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मोदी राज में चीन का अरुणाचल-लद्दाख के बाद अब कश्मीर भी दांव, भारत के दिल पर दे रहा घाव

● मोदी राज में चीन का अरुणाचल-लद्दाख के बाद अब कश्मीर भी दांव, भारत के दिल पर दे रहा घाव

● भाजपा-चीनी बैठक के तुरंत बाद शख्सगाम घाटी पर चीन का दावा

● क्या राष्ट्रवाद की आड़ में हो रही है भूभाग की सौदेबाज़ी?

● भाजपा-आरएसएस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक, उसी दिन कश्मीर पर चीन का दावा

● 1963 के पाकिस्तान-चीन समझौते की आड़ में भारत के 5180 वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्जे की कोशिश

● विदेश मंत्रालय के बयान के बावजूद चीन बोला निर्माण नहीं रुकेगा

● सियाचिन के ठीक उत्तर में चीनी मौजूदगी, भारतीय सेना की सुरक्षा पर सीधा खतरा

● गलवान के बाद भी सरकार का मौन, संसद में अखंड भारत का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में

● सीपीइसी के नाम पर भारतीय इलाके में सड़कें, सुरंगें और सैन्य ढांचा

● भाजपा-आरएसएस और चीन की पुरानी ‘वैचारिक दोस्ती’ फिर सवालों के घेरे में

● क्या चीन से डरकर कश्मीर, लद्दाख और अरुणाचल पर कोई गुप्त डील

 

अमित मौर्य

नई दिल्ली। जिस राष्ट्रवाद को नरेंद्र मोदी सरकार ने बीते एक दशक में अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी के रूप में बेचा, उसी राष्ट्रवाद की जमीन आज चीन के दावों के नीचे खिसकती दिख रही है। अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिण तिब्बत’ बताने और लद्दाख के हजारों वर्ग किलोमीटर इलाके में घुसपैठ के बाद अब चीन ने कश्मीर के शख्सगाम घाटी पर खुला दावा ठोक दिया है। संयोग नहीं, बल्कि गंभीर राजनीतिक संकेत यह है कि यह दावा ठीक उसी दिन सामने आया, जब दिल्ली में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधियों ने भाजपा और आरएसएस के प्रतिनिधियों के साथ बंद कमरे में बैठक की। 9 जनवरी को भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ कहा था कि शख्सगाम घाटी भारत का अभिन्न हिस्सा है और 1963 में चीन-पाकिस्तान के बीच हुआ समझौता भारत की नजर में अवैध है। लेकिन महज तीन दिन बाद, 12 जनवरी को चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने पूरी बेशर्मी से कहा कि शख्सगाम घाटी चीन और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते के तहत चीन का इलाका है और वहां चल रहा निर्माण किसी भी कीमत पर नहीं रोका जाएगा। यह वही शख्सगाम घाटी है, जो सामरिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील रणक्षेत्र सियाचिन के ठीक उत्तर में स्थित है। यहां चीन की मौजूदगी का मतलब है। भारतीय सेना की गर्दन पर सीधी तलवार। इसके बावजूद केंद्र की नरेंद्र मोदी सत्ता की ओर से न तो कोई सख्त प्रतिक्रिया आई, न ही संसद के भीतर वैसा आक्रोश दिखा, जैसा ‘अखंड भारत’ के नारों के वक्त दिखाया जाता रहा है। सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 2019 में संसद के भीतर अक्साई चिन और पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का प्रस्ताव पारित करने वाली सरकार आज चीन के एक-एक दावे पर खामोश क्यों है? गलवान में 20 भारतीय जवानों की शहादत के बाद भी लद्दाख के करीब 4 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में भारतीय सेना की गश्त अब तक बहाल क्यों नहीं हो पाई? और अब, शख्सगाम घाटी में खुले निर्माण के बावजूद सरकार क्यों सिर्फ बयानबाज़ी तक सिमट गई है? भाजपा और आरएसएस की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ बैठक इस पूरे घटनाक्रम को और संदिग्ध बना देती है। यह बैठक कोई राजनयिक वार्ता नहीं थी, बल्कि दो सत्ताधारी वैचारिक संगठनों के बीच संवाद था, जिसमें पहली बार आरएसएस की औपचारिक मौजूदगी दर्ज की गई। बैठक के कुछ ही घंटों बाद चीन का कश्मीर पर दावा सामने आना इस आशंका को जन्म देता है कि कहीं यह सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि किसी गहरी राजनीतिक समझ का संकेत तो नहीं? देश के भीतर राष्ट्रवाद की सबसे ऊंची आवाज बुलंद करने वाली भाजपा और आरएसएस की इस चुप्पी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या चीन से टकराने का साहस सरकार में नहीं बचा? या फिर आर्थिक निर्भरता, व्यापार घाटा और अंतरराष्ट्रीय दबावों के चलते भारत अपने ही भूभाग को लेकर समझौते की राह पर चल पड़ा है?

चीन का शख्सगाम घाटी पर दावा महज एक कूटनीतिक बयान नहीं

चीन का शख्सगाम घाटी पर ताजा दावा महज एक कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला है। अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिण तिब्बत’ बताने और लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा को एकतरफा बदलने के बाद अब चीन ने कश्मीर के उस हिस्से पर दावा ठोक दिया है, जिसे भारत ऐतिहासिक, कानूनी और संवैधानिक रूप से अपना अभिन्न अंग मानता रहा है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब देश के भीतर राष्ट्रवाद के सबसे बड़े दावेदार सत्ता में हैं और संसद में ‘अखंड भारत’ के प्रस्ताव की गूंज अब भी रिकॉर्ड में दर्ज है। शख्सगाम घाटी को लेकर चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग का बयान बेहद स्पष्ट और आक्रामक है। उन्होंने न सिर्फ यह कहा कि यह इलाका 1963 में पाकिस्तान द्वारा चीन को सौंपा गया था, बल्कि यह भी जोड़ दिया कि चीन वहां चल रहे निर्माण कार्य को किसी भी सूरत में नहीं रोकेगा। यह बयान सीधे-सीधे भारत के विदेश मंत्रालय की उस आधिकारिक स्थिति को चुनौती देता है, जिसमें भारत ने चीन-पाकिस्तान के 1963 समझौते को अवैध और शून्य करार दिया है।

1963 का समझौता कागजी सौदा या भू-राजनीतिक साज़िश?

1963 में पाकिस्तान और चीन के बीच हुआ सीमा समझौता उस समय भी विवादित था और आज भी है। अंतरराष्ट्रीय कानून की मूलभूत धारणा है कि कोई भी देश ऐसे क्षेत्र को तीसरे देश को नहीं सौंप सकता, जिस पर उसका कानूनी स्वामित्व न हो। गिलगित-बाल्टिस्तान और शख्सगाम घाटी पर पाकिस्तान का कब्जा स्वयं भारत की नजर में अवैध है। ऐसे में पाकिस्तान द्वारा चीन को यह इलाका ‘तोहफे’ में देना न सिर्फ गैरकानूनी था, बल्कि भारत की संप्रभुता पर सुनियोजित हमला भी था। लेकिन चीन ने इस अवैध समझौते को आज तक अपने विस्तारवादी एजेंडे के हथियार की तरह इस्तेमाल किया। पहले अक्साई चिन, फिर लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन, उसके बाद अरुणाचल पर नाम बदलने की कवायद और अब कश्मीर—यह सब किसी आकस्मिक कूटनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि ‘सलामी स्लाइसिंग’ रणनीति का खुला उदाहरण है।

शख्सगाम घाटी सिर्फ जमीन नहीं, सियाचिन की चाबी

शख्सगाम घाटी का महत्व केवल इसके क्षेत्रफल तक सीमित नहीं है। यह इलाका सियाचिन ग्लेशियर के ठीक उत्तर में स्थित है, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा और सबसे ठंडा युद्धक्षेत्र माना जाता है। सियाचिन पर भारतीय सेना की मौजूदगी आज भी भारत की सामरिक बढ़त का सबसे बड़ा प्रतीक है। यदि चीन शख्सगाम घाटी में स्थायी सैन्य और बुनियादी ढांचा खड़ा कर लेता है, तो सियाचिन भारतीय सेना के लिए रणनीतिक रूप से कहीं अधिक संवेदनशील हो जाएगा। यही कारण है कि चीन यहां सीपीईसी के नाम पर जो निर्माण कर रहा है, वह केवल आर्थिक परियोजना नहीं बल्कि सैन्य लॉजिस्टिक्स का मजबूत नेटवर्क है। चौड़ी सड़कें, सुरंगें, पुल और संभावित हवाई पट्टियां ये सब युद्ध की स्थिति में भारी सैन्य तैनाती को आसान बनाने के लिए जरूरी होते हैं।

विदेश मंत्रालय के बयान और जमीन की हकीकत

भारतीय विदेश मंत्रालय ने 9 जनवरी को जरूर यह कहा कि शख्सगाम घाटी भारत का हिस्सा है और सीपीईसी अवैध है, लेकिन सवाल यह है कि इन बयानों के बाद जमीन पर क्या बदला? चीन ने तीन दिन के भीतर ही यह स्पष्ट कर दिया कि उसे भारत की आपत्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह पहली बार नहीं है जब भारत के कड़े शब्द चीन के ठंडे आत्मविश्वास के आगे बेअसर साबित हुए हों। गलवान की झड़प के बाद भी सरकार ने यही कहा था कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन आज भी भारतीय सेना उस इलाके में गश्त नहीं कर पा रही है, जहां पहले उसका नियमित अधिकार था। यही पैटर्न अब शख्सगाम घाटी में दोहराया जा रहा है। पहले चीन निर्माण करता है, फिर बयान देता है, और भारत कूटनीतिक विरोध दर्ज कराकर चुप हो जाता है।

भाजपा-आरएसएस व चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक सवालों के घेरे में

इस पूरे घटनाक्रम को सबसे संदिग्ध बनाती है भाजपा, आरएसएस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधियों की हालिया बैठक। यह कोई सरकारी स्तर की वार्ता नहीं थी, बल्कि दो वैचारिक और राजनीतिक संगठनों के बीच संवाद था। खास बात यह है कि इस बार आरएसएस की औपचारिक मौजूदगी ने इस बैठक को और राजनीतिक बना दिया। बैठक के ठीक बाद चीन का शख्सगाम घाटी पर दावा सामने आना महज संयोग है या किसी गहरी रणनीतिक समझ का संकेत यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता। जिस चीन को सरकार सार्वजनिक मंचों पर भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बताती है, उसी चीन के सत्तारूढ़ दल से बंद कमरे में बातचीत क्या संदेश देती है?

राष्ट्रवाद बनाम वास्तविकता

सत्ता में आने से पहले और आने के बाद भाजपा ने जिस राष्ट्रवाद को राजनीतिक हथियार बनाया, वह आज अपनी सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रहा है। संसद में अक्साई चिन और पीओके को वापस लेने के प्रस्ताव, चुनावी मंचों से दिए गए आक्रामक भाषण और ‘लाल आंख’ की चेतावनियां इन सबके बावजूद जमीन पर चीन लगातार आगे बढ़ता जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि चीन क्या कह रहा है, सवाल यह है कि भारत क्या कर रहा है। क्या आर्थिक निर्भरता, अंतरराष्ट्रीय दबाव और राजनीतिक समझौते भारत को अपने ही भूभाग पर समझौता करने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या जनता से छिपाकर कोई ऐसी डील हो रही है, जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी? शख्सगाम घाटी पर चीन का दावा सिर्फ सीमा विवाद नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, विदेश नीति और सत्ता की जवाबदेही का भी इम्तिहान है। अगर सरकार आज भी सिर्फ बयान देकर चुप बैठी रहती है, तो यह चुप्पी खुद एक बयान बन जाएगी। ऐसा बयान, जिसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।

* शख्सगाम घाटी भारत का कानूनी और ऐतिहासिक हिस्सा
* चीन-पाक 1963 समझौता अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ
* सीपीईसी के नाम पर सैन्य ढांचा तैयार कर रहा चीन
सियाचिन की सुरक्षा पर सीधा खतरा
* भाजपा-आरएसएस की चुप्पी राष्ट्रवाद पर सवाल
गलवान के बाद भी कोई ठोस जवाब नहीं
* राजनीतिक दलों की बैठक और भूभाग पर दावा गंभीर संयोग
* जनता से छिपाकर हो रही किसी डील की आशंका

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