जनादेश जनता का,राजनेता बने सत्ता के दलाल, जनता क्यो न पूछे सवाल
दलबदल ने लोकतंत्र को बना दिया वेश्याओं की मंडी

- चुनाव खत्म होते ही शुरू हो जाती है सत्ता की नई गिनती वोट बदले तो जनादेश की कीमत क्या रह गई?
- टिकट कटा तो विचारधारा बदली, सत्ता दिखी तो हृदय परिवर्तन राजनीति में सिद्धांत आखिर कहां हैं?
- ईडी, सीबीआई व आयकर से लेकर होटल पॉलिटिक्स तक दलबदल के पीछे कौन-सा दबाव काम करता है?
- ‘व्यक्तिगत फैसला’ कहकर पल्ला झाड़ना आसान, मगर मतदाता के विश्वास का हिसाब कौन देगा?
- मजबूत विपक्षी किले बार-बार क्यों टूटते हैं—अंदर की दरार है या बाहर से चल रही सुनियोजित सेंध?
- जनादेश का सम्मान नहीं हुआ तो चुनाव लोकतंत्र नहीं, सत्ता हासिल करने का पांच साल में होने वाला उत्सव भर रह जाएगा
लोकतंत्र में मतदाता अपना वोट केवल किसी व्यक्ति को नहीं देता, वह एक विचारधारा, दल और राजनीतिक दिशा के पक्ष में अपना भरोसा दर्ज करता है। लेकिन चुनाव के बाद वही चुना हुआ प्रतिनिधि यदि अचानक पाला बदल ले और इसे अपना “व्यक्तिगत फैसला” बता दे तो सवाल सिर्फ उस नेता के फैसले का नहीं, उस मतदाता के विश्वास का भी है जिसने उसे किसी दूसरी राजनीतिक छतरी के नीचे चुनकर भेजा था। राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों के आसपास जिस तरह राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते हैं, उसने दलबदल की पुरानी बीमारी को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। टिकट कटने की नाराजगी, पद की महत्वाकांक्षा, नेतृत्व से असंतोष, सत्ता का आकर्षण और कथित जांच एजेंसियों के दबाव दलबदल के पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं। हर बार एक ही तर्क सामने आता है कि कोई नेता किसी दल की जागीर नहीं और उसे अपनी राजनीतिक राह चुनने की स्वतंत्रता है। बात संवैधानिक रूप से सही हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक नैतिकता का सवाल इससे खत्म नहीं होता। अगर किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वाला प्रतिनिधि चुनाव के तुरंत बाद दूसरी पार्टी के साथ खड़ा हो जाता है, तो क्या उसे अपने मतदाताओं से दोबारा जनादेश लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए? क्या पार्टी बदलना उतना ही आसान होना चाहिए जितना मोबाइल में सिम बदलना? दलबदल केवल दलों को नहीं तोड़ता, वह मतदाता के भरोसे में दरार डालता है। और जब यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है तो लोकतंत्र चुनाव से आगे बढ़कर सत्ता की जोड़-तोड़ की राजनीति में बदलता दिखाई देता है।

जनादेश जनता का, सौदा सत्ता का! दलबदल ने लोकतंत्र को बना दिया राजनीतिक मंडी
चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है। लेकिन अगर चुनाव परिणाम आने के बाद ही राजनीतिक सौदेबाजी का नया दौर शुरू हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मतदाता के वोट की कीमत कितनी है। विधानसभा, राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के भीतर और बाहर जिस तेजी से समीकरण बदलते हैं, वह भारतीय राजनीति की एक पुरानी बीमारी की याद दिलाता है दलबदल। नेता दल बदलता है, बयान बदलता है, विचारधारा बदलता है और कई बार कल तक जिस पार्टी को भ्रष्ट, जनविरोधी या अवसरवादी बता रहा था, अगले दिन उसी के मंच पर खड़ा होकर उसे विकास और राष्ट्रहित की पार्टी बताने लगता है। फिर जनता से कहा जाता है कि यह मेरा व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय है। लेकिन सवाल है व्यक्तिगत निर्णय की कीमत जनता क्यों चुकाए?
वोट किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं
किसी नेता को अपनी राजनीतिक राह चुनने का अधिकार लोकतंत्र देता है। लेकिन उसी लोकतंत्र में मतदाता को भी यह अधिकार है कि वह अपने वोट से चुने गए प्रतिनिधि से पूछे कि जिस दल के उम्मीदवार के रूप में उसे वोट मिला था, उससे अलग होने का फैसला उसने क्यों किया? यदि कोई विधायक या सांसद चुनाव जीतने के तुरंत बाद दूसरी पार्टी में चला जाता है और उसके पास नई पार्टी का समर्थन करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक आधार नहीं है, तो क्या उसे मतदाताओं के पास लौटकर नया जनादेश नहीं लेना चाहिए? यहीं लोकतांत्रिक नैतिकता और कानूनी अधिकार के बीच बड़ा सवाल खड़ा होता है। कानून कई स्थितियों में दलबदल को नियंत्रित करता है, लेकिन हर राजनीतिक अवसरवाद को कानून रोक नहीं सकता। कानून रास्ता रोक सकता है, चरित्र नहीं बदल सकता।
‘आया राम, गया राम’ से आज की राजनीति तक
भारत में दलबदल कोई नई बीमारी नहीं है। 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल के बार-बार दल बदलने के बाद आया राम, गया राम राजनीतिक मुहावरा बन गया। तब से लेकर आज तक भारतीय राजनीति ने दलबदल के अनगिनत दृश्य देखे हैं। कभी मंत्री पद के लिए पाला बदला गया, कभी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा में समर्थन बदला गया, कभी टिकट के लिए दल छोड़ा गया और कभी सत्ता पक्ष में शामिल होकर राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश हुई। व्यंग्य यह है कि विचारधारा वही रहती है जिसे सत्ता का पता मालूम हो।
सत्ता दिखी तो हृदय परिवर्तन!
दलबदल के समय सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द है कि हृदय परिवर्तन। कल तक जिस नेता को पार्टी में कोई कमी नजर नहीं आती थी, आज उसे पार्टी में भ्रष्टाचार, परिवारवाद, नेतृत्व संकट और विचारधारा का पतन दिखाई देने लगता है और जिस पार्टी को वह कल तक जनविरोधी कहता था, उसी में प्रवेश करते ही वहां उसे राष्ट्रहित, विकास और स्थिरता दिखाई देने लगती है। यह हृदय परिवर्तन अगर चुनाव से छह महीने पहले हो तो शायद राजनीतिक विचारधारा कहा जा सकता है। लेकिन चुनाव परिणाम के बाद अचानक सत्ता पक्ष की तरफ बढ़ते कदमों को जनता किस नाम से पुकारे?
एजेंसियों का साया और राजनीतिक दबाव
भारतीय राजनीति में दलबदल के साथ केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी लगातार राजनीतिक आरोप लगते रहे हैं। विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद कई नेताओं के राजनीतिक रुख बदलते हैं। सत्ता पक्ष इन आरोपों को खारिज करते हुए कहता है कि जांच एजेंसियां अपना काम कानून के अनुसार करती हैं। सच्चाई जो भी हो, लोकतंत्र में धारणा भी महत्वपूर्ण होती है। यदि जनता के मन में यह सवाल पैदा हो जाए कि सत्ता के खिलाफ खड़े नेता पर जांच और सत्ता के करीब आते ही राहत तो संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
मजबूत किला बाहर से नहीं, अंदर से टूटता है
किसी राजनीतिक दल का बार-बार टूटना केवल बाहरी साजिश का परिणाम नहीं हो सकता। अंदर की कमजोरी भी इसके लिए जिम्मेदार होती है। क्षेत्रीय दलों को आत्ममंथन करना होगा। पुराने नेताओं का अत्यधिक दबदबा, नई पीढ़ी को नेतृत्व का अवसर न मिलना, परिवारवाद, टिकट वितरण में अपारदर्शिता और संगठन में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव ये सभी ऐसी दरारें हैं जिनसे राजनीतिक सेंधमारी आसान होती है। मजबूत किला बाहर से तभी टूटता है जब उसकी अंदरूनी दीवारों में पहले से दरारें हों। इसलिए दलबदल के लिए केवल उस दल को दोष देना पर्याप्त नहीं है जो दूसरे दल के नेताओं को अपने साथ लाता है। जिस पार्टी के नेता लगातार टूट रहे हैं, उसे भी अपने संगठन की कमजोरी देखनी होगी।
दल बदलने पर कानून है, अवसरवाद पर क्या?
दल-बदल विरोधी कानून ने विधायकों और सांसदों के मनमाने दलबदल पर कुछ संवैधानिक अंकुश लगाया है। लेकिन राजनीति ने उसके भीतर भी रास्ते खोज लिए विलय, सामूहिक दलबदल और अन्य संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या को लेकर विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। इसलिए सवाल केवल कानून बनाने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को पार्टी बदलने के बाद तत्काल पद और सत्ता का लाभ मिलना चाहिए? क्या उसे इस्तीफा देकर फिर जनता के बीच जाना चाहिए? क्या मतदाता को अंतिम फैसला करने का अवसर मिलना चाहिए? यह बहस अब टाली नहीं जा सकती।
राष्ट्रीय दल मजबूत, क्षेत्रीय दल कमजोर?
दलबदल की राजनीति का सबसे बड़ा असर क्षेत्रीय दलों पर पड़ सकता है। क्षेत्रीय दल केवल राजनीतिक संगठन नहीं हैं। वे राज्यों की भाषा, संस्कृति, स्थानीय पहचान और क्षेत्रीय मुद्दों की आवाज भी रहे हैं। यदि लगातार सत्ता के दबाव और राजनीतिक जोड़-तोड़ के कारण क्षेत्रीय दल कमजोर होते गए, तो भारतीय राजनीति में विविधता भी कमजोर होगी। राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत राष्ट्रीय दल जरूरी हैं, लेकिन लोकतंत्र में मजबूत क्षेत्रीय आवाजें भी उतनी ही जरूरी हैं। सभी दलों को आईना देखने की जरूरत दलबदल की बीमारी का दोष किसी एक राजनीतिक दल पर डालकर समस्या खत्म नहीं होगी। सभी दलों को अपने संगठन के भीतर लोकतंत्र मजबूत करना होगा। टिकट वितरण में पारदर्शिता हो। पार्टी अध्यक्षों का चयन लोकतांत्रिक तरीके से हो। पदाधिकारियों के चयन में कार्यकर्ताओं की भूमिका हो। परिवारवाद पर नियंत्रण हो। युवा नेतृत्व को अवसर मिले। जब पार्टी कुछ लोगों की निजी संपत्ति बन जाती है तो असंतोष पैदा होता है और वही असंतोष दलबदल का रास्ता खोलता है।
जनादेश का सम्मान ही लोकतंत्र की पहली शर्त
जनता चुनाव में पांच साल के लिए प्रतिनिधि चुनती है। यदि प्रतिनिधि पांच महीने में ही अपना राजनीतिक ठिकाना बदल लेता है, तो लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण शब्द जनादेश का अर्थ कमजोर पड़ता है। जनता सब देखती है उसे पता रहता है कि कौन कब किसके साथ गया। कौन किसके खिलाफ बोलता था और कब उसी के साथ खड़ा हो गया। कौन टिकट न मिलने पर विचारधारा बदल बैठा और कौन सत्ता की कुर्सी देखकर अपने पुराने भाषण भूल गया। इसलिए राजनीति में चाहे कितने भी तर्क दिए जाएं, अंतिम फैसला जनता की स्मृति करती है। पब्लिक है, सब जानती है अंदर क्या है, बाहर क्या है। दलबदल की राजनीति पर लगाम लगाने का सबसे मजबूत रास्ता केवल कानून नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता है। लोकतंत्र में सत्ता हासिल करना अपराध नहीं, लेकिन सत्ता के लिए जनादेश की आत्मा को कुचलना लोकतांत्रिक विश्वास के साथ छल जरूर है। वोट जनता का, सरकार जनता की, प्रतिनिधि जनता का तो फिर सत्ता का सौदा किसके नाम पर?




