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डायग्नोस्टिक सेंटरों का काला कारोबार नकली डॉक्टरों के भरोसे चल रही ‘मौत की दुकानें’

  • डायग्नोस्टिक सेंटरों का काला कारोबार नकली डॉक्टरों के भरोसे चल रही ‘मौत की दुकानें’
  • बोर्ड पर बड़े-बड़े डॉक्टर, अंदर झोलाछाप का राज
  • डिग्री किराए पर, इलाज ठेके पर मरीजों की जिंदगी दांव पर
  • जांच के नाम पर जेब कटाई, इलाज के नाम पर खिलवाड़
  • स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत से फल-फूल रहा फर्जी नेटवर्क
  • ग्रामीण मरीज सबसे आसान शिकार, रेफरल पर मोटा कमीशन
  • मौत के बाद समझौते की पटकथा, दबा दिए जाते हैं मामले
  • किराए के डॉक्टर महीने में दो दिन, नाम पूरे महीने
  • राजनीतिक संरक्षण में फलता-फूलता डायग्नोस्टिक माफिया

चंदौली (चकिया)। जहां अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों को मरीजों की जिंदगी बचाने का केंद्र होना चाहिए, वहीं चकिया क्षेत्र में यह व्यवस्था धीरे-धीरे मौत के सौदे में बदलती जा रही है। सफेद कोट और डॉक्टर की उपाधि के पीछे छिपा एक ऐसा काला कारोबार सामने आ रहा है, जिसमें मरीजों की बीमारी से ज्यादा उनकी मजबूरी का इलाज किया जा रहा है। सूत्रों और स्थानीय लोगों के अनुसार, चकिया क्षेत्र में संचालित कई निजी अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटर ऐसे लोगों के हाथों में हैं, जिनके पास न तो कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल डिग्री है और न ही चिकित्सा सेवा का अनुभव। इसके बावजूद वे खुद को डॉक्टर बताकर इलाज कर रहे हैं। बोर्ड पर बड़े-बड़े विशेषज्ञ डॉक्टरों के नाम चमकते हैं, लेकिन हकीकत में मरीजों को देखने वाले झोलाछाप या टेक्नीशियन होते हैं। इस पूरे खेल में सबसे खतरनाक पहलू यह है कि कई जगहों पर डॉक्टर केवल नाम और डिग्री देने के लिए किराए पर रखे जाते हैं। महीने में दो-तीन दिन के लिए आने वाले डॉक्टरों के नाम से पूरे महीने मरीजों का इलाज चलता रहता है। इस व्यवस्था में इलाज का जिम्मा उन लोगों के हाथों में होता है, जिनके पास न प्रशिक्षण है, न अनुभव और न ही कानूनी अधिकार। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीज, जो पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं, इस फर्जी तंत्र के सबसे आसान शिकार बन जाते हैं। बीमारी और मजबूरी के बीच उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि जिस व्यक्ति से वे इलाज करा रहे हैं, वह असल में डॉक्टर है भी या नहीं। सूत्रों का दावा है कि जब भी स्वास्थ्य विभाग की टीम जांच के लिए आती है, तो पूरा सिस्टम अचानक बदल जाता है। जिन डॉक्टरों को महीनों तक सेंटर में नहीं देखा जाता, वे जांच के दिन मौजूद मिलते हैं। कागजों में सब कुछ दुरुस्त दिखा दिया जाता है और मामला वहीं खत्म हो जाता है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि कई मामलों में लापरवाही या गलत इलाज के कारण मरीजों की मौत तक हो जाती है। लेकिन मौत के बाद भी सच्चाई सामने नहीं आती। स्थानीय स्तर पर पुलिस, प्रभावशाली लोगों और सेंटर संचालकों के बीच पहले से बनी सेटिंग के जरिए मामलों को दबा दिया जाता है। चकिया क्षेत्र में इस पूरे नेटवर्क के पीछे राजनीतिक संरक्षण की भी चर्चा है। स्थानीय स्तर पर सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं का समर्थन मिलने के कारण यह कारोबार बेखौफ चलता रहता है। यही वजह है कि वर्षों से शिकायतों के बावजूद इन सेंटरों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती। सूत्रों के मुताबिक, केयर डायनोस्टिक समेत कई सेंटर इस पूरे नेटवर्क के केंद्र में बताए जा रहे हैं। इतना ही नहीं, गांवों में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टरों और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से रेफरल का एक बड़ा कमीशन तंत्र भी काम कर रहा है। मरीज को जितनी ज्यादा जांच के लिए भेजा जाएगा, उतनी ज्यादा कमाई होगी। इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या स्वास्थ्य सेवा अब पूरी तरह कारोबार में बदल चुकी है और अगर ऐसा है तो इस कारोबार की कीमत आखिर कौन चुका रहा है। गरीब और ग्रामीण मरीज, जो इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन कई बार जिंदगी दांव पर लगाकर लौटते हैं।

* चकिया क्षेत्र में कई डायग्नोस्टिक सेंटर बिना योग्य डॉक्टरों के संचालित
* बोर्ड पर डॉक्टरों के नाम, लेकिन मौके पर झोलाछाप या टेक्नीशियन
* डिग्रीधारी डॉक्टर केवल लाइसेंस के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर
* महीने में 2-3 दिन उपस्थिति, नाम पूरे महीने इस्तेमाल
ग्रामीण मरीज सबसे ज्यादा शिकार
* जांच और रेफरल पर कमीशन का बड़ा नेटवर्क
* मौत के मामलों को दबाने के आरोप
* स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रभावशाली लोगों की भूमिका संदिग्ध

स्वास्थ्य सेवा या कमाई का अड्डा

चकिया क्षेत्र में तेजी से बढ़ते निजी अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों ने स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का दावा जरूर किया, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। जांच में सामने आ रहा है कि कई सेंटर ऐसे लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं, जिनका चिकित्सा क्षेत्र से कोई संबंध ही नहीं है। चिकित्सा सेवा के नाम पर यहां केवल व्यवसाय चल रहा है। मरीजों की बीमारी से ज्यादा उनकी जेब पर ध्यान दिया जाता है। मरीज अस्पताल में प्रवेश करता है और कुछ ही मिनटों में उसे कई तरह की जांचों की लंबी सूची थमा दी जाती है।

बोर्ड पर डॉक्टर, इलाज झोलाछाप के हाथ

चकिया के कई डायग्नोस्टिक सेंटरों के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड लगे हैं जिन पर एमडी, डीएम, एमबीबीएस जैसे बड़े-बड़े डिग्रीधारी डॉक्टरों के नाम लिखे होते हैं। लेकिन जब मरीज अंदर पहुंचता है तो उसे देखने वाला व्यक्ति कोई प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं बल्कि टेक्नीशियन या झोलाछाप होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई डॉक्टरों को केवल नाम देने के लिए जोड़ा जाता है।

किराए के डॉक्टरों का खेल

सूत्रों के अनुसार, कई सेंटरों ने डिग्रीधारी डॉक्टरों से समझौता कर रखा है। इन डॉक्टरों की भूमिका केवल कागजों पर मौजूद रहने तक सीमित होती है। महीने में 2-3 दिन सेंटर पर आना, रजिस्टर और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना, विभागीय जांच के समय उपस्थित होना
इसके बदले उन्हें तय रकम दी जाती है।

जांच के नाम पर जेब कटाई

इन सेंटरों में सबसे बड़ा खेल जांचों के नाम पर चलता है। मरीज को अक्सर ऐसी जांचें भी लिख दी जाती हैं जिनकी उसे जरूरत नहीं होती। ब्लड टेस्ट, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और अन्य जांचों का एक लंबा बिल मरीज को थमा दिया जाता है।

ग्रामीण मरीज सबसे ज्यादा शिकार

चकिया क्षेत्र के आसपास के गांवों से आने वाले मरीज इस सिस्टम के सबसे आसान शिकार बनते हैं। उन्हें न तो मेडिकल डिग्री की जानकारी होती है और न ही अस्पतालों की वैधता की। वे केवल बोर्ड पर लिखे डॉक्टरों के नाम देखकर भरोसा कर लेते हैं।

रेफरल पर कमीशन का नेटवर्क

सूत्रों के अनुसार, गांवों में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टर और कुछ आशा कार्यकर्ता मरीजों को इन सेंटरों तक भेजते हैं। हर मरीज के बदले उन्हें कमीशन दिया जाता है।
यह कमीशन कई बार जांच के बिल का 20 से 30 प्रतिशत तक होता है।

मौत के बाद समझौते की कहानी

सबसे गंभीर आरोप यह है कि कई मामलों में गलत इलाज या लापरवाही के कारण मरीजों की हालत बिगड़ जाती है। कुछ मामलों में मौत भी हो जाती है। लेकिन ऐसे मामलों को सामने आने से पहले ही दबा दिया जाता है। परिजनों से समझौता, पुलिस स्तर पर मामला शांत, राजनीतिक दबाव, स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर सवाल। इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती। जांच के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई जाती है।

राजनीतिक संरक्षण का आरोप

चकिया क्षेत्र में कई सेंटरों को स्थानीय राजनीतिक संरक्षण मिलने की चर्चा भी है। यही कारण है कि नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने के बावजूद इन पर कार्रवाई नहीं होती। केयर डायग्नोस्टिक समेत कई सेंटर सवालों के घेरे में। सूत्रों के अनुसार, केयर डायग्नोस्टिक समेत कई सेंटर इस पूरे नेटवर्क के केंद्र में बताए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इन सेंटरों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं।

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