मोदी का नही चलेगा देश मे अब हिन्दू मुस्लिम का एजेंडा,सिर्फ विकास की बहेगी गंगा
जंतर-मंतर आंदोलन ने यूपी में भाजपा की हवा निकाली, आंतरिक सर्वे से मची खलबली; नहीं चल रहा हिंदू-मुस्लिम का फंडा

- नवंबर-दिसंबर में हो सकते हैं यूपी विधानसभा के अगले चुनाव
- भाजपा के सर्वे में 67 सीटों तक का नुकसान, बहुमत मुश्किल
- सहयोगी दलों ने कमजोरी भांपी, पार्टी पर दबाव बढ़ना शुरू
- सर्वे में 35% मौजूदा विधायकों के टिकट काटने की सिफारिश
- पेपर लीक, बेरोजगारी, चंदा चोरी और विधायकों की निष्क्रियता बड़ा मुद्दा

नई दिल्ली/लखनऊ। जंतर- मंतर पर जेन जी आंदोलन के बाद बदली हुई देश की सियासत में यूपी की भाजपा में खलबली मची है। माना जा रहा है कि इसी साल नवंबर-दिसंबर में यूपी के विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। लेकिन भाजपा के आंतरिक सर्वे में भाजपा को अभी के हालात में 52 से 67 सीटों का नुकसान साफ दिख रहा है। भाजपा के लिए सबसे चिंताजनक बात यह है कि पार्टी का हिंदू-मुस्लिम एजेंडा अब चल नहीं पा रहा है। इसी को देखते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ रैलियां कर विभिन्न जिलों में प्रोजेक्ट्स की बंदरबांट शुरू की है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अब 9 साल तक हिंदू-मुस्लिम करने के बाद अक्ल आना बहुत ज्यादा देरी की बात है। योगी को तीसरी बार सत्ता हासिल करने के लिए 202 सीटें चाहिए। उसके पास अभी 255 सीटें हैं। अगर हालात और खराब हुए तो भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ सकता है।
भाजपा की कमजोर स्थिति को देखते हुए सहयोगी दलों ने भी भाजपा से ज्यादा सीटें मांगनी शुरू की हैं। पश्चिम यूपी में दबदबा रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल ने भाजपा के सामने 36 विधानसभा सीटों की मांग की है। इनमें से कई€्र सीटों पर भाजपा 2022 में संघर्ष करती नजर आई थी। लेकिन भाजपा रालेाद को 20 से ज्यादा सीटें देना नहीं चाहती। इससे अवध और पूर्वांचल से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे रालोद के नेताओं को झटका लगना तय है।

मान-मनौव्वल का दौर जारी
रालोद की नजर पश्चिमी उत्तरप्रदेश की उन विधानसभा सीटों पर है जहां जाट समुदाय और किसान राजनीति का प्रभाव अधिक माना जाता है। इन इलाकों में उसकी मजबूत मौजूदगी एनडीए को चुनावी फायदा दिला सकती है। इसी आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग रखी गई है। बताया जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व सभी सहयोगी दलों के साथ लगातार बातचीत कर रहा है। चुनाव नजदीक आने के साथ सीटों के बंटवारे पर अंतिम फार्मूला तय किया जाएगा। पिछले चुनाव में रालोद को सबसे ज्यादा सफलता मुजफ्फरनगर जिले में मिली। खतौली उपचुनाव में रालोद के टिकट पर मदन भइया ने भाजपा के उम्मीदवार को हराकर बड़ा झटका दिया। इसके साथ ही रालोद के विधायकों की संख्या 9 तक पहुंच गई। लेकिन 2024 में रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयन्त चौधरी ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से हाथ मिलाया। गठबंधन का परिणाम रहा कि रालोद के टिकट पर बागपत से राजकुमार सांगवान और बिजनौर से चंदन चौहान जीत गए। जयन्त चौधरी केंद्रीय मंत्री बने। अब उनका फोकस ‘जाट एवं किसान की पार्टी’ की खोल से बाहर निकलकर सर्वसमाज को अपने साथ जोड़ने पर है, जिसके लिए वह पश्चिम एवं मध्य उत्तर प्रदेश के साथ ही बुंदेलखंड क्षेत्र में भी जनसभाएं कर रहे हैं। पुरकाजी के रालोद विधायक व दलित चेहरा अनिल कुमार को योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया।

वाराणसी में भी बाबर और औरंगज़ेब
सीएम योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी की बुधवार को हुई सभा में खाली कुर्सियां और लोगों, खासकर महिलाओं को लौटते देखा गया। योगी पार्टी के ‘समरसता संकल्प अभियान’ की शुरुआत करने भदोही पहुंचे थे, जहां उन्होंने शहर का नाम ही बदल दिया। दलित-पिछड़ों को लुभाने के लिए उन्होंने मंच से शहर का नाम संत रविदास नगर करने का ऐलान किया। हालांकि, उन्होंने खाली कुर्सियों से भरी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कहा कि याद रखना!, बांटने वाले लोग वही हैं, जिनके आदर्श बाबर और औरंगजेब हैं। इसका मतलब है कि योगी अभी तक यही नहीं समझ सके हैं कि भारत के 35 करोड़ युवाओं और जेन जी ने भाजपा के हिंदू-मुस्लिम प्रचार को नकार दिया है। यह भी मुमकिन है कि भाजपा मुख्यालय से अभी तक सीएम को पार्टी की प्रचार लाइन अभी तक नहीं मिली हो। हालांकि, इस समरसता संकल्प यात्रा के जरिए भाजपा की कोशिश है कि दलित और पिछड़ों के वोट बैंक को समाजवादी पार्टी के साथ जाने से रोकने की कोशिश में हैं। लेकिन दलित यह नहीं भूले हैं कि उत्तरप्रदेश में पिछले 10 वर्षों (2016-2026) में दलितों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न के मामलों में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारी संख्या दर्ज की गई है, जिसमें राज्य देश में शीर्ष स्थान पर रहा है। अकेले यूपी में देश भर में दलितों के खिलाफ होने वाले कुल अपराधों का लगभग 23% से 26% हिस्सा दर्ज किया गया है। एनसीआरबी की रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत हर साल 11,000 से लेकर 15,000 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। ब्राह्मण और ठाकुरों के राज में दलितों पर हुई हिंसा की घटनाओं की छाप लोगों के दिलों में है। योगी सभा में लौटते लोगों को देखकर यह साफ नजर आ रहा था कि दलितों ने भाजपा के चाल-चरित्र और चेहरे को अच्छी तरह से भांप लिया है। भाजपा के भीतरी सूत्रों के अनुसार, सभा के दौरान 90 फीसदी खाली कुर्सियों को देखकर योगी ने अफसरों और पार्टी पदाधिकारियों की जमकर क्लास लगाई है।
35% विधायकों के टिकट काटने की सिफारिश
भाजपा के आंतरिक सर्वे में मौजूदा 35% विधायकों के टिकट काटने की सिफारिश की गई है। सर्वे के अनुसार, पूर्वांचल में विधायकों को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी है। नेशन विद नमो एजेंसी के इस सर्वे में भाजपा के खिलाफ यूपी में भारी सत्ता विरोधी लहर की चेतावनी दी गई है। सर्वे का काम मार्च से जुलाई के दूसरे सप्ताह तक हुआ है। यानी इस सर्वे में 20 जुलाई के बाद जंतर-मंतर पर युवाओं के आंदोलन के बाद का माहौल शामिल नहीं है। सर्वे रिपोर्ट में लोगों की नाराजगी को 2 तरह से बांटा गया है। पहली कैटेगरी में सरकार यानी केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों से नाराजगी को रखा गया है। दूसरी कैटेगरी में विधायकों के लिए गुस्से को रखा गया। लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा यूजीसी के नए नियमों की रही। इनमें दलित, पिछड़े और अन्य वंचित वर्ग के छात्रों ने माना कि उनकी शिकायतों को सुनने के लिए जो समिति बनाने का प्रावधान था, उसको रोकना गलत था। सामान्य वर्ग का कहना था कि इससे हमारे बच्चे कॉलेज में असुरक्षित माहौल में पढ़ेंगे।
अयोध्या में चंदा चोरी अब बड़ा मुद्दा
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना के बाद अवध और पूर्वांचल में भाजपा के समर्थकों में नाराजगी सामने आई। सीधे तौर पर लोग भाजपा को जिम्मेदार नहीं मान रहे, लेकिन उनका कहना है कि इसको रोका जा सकता था। लोगों का योगी राज में नौकरशाही को लेकर भारी गुस्सा है। उनका कहना है कि तहसील स्तर पर न तो सरकारी योजनाओं का फायदा समाज के सबसे निचले स्तर तक मिल रहा है और न ही लोगों की शिकायतों की सुनवाई हो रही है। भर्ती परीक्षाओं में हो रही धांधली, बेरोजगारी, नीट पेपर लीक और पेट्रोल के नाम पर एथेनॉल की मिलावट भी लोगों के लिए बड़े मुद्दे रहे। साफ है कि भाजपा के लिए एनडीए और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती साबित होने जा रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने 2 एजेंसियों से सर्वे कराया था। उसी रिपोर्ट के आधार पर भाजपा ने 120 से ज्यादा विधायकों के टिकट काट दिए थे। 403 में से 165 सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे थे। इसके बावजूद भाजपा की सीटें 2017 के मुकाबले 312 से घटकर 255 रह गई थीं। इससे भाजपा को 57 सीटों का नुकसान हुआ था। यादवों को सपा का पारंपरिक वोटर माना जाता रहा है। सपा शासन में कई मामलों में यादवों की सुनवाई जल्दी हो जाती थी। ऐसे में गैर-यादव लोगों में उनके लिए नाराजगी देखी जाती थी। लेकिन, पिछले 5 साल में यह नाराजगी कम हुई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक अलग सर्वे करवा रहे हैं। निजी एजेंसी गांव-गांव जाकर लोगों से सरकार, विधायकों और मुख्यमंत्री की छवि पर फीडबैक जुटा रही है।
चंदा चोरी के लिए मोदी-योगी जिम्मेदार
हरदोई जिले के लोगों का कहना है कि हर गांव में लोग अयोध्या से जुड़े रील देख रहे हैं। अब हर कोई चंपत राय का नाम जानता है, जिन्होंने दान चोरी का मामला सामने आने के बाद मंदिर ट्रस्ट के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया, और उनके पूर्व ड्राइवर टिन्नू यादव का नाम भी। गांव के लोगों ने मंदिर के लिए दान दिया था, इसलिए लोगों में गुस्सा है। लोगों का यह भी मानना है कि राम मंदिर में जो हुआ, उसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों जिम्मेदार हैं। मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों का चुनाव केंद्र सरकार ने किया था, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी जिम्मेदार हैं। इसी तरह राज्य पुलिस को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी, इसलिए मुख्यमंत्री योगी भी जिम्मेदार हैं। मीडिया उन्हें बचा रहा है। जवाबदेही ऊपर तक तय होनी चाहिए। हरदोई जिले के मीनापुर गांव के 45 वर्षीय दलित किसान सुक्रू लाल ने कहा, “राम मंदिर में कथित चोरी बड़ा मामला हो सकता है, लेकिन हमारे लिए गांव और ब्लॉक स्तर पर फैला भ्रष्टाचार उससे भी बड़ी समस्या है।” उन्होंने कहा, “हमने सरकारी योजना के तहत दो बार शौचालय के लिए आवेदन किया, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। चंदा चोरी छोड़िए, यहां अधिकारी चोर हैं, प्रधान चोर हैं। जनता का हक खा रहे हैं।”
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद भाजपा के लिए यूपी में नीट पेपर लीक को नकारना मुश्किल होगा, क्योंकि यूपी के हर परिवार से कोई न कोई छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। दिल्ली में छात्रों पर हुए पुलिस एक्शन और लगातार रद्द होती परीक्षाओं ने युवाओं के गुस्से को सीधे चुनाव से जोड़ दिया है। अखिलेश यादव ने बिना देर किए चंदा चोरी के साथ-साथ ‘पेपर लीक’ और एनटीए के पुनर्गठन को अपनी मुख्य पिच बना लिया है। सीएम योगी आदित्यनाथ भी जानते हैं कि युवाओं की नाराजगी 2027 में बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। योगी सरकार राज्य स्तर पर पेपर लीक माफियाओं पर बुलडोजर एक्शन लाने की कोशिश में है। चंदा चोरी के मामले में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है, “राम मंदिर का चंदा चोरी मुद्दा गायब नहीं हुआ है, बल्कि वह राजनीतिक रूप से शांत पड़ गया है। जब सुप्रीम कोर्ट और एसआईटी इस मामले पर कार्रवाई कर रही है, तब बीजेपी इसे प्रशासनिक चूक बताकर डैमेज कंट्रोल कर चुकी है। लेकिन नीट विवाद और बेरोजगारी ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जो सीधे आम मतदाताओं के घरों से जुड़ा है, इसलिए 2027 तक असली मुकाबला ‘हिंदुत्व-विकास’ बनाम ‘पेपर लीक-बेरोजगारी’ के बीच ही होगा।”
संसद में चंदा चोरी पर नुक्कड़ नाटक
संसद में शुक्रवार को तब अनोखा विरोध-प्रदर्शन देखने को मिला जब निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने संसद परिसर में अयोध्या के राम मंदिर में दान की कथित चोरी को लेकर एक ‘नुक्कड़ नाटक’ किया। इस नाटक में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी कुछ देर के लिए भाग लिया और प्रतीकात्मक रूप से दान पेटी में पैसे डालते हुए दिखाई दिए। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान समाजवादी पार्टी के कई सांसद भी मौजूद रहे। वहीं, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद परिसन में सांसदों द्वारा अलग-अलग वेशभूषा पहनकर आने पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे सदन की गरिमा के खिलाफ बताया। विपक्ष लगातार इस मुद्दे को संसद में उठाने की मांग कर रहा है, लेकिन अभी तक सदन से इसकी मंजूरी नहीं मिली है।
अखिलेश का भाजपा पर निशाना
अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर पोस्ट कर कहा- ‘भाजपा और उनके संगी-साथी ‘आस्था के साथ विश्वासघात के महापाप और अपराध’ के दोषी हैं!
देश की आस्थावान जनता का मानना है कि भाजपा और उनके संगी-साथियों ने ‘श्रद्धा में सेंधमारी’ करते हुए जिस तरह:
- ‘दान-पात्र’ से चढ़ावा-चंदा चोरी की है
- गुप्त दान में महा-घपले किये हैं
- दान की रसीद दी ही नहीं है या दान के बदले नकली रसीद छपवाकर दी है
- अपने लोगों को कौड़ियों के दाम में अयोध्या की ज़मीनें ख़रीदवाकर, फिर उसे बीसों गुना दाम में करोड़ों में मंदिर को बेचकर ट्रस्ट के ‘धर्म-खाते’ को लूटा है
- ज़मीन के सौदे के अशुभ लाभ को आपस में बांटा है
- ईमानदार लोगों द्वारा आपत्ति किये जाने पर उन्हें हटाया है
- हर जगह अपने भ्रष्ट लोग सेट किये हैं
- चोरी की राशि की बरामदगी को दर्ज़ नहीं कराया है
- जांच में कुछ भी ‘उल्लेखनीय’ नहीं है, ये कहकर गुमराह किया है
- सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग और अन्य सबूत मिटाए हैं
- जिनकी ख़ुद की जांच चल रही है, उनसे जांच करवाई है
- बिना किसी की ज़िम्मेदारी तय किये, ट्रस्ट के उच्चस्थ पदाधिकारियों को क्लीन चिट दे दी गई है
- मंदिर का धन और बहुमूल्य धातुओं को बोरों में भरकर कहीं और पहुंचाया है…
ये अक्षम्य ‘महापाप’ है. इसीलिए ‘लोकधन की लूट’ का मुद्दा लोक-संसद तक पहुंचाना और उठाना, हम सब का धर्म सम्मत कर्तव्य है. जो भाजपा का साथी, वो रामघाती-महापापी’
समाजवादी पार्टी ने पूरे प्रदेश में राम मंदिर मामले को लेकर विरोध प्रदर्शन किया है। सपा ये दावा कर रही है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सोशल मीडिया पोस्ट में चंदा/चढ़ावा चोरी करने का आरोप लगाने के बार ही सारी कार्रवाई हुई। अगर अखिलेश यादव पोस्ट करके आरोप ना लगाते तो चंदा चोरी करने वालों का कुछ नहीं होता और जो हो रहा था, वो होता रहता। जेन-ज़ी आंदोलन ने राजनैतिक दलों को मंथन करके नई पीढ़ी के मूड मिजाज को परखने पर मजबूर ज़रूर कर दिया है। जिस तरह दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलन ने केंद्र सरकार को झुकने को मजबूर किया, उसके बाद बीजेपी भी नई पीढ़ी को साधने के लिए माहौल समझने की कोशिश कर रही है वहीं विपक्ष ने जिस तरह से जेन-ज़ी को सपोर्ट किया, उसके बाद विपक्ष भी उसी वेव में ख़ुद को ढालकर एक नया वोट बैंक तैयार करने में जुटी दिखाई दे रही है।
डिंपल यादव होंगी सीएम का चेहरा?
लखनऊ में समाजवादी पार्टी दफ्तर के बाहर एक पोस्टर से हलचल पैदा हो गई है। शुक्रवार को सपा दफ्तर के बाहर अलग-अलग स्लोगन के माध्यम से संदेश दिए गए हैं। एक दिलचस्प स्लोगन लिखा गया है, “27 में अखिलेश का राज, 29 में डिंपल को ताज’ इस पोस्टर से अब डिंपल यादव के सीएम बनने की चर्चा तेज हो गई है। साल 2029 में डिंपल को ताज देने की बात को लेकर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि अखिलेश यादव सीएम पद छोड़ेंगे और इसलिए छोड़ेंगे क्योंकि 2029 के लोकसभा चुनाव में वह कैबिनेट का हिस्सा बनेंगे। यानी इंडिया अलायंस की सरकार आएगी और वह पीएम या मंत्री बनेंगे।
युवाओं पर डोरे डाल रही बसपा
मायावती की बहुजन समाज पार्टी भी युवाओं को पार्टी से जोड़ने की कवायद में जुट गई है। बीएसपी प्रमुख मायावती की भी नजर अब जेन-जेड (यानी युवा वर्ग पर है। यही कारण है कि उन्होंने अब पार्टी के युवा राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद के कंधों पर अहम जिम्मेदारी डाल दी है। मायावती के भतीजे आकाश आनंद इन दिनों पार्टी की सोशल मीडिया टीम को मजबूत करने में जुटे हैं। आकाश आनंद सोशल मीडिया के जरिए यूपी में बीएसपी की सरकार के दौर में हासिल की गईं उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने वाले हैं। पार्टी के प्रचार अभियान को गति देने के लिए वे जल्द ही दिल्ली में सोशल मीडिया की कोर टीम के साथ मंथन करने वाले हैं। बीएसपी के प्रचार में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद भी लेने की तैयारी की जा रही है। अखिलेश यादव की सपा और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (एएसपी) ऐसे दो दल हैं जो यूपी के विधानसभा चुनाव में मायावती की बीएसएपी के प्रतिद्वंद्वी हैं। इन दलों का वोट बैंक एक ही है।




