चीन का कुत्ता भारत का बताकर बेच दिया, यह क्या कर दिया गलगोटिया? भारत की इज्जत मिट्टी में मिला दिया
ऑनलाइन खरीदा चीनी की यूनिट्री कंपनी का बनाया रोबोटिक डॉग

– गलगोटिया ने उसे ओरायन नाम दिया और अपना बताकर एआई एक्स्पो में बेच दिया
– विप्रो कंपनी ने भी वही कुत्ता अपना बताकर बेच दिया
– 24 घंटे में अपने की दावों को झुठलाकर मीडिया पर मढ़ दिया सारा दोष
– रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी चीनी रोबोट को भारतीय बताकर फंसे

नई दिल्ली। दिल्ली के भारत मंडपम में चल चल एआई एक्स्पो में गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने मंगलवार को चीन के रोबोटिक कुत्ते को खरीदकर उसे आरोयन नाम से अपना बताकर बेचने का मामला अब सियासी गलियारों में भी सुर्खिया पकड़ चुका है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि भारत अब चीनी टेक्नोलॉजी को अपना बताकर बेचने लगा है। भारत का टैलेंट बेरोजगार घूम रहा है, भारत का डेटा बेचा जा रहा है और सरकार आत्मनिर्भर भारत का केवल प्रचार कर रही है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, मंगलवार रात को ग्रेटर नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी के इस कारनामे के तूल पकड़ने के बाद बुधवार सुबह यूनिवर्सिटी को अपना सामान उठाकर पैवेलियन खाली करने को कह दिया गया है। खुद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव गलगोटिया के चीनी रोबोट को भारतीय बताकर फंस गए हैं।



चीनी यूनिट्री कंपनी ने बनाया रोबोट
चीन की यूनिट्री कंपनी ने यूनिट्री गो 2 के नाम से एक रोबोट बनाया था। इसकी बाजार में कीमत ढाई लाख रुपए है। आरोप है कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने वही रोबोट खरीदकर एआई एक्स्पो में अपना बताकर पेश कर दिया। कई मीडिया संस्थानों में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह की उस वीडियो बाइट को चलाया, जिसमें उन्होंने सरकारी डीडी न्यूज के रिपोर्टर के सामने चीनी रोबोट को गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्रों का बनाया हुआ बताया। केवल यही नहीं, कोरियाई कंपनी के बनाए एक फुटबॉल रोबोट को भी उन्होंने उसी डीडी न्यूज में अपनी यूनिवर्सिटी में बना हुआ बताया। प्रोफ. नेहा सिंह ने यह भी दावा किया कि उनकी यूनिवर्सिटी ने इन एआई उत्पादों को बनाने के लिए 350 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया है। बाद में सोशल मीडिया ने जब पड़ताल करने के बाद बाकायदा सबूतों के साथ इन उत्पादों के चीन में बने होने की पुष्टि कर दी तो बखेड़ा खड़ा हो गया। यहां तक कि चीन के मीडिया प्लैटफॉर्म्स और वेबसाइटों ने भारत के एआई एक्स्पो में चीनी माल को बेचे जाने की जमकर खिल्ली उड़ाई।
रातभर में पलट गईं नेहा
बुधवार सुबह जब मीडिया का हुजूम नेहा सिंह से उन पर लगे आरोपों की सफाई लेने पहुंचा तो बजाय गलती मानने के, प्रोफ. नेहा सिंह ने कहा, ‘मेरी बातों को ठीक से समझे बिना घुमा-फिराकर पेश किया गया है। हमने यह कभी नहीं कहा कि चीन में बने रोबोटिक कुत्ते को हमने बनाया है। हमने तो गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्रों को इन्हें मॉडल बनाकर पेश किया था, ताकि वे उनसे कुछ सीख सकें और अपने स्तर पर और उन्नत एआई मॉडल डेवलप कर सकें।’ नेहा ने दावा किया कि उनकी गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक आई तकनीक के विकास पर 350 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। यूनिवर्सिटी में आधुनिक लैब भी बनाई गई है। हालांकि, इतना कुछ कहने के बाद भी उन्होंने न तो माफी मांगी और झूठ बोलने की बात मानी।
अमेजन में उपलब्ध है यूनिट्री गो 2
चीन में बना रोबोटिक कुत्ता अमेजन में आसानी से 2800 डॉलर में बिक रहा है। इसे कोई भी खरीद सकता है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफ. नेहा ने कहा कि यूनिवर्सिटी के कैम्पस में यही कुत्ता घूमता रहता है। यहां तक तो बात ठीक है, लेकिन पत्रकारों को वे यह नहीं बता सकीं कि उन्होंने उसे कुत्ते को भारत के एआई एक्स्पो में क्यों पेश किया। हालांकि, नेहा ने कहा कि उनके द्वारा पेश रोबोटिक कुत्ते पर जो मूल कंपनी की ब्रांडिंग और नाम लिखा है, उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। केवल यही नहीं, गलगोटिया यूनिवर्सिटी के पैवेलियन में कोरियाई कंपनी का बना एआई आधारित फुटबॉल भी रखा गया था, जो ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स पर स्ट्राइकर वी3 एआरएफ सेमी असेंबल्ड सेट के नाम से 453 डॉलर में बिकता है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने मंगलवार को डीडी न्यूज के वीडियो में उसे भी अपनी यूनिवर्सिटी में बना बताकर बेच दिया था।
विप्रो ने भी चीनी कुत्ता बेचा
भारत के आईटी सेक्टर में 2 लाख करोड़ से भी अधिक का मार्केट कैप रखने वाली दिग्गज आईटी कंपनी विप्रो ने भी मंगलवार को चीनी रोबोटिक कुत्ता यूनिट्री गो 2 को अपने पैवेलियन में बेचा, जो गलगोटिया यूनिवर्सिटी के स्टॉल में भी बिक रहा था। बुधवार को जब मीडिया ने विप्रो कंपनी से जवाब मांगा तो कंपनी ने साफ कह दिया कि उसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने बनाया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली के भारत मंडपम में एआई इंडिया एक्स्पो के दौरान लाखों रुपए देकर पैवेलियन खरीदने वाली कंपनियों ने चीन के रोबोट्स की नुमाइश क्यों की? इससे भी गंभीर सवाल यह है कि आयोजक भारतीय सूचना तकनीक मंत्रालय ने भी यह चेक नहीं किया कि स्टॉल्स पर जो उत्पाद भारत में बने दिखाए जा रहे हैं, वे आखिर बने कहां से हैं? उन्हें कहीं बाहर से खरीदकर तो नहीं लाया गया है ?
पहले भी गलती कर चुकी है गलगोटिया
कोविड महामरी के दौर में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में दावा किया गया था कि तेज आवाज से कोरोना के वायरस खत्म हो जाते हैं और इसी धारणा को सोबित करने के लिए अध्ययन में ताली-थाली, घंटी, घंटा और पुंगी बजाने की सलाह दी गई थी। इस झूठी रिसर्च के बावजूद पीएम नरेंद्र मोदी ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी को देश की सबसे श्रेष्ठ प्राइवेट यूनिवर्सिटी का अवॉर्ड प्रदान किया था। यूनिवर्सिटी को यह अवॉर्ड 2014 में मिला था। उसके बाद 17 मार्च 2018 को भाजपा के तत्कालीन प्रवक्ता संबित पात्रा ने यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी।
एआई तकनीक में कहां खड़ा है भारत?
1. दुनिया में कुल AI पेटेंट के मामले में भारत का हिस्सा 0.39% है। चीन का 70% है।
2. चीन AI पर 100 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है, जबकि भारत सिर्फ़ 12 मिलियन, यानी 1000 करोड़।
3. अमेरिकी कंपनियां AI पर 650 बिलियन डॉलर फूंक रही हैं।
4. भारत की किसी भी यूनिवर्सिटी/ आईआईटी ने कोई ढंग का लार्ज लैंग्वेज मॉडल, यानी LLM नहीं बनाया है, जिस पर AI काम करे।
5. भारत हर साल दुनिया का 20% डेटा अकेले पैदा करता है। लेकिन डेटा स्टोरेज में भारत का हिस्सा सिर्फ़ 3% है।
6. भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों द्वारा 2023 में दाखिल किए गए पेटेंट के आवेदनों के हिसाब से गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नंबर तीसरा है। यूनिवर्सिटी ने कुल 1089 पेंटेंट के आवेदन पेश किए, जबकि आईआईटी के सभी संस्थानों ने मिलकर 803 पेटेंट के आवेदन किए। इसके बावजूद गलगोटिया को एआई एक्स्पो 2026 में चीनी रोबोट खरीदकर उसे अपना बताकर दिखाना पड़ा।



