भारत में नहीं संभाल सके एयरपोर्ट की कमान अडानी इटली में हवाई अड्डा खरीद रहे साहेबान
इटली में एयरपोर्ट खरीद रहे हैं अडानी, बोली के दूसरे चरण में अमेरिका में मुआवजा भरते हुए कुछ कंगाल

- कहीं यह पीएम मोदी की इटली की पीएम मेलोनी ने दोस्ती का असर तो नहीं?
- इटली का सबसे व्यस्त पांचवां बड़ा एयरपोर्ट है कैटानिया
- 10 और कंपनियां भी हैं दौड़ में
- अमेरिका को सैटलमेंट पेमेंट करने पर अडानी को हुआ 1,160 करोड़ रुपए का घाटा

नई दिल्ली। भारत के दूसरे सबसे अमीर और विवादित उद्योगपति गौतम अडानी से भारत के एयरपोर्ट तो संभल नहीं रहे हैं, लेकिन अब वे इटली में एक एयरपोर्ट खरीदने की दौड़ में हैं। इटली के इस पांचवें सबसे व्यस्त एयरपोर्ट को खरीदने की दौड़ में वे बोली लगाने के दूसरे चरण में है। माना जा रहा है कि पीएम नरेंद्र मोदी की इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी की दोस्ती का अडानी को एक और तोहफा है।
इटली के कैटानिया एयरपोर्ट को खरीदने की रेस में गौतम अडानी समूह भी है। अडानी समूह की कंपनी अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स, एयरपोर्ट के प्राइवेटाइजेशन के लिए बोली लगाने की प्रक्रिया में दूसरे राउंड में पहुंच गई है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।
10 बोली दाताओं में शामिल
रॉयटर्स की खबर के अनुसार, एयरपोर्ट ऑपरेटर SAC के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर निको टोरिसी ने बताया कि अडानी समूह की कंपनी उन 10 बोलीदाताओं में शामिल है जिन्होंने शुरुआती चयन का चरण पार कर लिया है। शॉर्टलिस्ट किए गए बोलीदाताओं में अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स, विंची एयरपोर्ट्स, रॉयल शिफोल ग्रुप, कॉरपोरेशन अमेरिका एयरपोर्ट्स, मुंडीज, सेव, 2आई एयरोपोर्टी, मैग ओवरसीज इन्वेस्टमेंट, ओमान एयरपोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी और मैक्वेरी यूरोपियन इंफ्रास्ट्रक्चर फंड शामिल हैं।
कैटानिया एयरपोर्ट की 51% हिस्सेदारी का सवाल
कैटानिया एयरपोर्ट को चलाने वाली कंपनी एसएसी ने मई में एयरपोर्ट में कम से कम 51% हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया शुरू की है। कैटानिया सिसिली का सबसे बड़ा एयरपोर्ट है और यात्रियों की संख्या के हिसाब से इटली का पांचवां सबसे व्यस्त एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट ऑपरेटर का मालिकाना हक स्थानीय अधिकारियों और चैंबर ऑफ कॉमर्स के पास है। यह दक्षिणी सिसिली में छोटे कोमिसो एयरपोर्ट का भी प्रबंधन करता है, जिसके लिए 2049 तक का कॉन्ट्रैक्ट है।
भारत में उड़ेंगे अडानी के विमान?
बीते दिनों मीडिया में इस तरह की खबरें आई थीं कि एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया से कंसेशन एग्रीमेंट की एक शर्त में छूट मांगी थी। इस शर्त के तहत, मुंबई एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनी किसी शेड्यूल्ड एयरलाइन में 10% से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकती। रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी ने यह भी अनुरोध किया था कि भविष्य के एयरपोर्ट कंसेशन एग्रीमेंट से भी ऐसी पाबंदियां हटाई जाएं। हालांकि, अडानी समूह ने इस खबर को खारिज कर दिया था।
घूसखोरी का मुआवजा भरने में हुए कंगाल
सेटलमेंट अमाउंट के रूप में अमेरिकी एजेंसी को 2644 करोड़ रुपए का मुआवजा देने की वजह से अडाणी एंटरप्राइजेज को जून तिमाही में 1,160 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। पिछले साल की इसी तिमाही में कंपनी को 885 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ था। अडाणी एंटरप्राइजेज ने आज 29 जुलाई को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए हैं। कंपनी को भले ही 1160 करोड़ रुपए का घाटा हुआ हो लेकिन पिछले साल की तुलना में उसका तिमाही रेवेन्यू 50% बढ़ गया है। पिछले साल की तिमाही में कंपनी ने 21,961 करोड़ रुपए का रेवेन्यू हासिल किया था।


घाटे की वजह
कंपनी को जून तिमाही में हुए नेट लॉस का सबसे बड़ा कारण एक वन-टाइम यानी एकमुश्त खर्च है। अडाणी एंटरप्राइजेज ने अमेरिकी एजेंसी ‘ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल’ को 2,644 करोड़ रुपए का सेटलमेंट अमाउंट चुकाया है। इसी 2,644 करोड़ रुपए के वन-टाइम लॉस के एडजस्टमेंट के कारण कंपनी का मुनाफा प्रभावित हुआ और यह मुनाफे से घटकर घाटे में बदल गया। वन-टाइम सेटलमेंट लॉस के बावजूद कंपनी के कोर बिजनेस ऑपरेशंस में ग्रोथ देखने को मिली है। अमेरिकी ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल अमेरिका के ट्रेजरी विभाग की एक वित्तीय खुफिया और प्रवर्तन एजेंसी है। यह अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के लक्ष्यों के आधार पर आर्थिक व व्यापारिक प्रतिबंधों को लागू और प्रबंधित करती है।
भारत से भागे विदेशी निवेशक
पिछले तीन-चार साल में विदेशी निवेशकों का भरोसा हिलने लगा है। अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान के संघर्ष के चलते भारतीय शेयर बाजारों से विदेशी निवेशकों ने लगभग 2.2 लाख करोड़ रुपये निकाले। इन ताजा आंकड़ों के अलावा पिछले 4 साल के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में लगभग 4 गुना की कमी आ गई है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्यसभा सांसद डॉ जॉन ब्रिटास ने इसी से जुड़ा सवाल संसद के उच्च सदन में पूछा था। उन्होंने पिछले 4 साल में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के आंकड़े मांगे थे। इसी के साथ उन्होंने राज्य वार और कैटगरी वार ब्योरा भी मांगा था। साथ ही, कितने विदेशी निवेशकों ने अपना पैसा भारत से निकाल लिया उसकी भी जानकारी मांगी थी। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या सरकार ने निवेश वापस जाने के कारण जानने की कोशिश की है। इसका लिखित जवाब वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लिखित रूप में दिया है।
क्या है नेट एफडीआई
दरअसल, हर साल जितना विदेशी निवेश आता है और जितना चला जाता है, उसी के अंतर को नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी साल भारत में 10 रुपये का विदेशी निवेश आए और उसी साल विदेशी निवेशक अपने 6 रुपये निकाल लें तो नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 10-6 यानी 4 रुपये ही बचेगा।
चार गुना कम हुआ निवेश
वित्त मंत्रालय की ओर से दिए आंकड़े बताते हैं कि जितना निवेश भारत आ रहा है, उसकी तुलना में ज्यादा निवेशक पैसे खींच ले रहे हैं। इसी का नतीजा है कि 4 साल में ही नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में लगभग 4 गुना की कमी आ गई है। अगर पिछले दो साल के आंकड़े देखें तो निवेशकों ने पैसा लगाने में जितनी बढ़ोतरी हुई है, उसकी तुलना में ज्यादा लोगों ने पैसे निकाल लिए हैं। 2022-23 में भारत में लगभग 71.35 बिलियन डॉलर का निवेश आया और 2025-26 में 94.84 बिलियन डॉलर का निवेश आया। यानी लगभग 4 साल में आने वाले पैसे में सिर्फ 32.92 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इन्हीं चार साल में आउटफ्लो यानी विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना लगभग दोगुना हो गया है। यही आउटफ्लो साल 2022-23 में 29.35 बिलियन डॉलर था लेकिन 2025-26 में यह 54.04 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। यानी 4 साल में आउटफ्लो में 84.12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई है। 2023-24 में 44.47 बिलियन डॉलर और 2024-25 में 51.49 बिलियन डॉलर विदेशी निवेशकों ने भारत से खींच लिए।
भारतीय बाजार में बड़ी उथल-पुथल
इन आंकड़ों का असर यह हुआ है कि भारतीय बाजार में उथल-पुथल मची हुई है। आंकड़े सीधे-सीधे बता रहे हैं कि आने वाले निवेश में जहां 32.92 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई, वहीं निकाले जाने वाले पैसों में 84.12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई। इसका असर नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर साफ तौर पर देखा जा सकता है।
वित्त मंत्रालय की ओर से दिए गए इस जवाब से पता चलता है कि पिछले 4 साल में नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 4 गुना घट गया है। साल 2022-23 नेट विदेशी निवेश 27.99 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 2.67 लाख करोड़ रुपये का था। वह 2025-26 में सिर्फ 6.95 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 66480 करोड़ का ही रह गया। 2023-24 में नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 10.13 बिलियन डॉलर और 2024-25 में सिर्फ 0.96 बिलियन डॉलर ही था।




