पुलिस के इनकाउंटर पर क्यो न उठे सवाल, लगभग हर मुठभेड़ का एक ही हाल ?
पैसा, शोहरत व प्रमोशन क्या एनकाउंटर पुलिस की पहली प्राथमिकता बन चुकी है!

~ 2017 के बाद पुलिसिया थ्रिलर हर दो महीने पर एक ‘मुठभेड़’
~ योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद ‘एक्शन मोड’ में आई यूपी पुलिस
~ 2017 से 2022 के बीच हर दो महीने में औसतन 5 एनकाउंटर, संदिग्ध अपराधी मारे गए
~ कई मामलों में मानवाधिकार आयोग ने उठाए सवाल
~ 14,973 मुठभेड़, 183 मौतें कौन तय करता है मौत का स्क्रिप्ट
~ 8 सालों में पुलिस ने दावा किया कि 14,973 मुठभेड़ों में 183 अपराधी मारे गए।
~ अधिकांश एनकाउंटर सेल्फ डिफेंस की कहानी के इर्द-गिर्द
~ हाईकोर्ट व एनएचआरसी ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट
~ मेरठ जोन बना एनकाउंटर की राजधानी 5 हजार से अधिक एनकाउंटर
~ मेरठ जोन में एसएसपी, एएसपी को दिए ‘वीरता पुरस्कार’ व प्रमोशन
~ अपराध कम हुआ या दिखावे का ‘एक्शन थियेटर’
नरेन्द्र गुप्ता……
वाराणसी/लखनऊ। पुलिस की वर्दी कभी रौब का प्रतीक थी, अब वह ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ की पहचान बन चुकी है। बीते 8 वर्षों में उत्तर प्रदेश में लगभग 14,973 पुलिस मुठभेड़ें दर्ज की गईं, जिनमें 4,500 से अधिक अपराधी घायल हुए और 183 से अधिक कथित अपराधी मारे गए। सरकार इसे ‘कानून व्यवस्था की सख्ती’ का नाम देती है, तो पुलिस महकमा इसे ‘जरूरी कार्रवाई’। मगर सवाल वहीं खड़ा रहता है अगर अपराधी सुधर गए, जेलों में हैं या मारे जा चुके हैं, तो एनकाउंटर की यह श्रृंखला थम क्यों नहीं रही। पुलिस के लिए क्या प्रमोशन, मीडिया की सुर्खियां और सरकार की प्रशंसा प्राप्त करने का सबसे छोटा रास्ता एनकाउंटर हो चुका है।
- एनकाउंटर के नाम पर बदले की कार्रवाई या दबाव
- कई एनकाउंटर संदिग्ध हालातों में, मजिस्टेट्रीयल जांच भी नहीं
- स्थानीय दबाव, राजनीतिक हेडलाइन व सोशल मीडिया ट्रेंड से पुलिस की कार्रवाई तय
- कुछ मामलों में एनकाउंटर के बाद परिजनों ने लगाए हत्या के आरोप
- पुलिसकर्मियों की शहादत और घायल जवान खाकी की पीड़ा सच्ची भी है
- 8 वर्षों में 18 पुलिसकर्मी शहीद और 1711 घायल
- पुलिस के पास रणनीति है या सिर्फ हथियार
- घायल पुलिसवालों के परिवारों को संतोषजनक सहायता
- एनकाउंटर स्पेशलिस्ट मीडिया स्टार और प्रमोशन की सीढ़ी
- कुछ पुलिस अफसरों को ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ की ब्रांडिंग
- 20 से अधिक एनकाउंटर करने वालों को दिया गया विशेष पदोन्नति
- अफसरों की लोकप्रियता मीडिया, सोशल मीडिया में, लेकिन क्या जांच भी हुई
- अपराधियों का खौफ या पुलिस का प्रायोजित प्रहसन
- यदि अपराधी खत्म हो रहे हैं, तो फिर अपराध क्यों नहीं थमते
- क्या एनकाउंटर क्राइम रोकने का समाधान या सिर्फ राजनीतिक स्टंट
- कानून के रखवाले या जज-फांसी देने वाले पुलिस की बदलती भूमिका
- क्या अब अदालतों की जगह सड़कों पर सजा दी जा रही
- जमानत, गिरफ्तारी, ट्रायल का सिस्टम नाकाम या पुलिस अधीर
- सुप्रीम कोर्ट और एनएचआरसी के दिशा-निर्देशों की अवहेलना
आंकड़ों की भयावहता
- 2017 से अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस ने 14,973 मुठभेड़ों को अंजाम दिया
- इनमें करीब 14,000 अपराधियों के एनकाउंटर किए गए
- सरकारी दावा बनाम ज़मीनी हकीकत
- सरकार का दावा अपराध खत्म हुए, अपराधी सुधरे फिर भी मुठभेड़ों की दर क्यों नहीं घटी
- पुलिस के नुकसान का भी जिक्र 18 पुलिसकर्मी शहीद हुए।
- 1,711 घायल हुए लेकिन संदिग्धों की संख्या कई गुना अधिक
- प्रशासनिक प्रचार और भय का तंत्र ‘अपराधियों में खौफ’ का प्रायोजित नैरेटिव
- हर एनकाउंटर में लगभग एक जैसी स्क्रिप्ट पुलिस ने रोका, फायरिंग, जवाबी फायरिंग में मारा गया
- सबसे ज्यादा एनकाउंटर मेरठ जोन में हर दो महीने में औसतन 5 संदिग्ध मारे गए
- एनकाउंटर बन गया है प्रमोशन का शॉर्टकट
- एनकाउंटर करने वालों को पदोन्नति, मेडल और मीडिया में हीरो की छवि
उत्तर प्रदेश में ‘ठोक देंगे’ की संस्कृति को नीति बना देने वाली पुलिस कार्यशैली अब देश-विदेश में चर्चा का विषय बन चुकी है। सत्ता के संरक्षण में पल रही यह पुलिसिया ‘ठोक दो’ रणनीति अब न केवल संवैधानिक नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रही है, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा न्यायिक प्रक्रिया को भी सीधे तौर पर चुनौती दे रही है।
8 साल में 14,973 मुठभेड़ ‘ठोक दो’ संस्कृति का औपचारिककरण
योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने (मार्च 2017) के बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस ने अब तक 14,973 मुठभेड़ों को अंजाम दिया है। इनमें 14,000 से अधिक अपराधियों का एनकाउंटर किया गया, यानी लगभग हर दिन 5 मुठभेड़। इतनी बड़ी संख्या में पुलिस द्वारा एकतरफा कार्रवाई को लेकर अनेक सवाल उठते हैं। कभी इन मुठभेड़ों को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह प्रचारित किया गया, तो कभी ‘मॉडल पुलिसिंग’ कहा गया। लेकिन क्या ये आंकड़े वास्तव में अपराध नियंत्रण का संकेत हैं, या सत्ता की हिंसात्मक अभिव्यक्ति।
अपराधी सुधर गए तो फिर गोली क्यों
सरकार का दावा है कि यूपी में अपराधियों में डर है, कानून का राज है। फिर सवाल उठता है कि जब पुलिस की गोली से अपराध खत्म हो गया, तो मुठभेड़ क्यों जारी हैं। यह दोहरी कहानी है एक तरफ अपराध कम हुए की गूंज, दूसरी ओर मुठभेड़ों में अपराधी मारे जा रहे हैं की खबरें। दोनों बातें साथ कैसे चल सकती हैं।
हर मुठभेड़ में एक जैसी स्क्रिप्ट
अधिकतर एनकाउंटर की कहानी कुछ इस तरह होती है। पुलिस ने बदमाश को रोकने की कोशिश की, बदमाश ने फायरिंग की, पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायर किया और गोली अपराधी के सीने में लगी। न गवाह, न सीसीटीवी, न कोई स्वतंत्र जांच। सभी अपराधी इतने मूर्ख हैं कि पुलिस को देखकर हर बार गोली चला देते हैं और पुलिस हर बार इतनी सटीक गोली क्यों मारती है कि आरोपी सीधा मारा जाता है।
मेरठ जोन एनकाउंटर की राजधानी
राज्य के सभी 18 पुलिस जोनों में मेरठ जोन सबसे आगे है। हर महीने औसतन 2-3 मुठभेड़ होते हैं। यह आंकड़ा इसलिए चिंताजनक है क्योंकि यहां जातीय व सांप्रदायिक तनाव की पृष्ठभूमि है और मुठभेड़ के नाम पर अक्सर खास समुदाय को निशाना बनाया जाता है।
पुलिसकर्मी घायल, लेकिन मरे अपराधी
राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार 8 वर्षों में 1711 पुलिसकर्मी मुठभेड़ों में घायल हुए, जबकि केवल 18 की मौत हुई। इसके मुकाबले लगभग 14,000 अपराधियों की मौत दर्ज की गई। यह अंतर दर्शाता है कि मुठभेड़ की स्क्रिप्ट एकतरफा रही है। पुलिस केवल घायल होती है, और अपराधी केवल मारा जाता है।
प्रमोशन और पुरस्कार का खेल
एनकाउंटर के बाद कई पुलिसकर्मी प्रमोशन पाते हैं, मेडल मिलते हैं और राजनीतिक संरक्षण मिलता है। शोएब, विकास दुबे केस के बाद कई पुलिस अधिकारियों को विशेष पदोन्नति मिली। कुख्यातों को मारने के बाद डीआईजी से एडीजी तक का सफर आसान हुआ।
न्यायपालिका की भूमिका और खामोशी
एनकाउंटर के मामलों में बहुत कम मुकदमे चलाए जाते हैं। पुलिस खुद ही जांच करती है और खुद को निर्दोष पाती है। अदालतों की चुप्पी और मानवाधिकार आयोग की सीमित कार्रवाई, दोनों इस प्रणाली को वैधता देते हैं। कई मामलों में ऐसा प्रतीत होता है कि मुठभेड़ से पहले ही ‘टारगेट’ तय होता है। विशेष वर्ग, जाति या समुदाय के युवकों को निशाना बनाना जैसे मुठभेड़ एक राजनीतिक संदेश बन चुकी हो। पश्चिम यूपी में मुस्लिम युवकों की, पूर्वी यूपी में निषाद-चौहान समुदाय के युवकों की बड़ी संख्या में ‘मुठभेड़’ में मौत इसका पुख्ता प्रमाण है। मुठभेड़ के बाद टीवी पर विजयी मुद्रा में पुलिस अफसर, एके-47 लहराते हुए, अपराधी की तस्वीर के साथ फोटोशूट कराते हैं।
यूपी पुलिस अपराध से लड़ रही है या सिस्टम के आदेश पर ‘खेल’ खेल रही
पुलिस का काम न्याय व्यवस्था को मज़बूत करना है, अपराधियों को कोर्ट तक लाना, सबूत जुटाना और कानून के अनुसार कार्रवाई कराना। लेकिन जब पुलिस खुद ही ‘जज-जूरी-एक्जिक्यूटर’ बन जाए तो संविधान का क्या होगा? एनकाउंटर को ‘समाप्ति नहीं, शुरुआत’ समझना चाहिए।
चंदौली पुलिस द्वारा हाफ एनकाउंटर की महिमा बड़ी निराली
- लगभग कुछ माह पूर्व में यूपी में शराब तस्करी को लेकर मशहूर जनपद चन्दौली एक बार फिर सुर्खिया में उस उक्त आ गया। जब विगत सप्ताह की रात आपस में रूपये की बटवारा को लेकर एक दोस्त ने अपने साथियों से मिलकर जिम संचालक को गोली मार कर हत्या कर दी।मामले में आधा दर्जन से अधिक लोगो आरोपित बनाया गया।जिसके बाद पुलिस एक्शन मुड़ में आ गयी।इसी दौरान पुलिस को मामले में चार आरोपित एमजी रोड़ हाईकोर्ट प्रयागराज से समीप कश्यप लाज में ठहरे की सुचना प्राप्त हुई।सुचना के आधार पर पुलिस ने चार आरोपित को पकड़कर चंदौली लाकर प्रारभिक पूछ-ताछ में कर आरोपियों को हत्या में प्रयोग किए गए बरामदगी के लिए एनएच टू पर स्थित खंडहर मकान (गुरुकुल विद्यालय) के समीप ले गये। जहा बदमाशों के द्वारा पहले से लोडेड कर रखे गए हथियार को उठाकर पुलिस पर फायरिंग कर दी।पुलिस के द्वारा किये जबाबी फायरिंग में चारों आरोपित के पैर में गोली लगी। अब प्रश्न यह उठता है, कि जब पुलिस टीम चारों आरोपित को प्रयागराज से चंदौली ले आई तो रास्ते में आरोपित क्यों नहीं भागने का प्रयास किया। जब पुलिस के साथ में चारों आरोपित हत्या में प्रयोग किये गए असलहे की बरामदगी के ले कर गयी। तो जाहिर सी बात है कि पुलिस चारों आरोपी को पर्याप्त पुलिस सुरक्षा में लेकर पहुंची होगी उसके बाद भी अपराधी पुलिस पर कैसे गोली चला देंगे। यह फिल्मी कहानी कुछ समझ के परे है।
कुछ अनुसलझे सवाल
- चन्दौली पुलिस कहना है की जब आरोपीयों को असलहा बरामदगी के लिये ले जाया गया तो आरोपियों द्वारा जिससे गोली चलाई गई उसी असलहा से पुलिस टीम पर फायरिंग की गई।
- अब सवाल ये उठता है कि जब पुलिस टीम द्वारा आरोपियों से असलहा बरामद के लिये जहाँ पुलिस ले गयी तो वहां पुलिस के दर्जनों लोग थे तो आरोपियों को खुला तो छोड़ नही दिया होगा इतने पुलिस बल होने के बाद आरोपीगण कैसे हमला कर सकते है ?
- अमूनन जब हत्या जैसे मामलों में जब पुलिस आरोपियों को पकड़ती है तो पूछताछ में पकड़े गए अपराधियों को इतना तोड़ डालती है कि वे सपने में भी पुलिस टीम पर फायरिंग की बात सोच ही नही सकते।
- आम तौर पर जब इस समय पकड़े गए अपराधियों में पुलिस द्वारा मुठभेड़ में मारे जाने का भय इतना प्रबल रहता है कि वो खुद ही जब तक जेल नही चले जाते उन्हें मौत का खौफ रहता है तो पुलिस टीम पर हमला कैसे कर सकते है ?
- पुलिस द्वारा जिन आरोपियों को पैर पर गोली मारी गयी है सबको घुटने के नीचे ही गोली लगी है यदि रियल मुठभेड़ होती तो गोली किसी को घुटने के ऊपर या पैर के किसी अन्य हिस्से में क्यो नही लगी?
उत्तर प्रदेश के अंदर लगभग 8 वर्षों से पुलिस के द्वारा एनकाउंटर किए जाने की खबर आए दिन सुनने व पढ़ने को मिलती है। यह बात दिगर है कि कभी पुलिस अपराधियों के हाफ एनकाउंटर तो कभी फुल एनकाउंटर करती है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आती है कि अपवाद को छोड़ दे तो लगभग सभी एनकाउंटर में एक ही कहानी सुनने वह देखने को मिलती है। कभी पुलिस बताती है पुलिस को चकमा देने कर भागने का प्रयास कर रहा था तो उसे पर में गोली मार दी गई तो कभी पुलिस बताती है कि पुलिस बल पर फायरिंग अपराधी के द्वारा किया गया जिसकी जवाब देही हाफ एनकाउंटर या की फुल एनकाउंटर किया गया। अगर सूत्रों का माने तो पुलिस पहले अपराधियों से सब कुछ पूछताछ के दौरान सब जानकारी एकत्र कर लेती है। उसके बाद पुलिस पकड़े गए अपराधी के पैर में पहले बोरा बांध देती है फिर किसी स्थान पर ले जाकर हाफ एनकाउंटर कर देती है। उसके बाद पुलिस एक नया कहानी तैयार कर लोगों के सामने पेश कर देती है।




