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यूपी विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे का तुगलकी फरमान,मीडिया पर लगाम लगाना चाहता है ये बे-ईमान

उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं विधानसभा के तथाकथित प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे

कोई भी व्यक्ति अपने मानहानि एवं अपने खिलाफ गलत खबर चलाने पर कानूनी कार्यवाही कर सकता है तो प्रदीप दुबे को ऐसी चिट्ठी लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी

उत्तर प्रदेश का सूचना निदेशालय सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करता है जनता के बीच सरकार की उपलब्धियां का प्रचार करता है ना की विधानसभा से संबंधित भ्रष्टाचार के जो मामले हाई कोर्ट या किसी न्यायालय में चल रहे हैं उसके लिए मीडिया को प्रतिबंधित करने का कार्य करता है और प्रदीप दुबे चाहते हैं की उत्तर प्रदेश का सूचना निदेशालय ऐसा पत्र जारी करें कि विधानसभा से संबंधित भ्रष्टाचार के मामले मीडिया में ना प्रसारित किए जाएं।

उत्तर प्रदेश की विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे ने सूचना निदेशक को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है की सूचना निदेशक उत्तर प्रदेश के पत्रकारों के लिए एक ऐसा सर्कुलर जारी करें की विधानसभा अध्यक्ष एवं विधानसभा के अधिकारियों के खिलाफ अनर्गल और अनुचित खबरें चलाने वाले पत्रकारों पर रोक लगाई जाए एवं कार्यवाही की जाए ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि प्रदीप कुमार दुबे और विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ यदि कोई अनर्गल गलत और अनुचित खबरें चला रहा है तो स्वयं विधानसभा अध्यक्ष और प्रदीप कुमार दुबे उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करवा रहे हैं इसके लिए वे सूचना निदेशक से पत्र जारी करने के लिए क्यों आशा कर रहे हैं।
विधानसभा के तथाकथित प्रमुख सचिव 69 वर्षीय प्रदीप कुमार दुबे को लखनऊ हाई कोर्ट में उनके पद से बर्खास्त करने की मांग के लिए एक याचिका दाखिल की गई है,

क्या यह खबर असत्य है।

प्रदीप दुबे को बर्खास्त करने वाली याचिका की खबर मीडिया में रोकने की मांग प्रदीप दुबे के अधिवक्ताओं ने लखनऊ हाई कोर्ट में मौखिक रूप से की थी जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था।

प्रदीप दुबे को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह कौन सी खबरें है जो असत्य, अनर्गल एवं निराधार है।
अपने और सतीश महाना के कांड और कारनामों को छुपाने के लिए प्रदीप दुबे उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक विशाल सिंह का सहारा ले रहे हैं क्योंकि उनको अच्छी तरीके से पता है कि जब सूचना निदेशालय से पत्रकारों को कोई निर्देश दिया जाएगा तो उसका प्रभाव क्या होगा।
प्रदीप दुबे ही नहीं किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अनर्गल और तथ्यहीन खबरें यदि लिखी जाती है तो वह कानून का सहारा ले सकता है और शिकायत कर सकता है वास्तव में प्रदीप दुबे के बारे में जितनी भी खबरें चल रही है वह पूरी तरह से सत्य है प्रमाणिक है ।
यह बात भी प्रदीप दुबे को स्पष्ट रूप से पता है इसीलिए वह खुद कुछ नहीं करना चाहते हैं।

वास्तविकता यह है कि प्रदीप दुबे की हैसियत नहीं है कि किसी एक पत्रकार के ऊपर वह कोई शिकायत कर सके इन्हीं पत्रकारों में से लोग उन्हें “सियासत का दल्ला” और विधानसभा के अध्यक्ष को “कानून को रौंदता महाना”
लिखा।

सूचना निदेशक के माध्यम से निगेटिव खबरों पर नियंत्रण चाहता है प्रदीप दुबे

इन्होंने किसी को एक नोटिस तक नहीं भेजी क्योंकि इनको अपने करनामे स्वयं पता है और इनको पता है कि लोगों के पास सारे साक्ष्य है इसलिए अपने कांड और कारनामों को छुपाने के लिए यह सूचना निदेशक का सहारा लेना चाहते हैं।
उत्तर प्रदेश का सूचना निदेशालय सरकार के मुखिया एवं आम जनता के बीच सेतु का काम करता है।
उसका काम किसी की भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए खबर रोकने के लिए चिट्ठी जारी करना नहीं है।
अगर उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक विशाल सिंह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को प्रदीप दुबे के इस पत्र के बारे में अवगत कराते हैं तो मुख्यमंत्री जी स्वयं स्पष्ट कर देंगे की इस पर क्या करना है।
2008 से लेकर अभी तक किसी भी वर्ष का नाम लीजिए उस वर्ष के प्रदीप दुबे के कांड व कारनामा विधानसभा से जुड़ा हुआ हर व्यक्ति बता सकता है।
प्रदीप दुबे से यह पूछने वाला कोई नहीं है कि जब नई विधानसभा बननी है तो इस विधानसभा में तोड़फोड़ करके इतने पैसे क्यों खर्च कर रहे हो।

उत्तर प्रदेश की विधानसभा से संबंधित मुकदमों पर कितने करोड रुपए खर्च हुए हैं प्रदीप दुबे को यह बताना चाहिए।

विधानसभा में पदोन्नति से संबंधित लखनऊ हाई कोर्ट में सुनवाई के 1 दिन पहले पदोन्नति को क्यों निरस्त कर दिया गया ऐसे कौन से कांड थे जिसकी पोल लखनऊ हाई कोर्ट में खुलने वाली थी और एक दिन पहले प्रदीप दुबे ने निरस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया।

इसके अलावा 5 जून 2026 को लखनऊ हाई कोर्ट में प्रदीप दुबे के अधिवक्ताओं के द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया कि प्रदीप दुबे किसी सार्वजनिक पद पर नहीं है पड़ा प्रश्न यह है कि जब प्रदीप दुबे किसी सार्वजनिक पद पर नहीं है तो वह समाजवादी पार्टी के आम जनता के द्वारा चुने हुए विधायक को किस हैसियत से अपने हस्ताक्षर से निलंबित कर रहे हैं क्या प्रदीप कुमार दुबे की स्वयं की नियुक्ति के खिलाफ जो याचिकाएं लखनऊ हाई कोर्ट और अन्य अदालतों में चल रही है उस पर कितने पैसे आम जनता के खर्च हो रहे हैं यह बतायेंगे।

प्रदीप कुमार दुबे अपने और विधानसभा के अध्यक्ष सतीश कुमार महाना से संबंधित खबरों को दबाने के लिए उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक को पत्र लिख रहे हैं बड़ा प्रश्न यह है कि जब प्रदीप कुमार दुबे इतने ईमानदार और सत्य निष्ठा के धनी व्यक्तित्व हैं तो वह स्वयं अपने खिलाफ फर्जी अनर्गल और गलत समाचार लिखने वाले पत्रकारों और सोशल मीडिया के संचालकों के ऊपर कारवाई क्यों नहीं करने की हिम्मत जुटा पा रहे है।

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