वाराणसीNews

साजिशों का शिकार, सन्दीप सिंह स्वर्णकार

सपा नेता की जारी मौत से जंग-स्लग

> थैलियम से हत्या की साजिश! समाजवादी पार्टी के युवा नेता को जहर देकर मारने की कोशिश

>पत्नी की एफआईआर से उजड़ा सत्ता-अपराध-कारोबार का गठजोड़

>ट्रांसपोर्ट कारोबारी संदीप सिंह के शरीर में मिला थैलियम

>महीनों तक बीमारी बताकर मौत के मुंह में धकेला गया

>मेदान्ता से मैक्स, मैक्स से हिंदुजा हर जगह छुपा रहा सच

>पत्नी खुशबू सिंह की एफआईआर से हड़कंप

>खनन माफिया, राजनीतिक चेहरे और संदिग्ध साथियों की परछाईं

>जीबीएस नहीं, जहर था डॉक्टरों की रिपोर्ट से खुलासा,

> हत्या की साजिश या कारोबारी-राजनीतिक रंजिश?

>क्या वाराणसी पुलिस सच तक पहुंचेगी या फाइलों में दफन होगा मामला

वाराणसी। यह सिर्फ एक व्यक्ति के बीमार होने की कहानी नहीं है। यह उस अंधेरे तंत्र की दास्तान है, जहां राजनीति, कारोबार और अपराध एक-दूसरे में इस कदर घुल-मिल चुके हैं कि जहर भी दवा बनाकर परोसा जाता है और हत्या को बीमारी का नाम दे दिया जाता है।कोतवाली थाना क्षेत्र के लालघाट निवासी, समाजवादी पार्टी के युवा नेता और ट्रांसपोर्ट कारोबारी संदीप सिंह स्वर्णकार आज जिंदा हैं। लेकिन यह जिंदगी किसी चमत्कार से कम नहीं। क्योंकि जिस जहर ने उनके शरीर को भीतर से खोखला किया वह थैलियम था। एक ऐसा जहर, जिससे बच पाना चिकित्सा विज्ञान में लगभग असंभव माना जाता है। फरवरी 2025 में अचानक तबीयत बिगड़ना, पहले बुखार, फिर उल्टियां, फिर पैरों से शुरू हुई सुन्नता और देखते-देखते पूरा शरीर बेकार डॉक्टरों को लगा यह कोई दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। गिलियन बैरे सिंड्रोम का नाम लिया गया। इलाज चलता रहा पर मरीज मरता चला गया। मेदान्ता अस्पताल, गुरुग्राम जहां इलाज होना था, वहां सवाल पैदा हुए। मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, दिल्ली जहां उम्मीद थी, वहां वेंटिलेटर मिला। और आखिरकार पी.डी. हिंदुजा अस्पताल, मुंबई जहां सच्चाई ने दस्तक दी। डॉक्टरों की जांच में सामने आया कि संदीप सिंह के रक्त में थैलियम मौजूद था। यानी यह बीमारी नहीं थी।
यह धीरे-धीरे, योजनाबद्ध तरीके से जहर देकर हत्या का प्रयास था। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद जो एफआईआर दर्ज हुई है, वह सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि राजनीति-अपराध-खनन माफिया के खतरनाक गठजोड़ का चार्जशीट जैसी है। पत्नी खुशबू सिंह ने मुंबई के माहिम पुलिस थाने में जीरो एफआईआर दर्ज कराई है, जो अब वाराणसी पुलिस के पास है। एफआईआर में जिन नामों, घटनाओं और परिस्थितियों का जिक्र है वे सीधे-सीधे सवाल उठाते हैं कि क्या संदीप सिंह को जानबूझकर जहर दिया गया? क्या उनके करीबी ही इस साजिश के हिस्सेदार हैं? क्या कारोबारी और राजनीतिक रंजिश ने हत्या का रास्ता चुना? यह मामला अब सिर्फ संदीप सिंह का नहीं रहा।
यह सिस्टम की परीक्षा बन चुका है।

राजनीति से पहचान, कारोबार से ताकत

संदीप सिंह समाजवादी पार्टी के उभरते चेहरों में रहे हैं। खुद अखिलेश यादव द्वारा समाजवादी छात्र सभा का राष्ट्रीय महासचिव बनाए जा चुके संदीप सिंह की पहचान सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रही।
उनकी दो ट्रांसपोर्ट कंपनियां एसएसएस इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड व शिव एंटरप्राइजेज। सड़क निर्माण में बजरी-डामर के परिवहन से जुड़ी हैं। यानी जहां खनन है, वहां पैसा है और जहां पैसा है, वहां अपराध।

मेदान्ता की यात्रा और संदिग्ध संगत

एफआईआर के मुताबिक, वाराणसी के खनन कारोबारी शिव सरदार (उर्फ शिवप्रसाद यादव) के इलाज के लिए गुरुग्राम के मेदान्ता अस्पताल जाया गया। साथ में थे
अंकित रस्तोगी, प्रवीण यादव उर्फ बच्चा यादव, किशन दीक्षित (पूर्व विधानसभा प्रत्याशी), राजेश यादव (पूर्व एमएलसी का करीबी) यहीं से कहानी अंधेरे में जाती है।

बीमारी या जहर?

26 फरवरी 2025 को संदीप सिंह की तबीयत बिगड़ती है। डॉक्टर बीमारी खोजते हैं, जहर नहीं। इलाज चलता है, पर सुधार नहीं। आईसीयू, वेंटिलेटर सब बेकार, हिंदुजा अस्पताल में टूटा झूठ। 27 मार्च 2025 को मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में जांच रिपोर्ट में थैलियम पाए जाने की पुष्टि हुई। डॉ. मेधा धामणे की पुष्टि के बाद परिवार को यकीन हो गया कि यह हादसा नहीं साजिश है।

थैलियम कांड संदीप सिंह को जहर देकर मारने की साजिश

यह कोई सामान्य बीमारी की कहानी नहीं है। यह एक सुनियोजित, ठंडे दिमाग से रची गई हत्या की साजिश है, जिसमें जहर को दवा का नाम दिया गया, अस्पतालों को ढाल बनाया गया और महीनों तक एक व्यक्ति को मौत की ओर धकेला जाता रहा। समाजवादी पार्टी के युवा नेता और ट्रांसपोर्ट कारोबारी संदीप सिंह स्वर्णकार आज जिंदा हैं, लेकिन उनके शरीर में पाया गया थैलियम यह चीख-चीखकर कहता है कि उन्हें जिंदा नहीं छोड़ने की पूरी तैयारी थी।

अचानक बीमारी नहीं, धीरे-धीरे मौत की पटकथा

26 फरवरी 2025। यही वह तारीख है जब संदीप सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ती है। पहले बुखार, फिर उल्टियां, फिर पैरों में सुन्नता। कुछ ही दिनों में हालत ऐसी कि चलना-फिरना मुश्किल हो गया। परिवार को लगा कोई गंभीर बीमारी है, लेकिन किसी को यह अंदेशा नहीं था कि शरीर के भीतर जहर अपना काम कर चुका है। डॉक्टरों ने शुरुआत में इसे न्यूरोलॉजिकल समस्या बताया। इलाज शुरू हुआ, लेकिन दवाएं असर नहीं कर रही थीं। हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती चली गई। सवाल यह है कि अगर यह बीमारी थी, तो इलाज का कोई असर क्यों नहीं दिखा?

मेदान्ता से मैक्स तक, इलाज या भ्रम?

यह वही समय था जब वाराणसी के चर्चित खनन कारोबारी शिव सरदार (शिवप्रसाद यादव) इलाज करा रहे थे। एफआईआर के अनुसार, संदीप सिंह उनके साथ ही वहां पहुंचे थे। साथ में थे कुछ ऐसे लोग, जिनके नाम अब जांच के दायरे में हैं। मेदान्ता में बीमारी का कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया। इसके बाद उन्हें दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में शिफ्ट किया गया। यहां डॉक्टरों ने गिलियन बैरे सिंड्रोम की आशंका जताई। इलाज चला, लेकिन संदीप सिंह की हालत लगातार बिगड़ती गई। 22 मार्च को आईसीयू और 23 मार्च को वेंटिलेटर तक नौबत पहुंच गई। यदि यह जीबीएस था, तो मानक इलाज के बाद भी स्थिति क्यों नहीं सुधरी? यह सवाल उस समय किसी ने नहीं पूछा।

मुंबई में हटा झूठ का पर्दा

27 मार्च 2025 को संदीप सिंह को एयर एम्बुलेंस से मुंबई के पी.डी. हिंदुजा अस्पताल ले जाया गया। यहीं से पूरी कहानी पलट जाती है। जांच के दौरान डॉक्टरों को संदीप सिंह के रक्त में थैलियम के अंश मिले। थैलियम एक ऐसा जहर जो सामान्य परिस्थितियों में मानव शरीर में नहीं पाया जाता। चिकित्सकों के अनुसार, इसका इस्तेमाल केवल जानबूझकर ज़हर देने में किया जाता है। डॉ. मेधा धामणे द्वारा दी गई इस जानकारी के बाद परिवार को यकीन हो गया कि यह बीमारी नहीं, हत्या का प्रयास है।

चुपचाप मारता है थैलियम जहर

थैलियम को ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है। इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं। बाल झड़ना, नसों का काम करना बंद होना, सांस लेने में दिक्कत और अंततः मौत। यही लक्षण संदीप सिंह में भी दिखे। चिकित्सकीय विशेषज्ञों का कहना है कि थैलियम से बच पाना दुर्लभ है। ऐसे में संदीप सिंह का बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं। सवाल यह है कि यह जहर उन्हें कैसे और कब दिया गया?

एफआईआर सिर्फ शिकायत नहीं, चार्जशीट

24 अप्रैल 2025 को संदीप सिंह की पत्नी खुशबू सिंह ने मुंबई के माहिम पुलिस थाना में जीरो एफआईआर दर्ज कराई। एफआईआर में साफ कहा गया है कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने अज्ञात कारणों से थैलियम देकर उनके पति की हत्या का प्रयास किया। एफआईआर में जिन नामों और घटनाओं का उल्लेख है, वे इस मामले को साधारण नहीं रहने देते। खनन कारोबारी, राजनीतिक चेहरे और करीबी सहयोगी सब सवालों के घेरे में हैं।

राजनीति, कारोबार और अपराध का संगम

संदीप सिंह केवल एक नेता नहीं, बल्कि प्रभावशाली ट्रांसपोर्ट कारोबारी भी हैं। उनकी कंपनियां सड़क निर्माण से जुड़े परिवहन में सक्रिय हैं जहां खनन, ठेकेदारी और राजनीति का सीधा संबंध है। क्या यह कारोबारी रंजिश थी? क्या राजनीतिक प्रभाव से रास्ता साफ करने की कोशिश की गई? या फिर किसी अंदरूनी व्यक्ति ने ही यह ज़हर परोसा? जांच इन्हीं सवालों के जवाब तलाश रही है।

संदेह के घेरे में कौन?

एफआईआर में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, वे सभी संदीप सिंह के बेहद करीबी बताए जाते हैं। गुरुग्राम की यात्रा, अस्पताल में साथ रहना, खान-पान और आवाजाही इन सबकी जांच जरूरी है। क्या होटल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल्स और वित्तीय लेन-देन की जांच होगी? या मामला प्रभावशाली नामों के चलते ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

वाराणसी पुलिस के सामने अग्निपरीक्षा

जीरो एफआईआर अब वाराणसी पुलिस के पास है। यह मामला सिर्फ एक हत्या के प्रयास का नहीं, बल्कि सिस्टम की विश्वसनीयता का भी है। अगर निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह संदेश जाएगा कि रसूखदारों के लिए कानून अलग है।

जिंदा सवाल

थैलियम जैसा दुर्लभ जहर कहां से आया? इसे देने का मौका किसे मिला? महीनों तक डॉक्टर क्यों नहीं पकड़ पाए? क्या अस्पतालों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी?

सच जिंदा रहेगा या दफन?

संदीप सिंह मौत को मात देकर जिंदा लौट आए हैं, लेकिन सवाल अब भी जिंदा हैं। यह मामला तय करेगा कि उत्तर प्रदेश में सच की उम्र कितनी लंबी है।

  • * संदीप सिंह के शरीर में थैलियम पाया जाना हत्या के प्रयास की पुष्टि
    * महीनों तक बीमारी बताकर साजिश को ढका गया
    * खनन कारोबारी और राजनीतिक संपर्क संदेह के घेरे में
    * पत्नी की एफआईआर से कई प्रभावशाली नामों पर सवाल
    * वाराणसी पुलिस के सामने निष्पक्ष जांच की चुनौती
  • * क्या सीसीटीवी, होटल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल्स खंगाले जाएंगे? या मामला रसूखदारों के दबाव में ठंडे बस्ते में जाएगा?

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