पत्रकारिता का पतित काल,मीडिया जगत में चौतरफा गोलमाल

- कलम घिसती रही जमीन पर, पत्रकारिता नोटों के बिस्तर पर आराम करती रही!
- सत्ता के दरवाजे की कालीन नहीं, सवालों का आईना है पत्रकारिता
- प्रेस नोट छापना आसान, दस्तावेज खंगालकर सच निकालना मुश्किल
- जब खबर से पहले संपर्क और विज्ञापनदाता की नाराजगी का हिसाब होने लगे
- एक कलम जमीन पर सच खोज रही, दूसरी सुविधा की तलाश में सत्ता के गलियारों में
- नोटों का बिस्तर आराम दे सकता है, लेकिन पाठक का विश्वास नहीं खरीद सकता
- कलम बिकेगी या सवाल पूछेगी यही पत्रकारिता और लोकतंत्र की असली अग्निपरीक्षा
पत्रकारिता कभी सत्ता के दरवाजे पर बिछने वाली कालीन नहीं थी। वह वह आईना थी जिसे सत्ता के सामने खड़ा किया जाता था, ताकि चेहरे पर लगे दाग छिपाए न जा सकें। लेकिन बदलते समय में सवाल यह नहीं रह गया है कि पत्रकार किस विचारधारा के साथ खड़ा है। असली सवाल यह है कि उसकी कलम किसके सामने झुकती है और किसके लिए उठती है? जनता के लिए या सत्ता के लिए? सच के लिए या सुविधा के लिए? खबर के लिए या विज्ञापन के लिए? प्रख्यात लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने सत्ता, भाषा और सूचना के संबंध को लेकर जिस खतरे की ओर संकेत किया था, वह आज पत्रकारिता के सामने और ज्यादा गंभीर रूप में दिखाई देता है। सआदत हसन मंटो ने समाज के उन चेहरों को बेनकाब किया जिन्हें सभ्य समाज पर्दे के पीछे रखना चाहता था। पत्रकारिता का भी यही धर्म रहा है—जो छिपाया जा रहा है, उसे सामने लाना और जिस सवाल से सत्ता बचना चाहती है, वही सवाल जनता के सामने रखना। मगर जब पत्रकार की कलम खबर से पहले सुविधा तलाशने लगे, जब दस्तावेज से ज्यादा संपर्क महत्वपूर्ण हो जाए और जब सवाल पूछने के बजाय यह सोचा जाने लगे कि “कहीं कोई नाराज न हो जाए”, तब पत्रकारिता और प्रचार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। एक ओर पत्रकार अपनी कलम घिसकर सच खोज रहा है, दूसरी ओर कुछ के लिए पत्रकारिता नोटों के बिस्तर पर आराम करने का माध्यम बनती जा रही है। यही वह फर्क है, जो पत्रकारिता के भविष्य और लोकतंत्र की विश्वसनीयता दोनों को तय करेगा।

कलम किसके लिए? सवाल यही है
पत्रकारिता का जन्म सत्ता की प्रशंसा करने के लिए नहीं हुआ था। पत्रकारिता का मूल स्वभाव ही सवाल है। जहां सत्ता है, वहां सवाल होना चाहिए। जहां सरकारी धन है, वहां हिसाब होना चाहिए। जहां जनता से वादा है, वहां जवाबदेही होनी चाहिए। जहां अन्याय है, वहां पत्रकार की आवाज सुनाई देनी चाहिए। लेकिन आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट पत्रकार के विचारों का अलग होना नहीं है। विचार अलग-अलग हो सकते हैं। दृष्टिकोण अलग हो सकता है। खबर को देखने का नजरिया भी अलग हो सकता है। यह लोकतंत्र की स्वाभाविक खूबसूरती है। खतरा तब पैदा होता है जब पत्रकार का विवेक किसी कीमत पर गिरवी रख दिया जाए। जब कलम यह तय करने लगे कि किसके खिलाफ लिखने से विज्ञापन जाएगा, किस अधिकारी से सवाल करने पर संबंध खराब होंगे, किस नेता की आलोचना करने पर सुविधा बंद हो सकती है और किस ताकतवर व्यक्ति की तारीफ करने से दरवाजे खुल सकते हैं—तब पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं रहती, उसकी आत्मा पर भी सवाल खड़ा हो जाता है।
प्रेस नोट से खबर तक का सफर खत्म क्यों हो रहा
आज पत्रकारिता का एक बड़ा संकट यह भी है कि कई जगह प्रेस नोट ही खबर का अंतिम रूप बन जाता है।
किसी विभाग ने उपलब्धि बताई छप गई। किसी नेता ने दावा किया खबर बन गई। किसी अधिकारी ने योजना की सफलता गिनाई शीर्षक तैयार। लेकिन असली सवाल कहां है? योजना में कितना पैसा आया? कितना खर्च हुआ? लाभार्थी कौन हैं? जमीन पर क्या हुआ? किसे लाभ नहीं मिला? शिकायतें कितनी हैं? जवाबदेह कौन है? यही पत्रकारिता के असली प्रश्न हैं। प्रेस नोट सूचना हो सकता है, लेकिन वह पत्रकारिता का अंतिम सत्य नहीं हो सकता। पत्रकार का काम प्रेस नोट को सजाकर छापना नहीं, उसके पीछे छिपे तथ्य को खोजना है।
एक पत्रकार जमीन पर, दूसरा संपर्कों के बीच
पत्रकारिता में दो तस्वीरें आज भी साफ दिखाई देती हैं।
पहली तस्वीर उस पत्रकार की है जो धूल भरी सड़क पर जाता है। सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाता है। दस्तावेज मांगता है। आरटीआई लगाता है। पीड़ित से मिलता है। अधिकारी का पक्ष पूछता है। आंकड़े मिलाता है। महीनों किसी मामले को खंगालता है और फिर खबर लिखता है। दूसरी तस्वीर उस पत्रकार की है जिसके लिए खबर से पहले संपर्क महत्वपूर्ण है। उसे खबर की चिंता कम और यह चिंता ज्यादा होती है कि कौन नाराज होगा और कौन खुश। पहला पत्रकार खबर के पीछे तथ्य तलाशता है। दूसरा खबर से पहले संबंध तलाशता है। पहला दस्तावेज लेकर आता है। दूसरा निमंत्रण-पत्र लेकर लौटता है। पहला सवाल पूछता है। दूसरा तस्वीर खिंचवाता है। यही फर्क पत्रकारिता और सुविधा की पत्रकारिता के बीच की सबसे बड़ी रेखा है।
विज्ञापन बनाम खबर का सवाल
अखबार चलाना आसान नहीं है। चैनल चलाना आसान नहीं है। डिजिटल मीडिया संस्थान चलाना भी आसान नहीं है। आर्थिक संसाधन चाहिए। कर्मचारी चाहिए। तकनीक चाहिए। वितरण व्यवस्था चाहिए। लेकिन संस्थान की आर्थिक मजबूरी का पूरा बोझ पत्रकारिता की रीढ़ पर डाल देना भी उचित नहीं। जब विज्ञापनदाता यह तय करने लगे कि उसके बारे में खबर कैसी होगी, तब खबर की स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। विज्ञापन जरूरी हो सकता है, लेकिन विज्ञापन खबर का मालिक नहीं हो सकता। राजस्व जरूरी है, लेकिन राजस्व के बदले खबर की आत्मा बेच देना पत्रकारिता नहीं हो सकती। क्योंकि पाठक अखबार खरीदता है विज्ञापन देखने के लिए नहीं, सच जानने के लिए।
जनता की आवाज कौन उठाएगा?
जिस गरीब के पास मंत्री तक पहुंच नहीं है, अधिकारी तक पहुंच नहीं है, अदालत तक पहुंचने की आर्थिक ताकत नहीं है उसके पास पत्रकारिता एक उम्मीद होती है। किसी अस्पताल में इलाज न मिले, किसी सड़क का निर्माण घटिया हो, किसी सरकारी योजना का लाभ कागज पर हो और जमीन पर न हो, किसी विभाग में भ्रष्टाचार का आरोप हो, किसी मजदूर का भुगतान अटका हो, किसी गांव की समस्या महीनों से अनसुनी हो, ऐसे मामलों में पत्रकार की कलम सिर्फ खबर नहीं लिखती, वह उस व्यक्ति की आवाज बनती है। इसीलिए पत्रकारिता का असली मूल्य उसके द्वारा प्रकाशित खबरों की संख्या में नहीं, बल्कि उन आवाजों में है जिन्हें उसने जगह दी।
सत्ता कोई भी हो, सवाल वही रहेंगे
पत्रकारिता का धर्म सत्ता के चेहरे के साथ नहीं बदल सकता। आज एक दल सत्ता में है, कल दूसरा होगा।
आज कोई मुख्यमंत्री है, कल कोई और होगा। मंत्री बदलेंगे, अधिकारी बदलेंगे, सरकारें बदलेंगी, लेकिन पत्रकारिता का सवाल नहीं बदलना चाहिए। जनता को क्या मिला? पैसा कहां गया? काम हुआ या सिर्फ कागज पर हुआ? जिम्मेदार कौन है? जवाब कब मिलेगा?
जो पत्रकार सत्ता बदलते ही अपने सवाल बदल देता है, वह सवाल नहीं पूछता वह सत्ता की दिशा देखकर अपनी भाषा तय करता है और यही पत्रकारिता के लिए सबसे खतरनाक मोड़ है।
पत्रकार का काम सरकार बनाना या गिराना नहीं
पत्रकारिता का काम किसी सरकार को बनाना या गिराना नहीं है। पत्रकार का काम तथ्य जनता के सामने रखना है। अगर सरकार अच्छा काम कर रही है तो उसे तथ्य के साथ बताना भी पत्रकारिता है। अगर सरकार की योजना विफल हो रही है तो उसे सामने लाना भी पत्रकारिता है। अगर विपक्ष गलत है तो उसके खिलाफ लिखना भी पत्रकारिता है। अगर सत्ता गलत है तो उसके खिलाफ सवाल उठाना भी पत्रकारिता है। पत्रकार का कोई स्थायी राजनीतिक मित्र या शत्रु नहीं होना चाहिए। उसका स्थायी पक्ष जनता और तथ्य होने चाहिए। आरटीआई से लेकर जमीन तक की पत्रकारिता
आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो सुविधाओं के बजाय संघर्ष चुनते हैं। वे सरकारी वेबसाइटों पर आंकड़े तलाशते हैं।
पुरानी फाइलें खंगालते हैं। आरटीआई लगाते हैं, अधिकारियों को फोन करते हैं, पीड़ितों के घर पहुंचते हैं, दस्तावेजों की पुष्टि करते हैं। एक तथ्य के लिए कई स्रोतों से जानकारी मिलाते हैं और फिर खबर प्रकाशित करते हैं। ऐसी खबर शायद चमकदार न हो, उससे पत्रकार को मंच पर माला न मिले। शायद कोई बड़ा विज्ञापन भी न आए। लेकिन अगर उस खबर से किसी पीड़ित को न्याय मिला, किसी अधिकारी से जवाब मांगा गया या सरकारी धन के इस्तेमाल पर सवाल खड़ा हुआ तो वही पत्रकारिता की असली सफलता है।
नोटों का बिस्तर कितना आरामदेह?
सुविधा की पत्रकारिता बाहर से बहुत चमकदार दिखाई दे सकती है। मंच, माला, सम्मान, निमंत्रण, संबंध, फोटो, प्रभाव और कभी-कभी आर्थिक लाभ भी। लेकिन सवाल यह है कि इन सबके बीच कलम कहां है? अगर कलम सिर्फ प्रशस्ति लिख रही है तो वह पत्रकारिता कितनी बची? अगर सवाल पूछने से पहले लाभ-हानि का हिसाब लगाया जा रहा है तो पत्रकार की स्वतंत्रता कितनी बची? अगर किसी खबर को सिर्फ इसलिए दबा दिया गया कि उससे ताकतवर व्यक्ति नाराज हो जाएगा तो पाठक का अधिकार कहां गया। नोटों का बिस्तर आराम दे सकता है, लेकिन वह पत्रकारिता को इतिहास में सम्मान नहीं देता। कलम घिसती रहे, लेकिन बिके नहीं ईमानदार पत्रकारिता आसान रास्ता नहीं है। सवाल पूछने पर फोन आ सकता है, दबाव आ सकता है, नाराजगी हो सकती हैनोटिस आ सकता है. मुकदमा भी हो सकता है। संस्थान के भीतर से दबाव आ सकता है। फिर भी पत्रकारिता का अर्थ यही है कि पत्रकार तथ्य की सीमा के भीतर खड़ा रहे। इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर खबर में सनसनी हो। हर अधिकारी को अपराधी बना देना पत्रकारिता नहीं। हर आरोप को सत्य मान लेना पत्रकारिता नहीं। बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगाना पत्रकारिता नहीं। सच्ची धार तथ्य से आती है, शोर से नहीं। इसलिए अचूक पत्रकारिता का पहला हथियार आक्रामक भाषा नहीं, ठोस प्रमाण है। इतिहास किसे याद रखता है, समय बीत जाता है, सत्ता बदल जाती है, पुराने विज्ञापन गायब हो जाते हैं, मंचों की तस्वीरें धुंधली पड़ जाती हैं।
सम्मान-पत्र फाइलों में बंद हो जाते हैं। लेकिन किसी पत्रकार द्वारा लिखी गई वह खबर बची रहती है जिसने सत्ता से सवाल पूछा था। वह रिपोर्ट बची रहती है जिसने किसी गरीब की आवाज को जगह दी थी। वह दस्तावेज बचा रहता है जिसने किसी भ्रष्ट व्यवस्था का पर्दाफाश किया था। वह सवाल बचा रहता है जिसने जिम्मेदार व्यक्ति को जवाब देने के लिए मजबूर किया था। यही पत्रकारिता की असली विरासत है। इसलिए फर्क बिल्कुल साफ है। एक पत्रकार अपनी कलम सच की तलाश में घिसता है और दूसरा सुविधा की कीमत पर उसे चलाता है। एक जनता के बीच अपनी जगह बनाता है। दूसरा सत्ता के गलियारों में अपनी जगह खोजता है। एक खबर के लिए संघर्ष करता है। दूसरा खबर से मिलने वाले लाभ का हिसाब करता है। एक की कलम कागज पर निशान छोड़ती है। दूसरे की कलम शायद नोटों के बिस्तर पर आराम करती है। लेकिन इतिहास आराम करने वाली कलम को नहीं, संघर्ष करने वाली कलम को याद रखता है। क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य आज भी इसी सवाल पर टिका है कलम बिकेगी या सवाल पूछेगी और जब तक किसी पत्रकार के भीतर यह सवाल जिंदा है साहब, यह हुआ क्यों? पैसा कहां गया? जिम्मेदार कौन है? जनता को जवाब कब मिलेगा? तब तक पत्रकारिता पूरी तरह हारी नहीं है। कलम घिसती रहे, मगर बिके नहीं। यही पत्रकारिता की असली पहचान है।
* पत्रकारिता का धर्म सत्ता की चापलूसी नहीं, उससे सवाल पूछना है
* प्रेस नोट को खबर बनाने वाले पत्रकार और दस्तावेज खंगालने वाले पत्रकार में फर्क
* विज्ञापन और खबर की सीमा मिटे तो पत्रकारिता प्रचार में बदल जाती है
* जनता के सवाल से ज्यादा ‘किसे नाराज नहीं करना’ महत्वपूर्ण हुआ तो कलम की स्वतंत्रता खतरे में
* एक पत्रकार आरटीआई, दस्तावेज और संघर्ष से खबर खोजता है, दूसरा संपर्क और सुविधा से
* पत्रकारिता की असली पूंजी पैसा नहीं, पाठक का विश्वास है
* सत्ता किसी भी दल की हो, सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म है
* इतिहास नोटों के बिस्तर पर सोने वालों को नहीं, सच लिखने वालों को याद रखता है




