेत्राधिकार और कानूनी औचित्य पर सवाल उठाए गए। अब जांच का विषय यह है कि वर्ष 2010 में आदेश किस आधार पर पारित हुआ? उस समय कौन-से राजस्व और चकबंदी अभिलेख प्रस्तुत किए गए थे? सरकारी प्रविष्टि में बदलाव किस अधिकार के तहत किया गया? बाद के नामांतरण और जमीन की बिक्री में उस आदेश की क्या भूमिका रही? क्या नक्शा स्वीकृति की प्रक्रिया में भी उसी दस्तावेज पर भरोसा किया गया? इन सवालों का जवाब 2010 के आदेश की प्रमाणित प्रति, संबंधित मूल पत्रावली और उसके बाद हुए राजस्व बदलावों की क्रमवार जांच से ही सामने आ सकता है। यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी भी साक्ष्यों के आधार पर तय की जानी चाहिए।

फाइलों से बाहर आए जवाबदेही

नरउर की 1.127 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा मामला कई विभागों की भूमिका की जांच की मांग करता है। राजस्व अभिलेखों में निजी नाम किस आधार पर दर्ज हुए, वर्ष 2010 के चकबंदी आदेश की कानूनी स्थिति क्या है, जमीन की बिक्री किन दस्तावेजों के आधार पर हुई और रिद्धि-सिद्धि परियोजना का नक्शा किन शर्तों पर स्वीकृत किया गया। इन सभी कड़ियों को एक साथ जोड़कर देखना होगा। वीडीए को नक्शा स्वीकृति की पूरी पत्रावली, भूमि के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज, भू-उपयोग की स्थिति, पहुंच मार्ग के प्रमाण और निरीक्षण रिपोर्ट की समीक्षा करनी चाहिए। राजस्व विभाग को निजी प्रविष्टियों से लेकर बिक्री तक की अभिलेखीय श्रृंखला स्पष्ट करनी चाहिए। चकबंदी विभाग को वर्ष 2010 के आदेश के आधार और उसके प्रभाव की स्थिति सामने रखनी चाहिए। यदि जांच में गलत दस्तावेजों, नियमों के उल्लंघन या किसी स्तर पर अनुचित लाभ दिए जाने की पुष्टि होती है, तो संबंधित पक्षों और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, किसी व्यक्ति या संस्था के अधिकारों पर अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी और न्यायालय के आदेशों के अनुरूप ही लिया जाना चाहिए।
फिलहाल सवाल साफ हैं। तालाब-भीटा की मूल प्रकृति वाली जमीन निजी नामों तक कैसे पहुंची? 250 से अधिक फ्लैटों की परियोजना का नक्शा किस आधार पर स्वीकृत हुआ? 30 फीट से अधिक चौड़े रास्ते की वैधता की पुष्टि कैसे हुई? और एसडीएम के आदेश के बाद वीडीए ने दस्तावेजी समीक्षा की दिशा में क्या कदम उठाए? नरउर का मामला अब सिर्फ जमीन के रिकॉर्ड का विवाद नहीं, बल्कि राजस्व व्यवस्था और विकास प्राधिकरण की जवाबदेही की परीक्षा है। अगर दस्तावेजों में सब कुछ नियमानुसार है, तो विभाग उन्हें सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करें। और यदि अभिलेखों में गंभीर विसंगतियां हैं, तो कार्रवाई की प्रक्रिया भी सार्वजनिक होनी चाहिए। सरकारी जमीन और सार्वजनिक जलस्रोतों से जुड़े सवालों का जवाब केवल फाइलों में नहीं, ठोस जांच और पारदर्शी कार्रवाई में दिखना चाहिए।

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