
* इससे पहले आईएमएफ ने भी मोदी सरकार के जीडीपी को बताया था झूठा
* भारत की वास्तविक विकास दर असल में पांच फीसदी से भी नीचे
* मोदी सरकार की गणना प्रणाली की उड़ी धज्जियां, नियमों को रखा ताक पर
* आम जनता से नोटबंदी और कोविड के दौरान इकोनमी को हुए नुकसान को छिपाया
नई दिल्ली। भारत के 140 करोड़ लोगों को बीते 20 साल से जीडीपी का झूठा डेटा परोसा जा रहा है। 2014 में केंद्र की सत्ता में आई नरेंद्र मोदी की सरकार ने सबसे पहले तो 2011 में पिछली यूपीए सरकार के जीडीपी डेटा का अनुमान कम लगाया और फिर 2012 से 2023 तक के जीडीपी डेटा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।
यह बात हालांकि, सोशल मीडिया पर कई बार कही जा चुकी है। लेकिन अब पहली बार भारत में मोदी सरकार के ही मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्ममण्यम ने कहकर तहलका मचा दिया है। उन्होंने एक रिसर्च पेपर लिखा है, जिसमें भारत के अनौपचारिक क्षेत्र के आंकड़ों का उपयोग कर कॉर्पोरेट सेल्स, ऋण और एक्सपोर्ट के आंकड़ों की तुलना करते हुए मोदी सरकार की जीडीपी को झूठा करार दिया है। भारत सरकार ने अपने ही आर्थिक सलाहकार की रिपोर्ट को गलत बताया है।

मुद्राकोष भी बता चुका है झूठा
बीते साल अप्रैल में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने भी भारत के 4.197 ट्रिलियन के डेटा को झूठा और भ्रामक बताया था। भारत की मोदी सरकार के आंकड़ों में दावा किया गया था कि देश की इकोनमी 2025-26 में 4.197 ट्रलियन डॉलर है, जो कि जापान के 4.196 ट्रिलियन डॉलर से कुछ ही आगे है। इसी के आधार पर भारत सरकार ने अपनी जीडीपी को दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था कहकर ऐलान किया था, लेकिन यह दावा भी कुछ ही दिनों में खोखला साबित हुआ। इसके कुछ ही हफ्ते बाद नीति आयोग के तत्कालीन सीईओ बीवीआर सुब्रहमण्यम ने भारत के आधिकारिक रूप से जापान की इकोनमी से ऊपर होने के डेटा को खारिज कर दिया था। फिर अक्टूबर में आईएमएफ ने भारत के बारे मं पूर्वानुमान को खारिज करते हुए बताया कि हम जापान से अभी आगे नहीं हुए, बल्कि पीछे हैं। लेकिन मोदी सरकार के आर्थिक और सांख्यिकीय मंत्रालय ने दावा किया कि देश की जीडीपी 2014-15 के 125.41 लाख करोड़ रुपए से 2024-25 में 33.68 लाख करोड़ रुपए हो गई है। लेकिन अब पीटरसन इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनमिक्स के वर्किंग पेपर में कहा गया है कि मोदी सरकार ने इन आंकड़ों को बढ़स-चढ़ाकर बताया है। इसी वर्किंग पेपर के सह लेखक अरविंद सुब्रह्ममण्यम हैं। उनके साथ अभिषेक आनंद और जोश फेलमैन ने भी इस पेपर को लिखा है।
मोदी सरकार ने पणाली ही बदल दी
वर्किंग पेपर में अरविंद लिखते हैं कि भारत की मोदी सरकार ने 2015 में देश की जीडीपी के आंकलन की प्रणाली ही बदल दी। विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने 2016 से लगातार इस पर सवाल उठाया है। मोदी सरकार ने जीडीपी के आंकलन की प्रणाली इसलिए बदली, ताकि 2005 से 2011 के दौरान भारत की आर्थिक स्तर पर आई सबसे ऊंची तरक्की को छिपाया जा सके। इस कालखंड में भारत की जीडीपी पहली बार 6.9 फीसदी की दर से बढ़ी थी। इसके बाद 2012 से 2023 तक देश की आर्थिक प्रगति की रफ्तार 6 फीसदी रही। अब अरविंद कह रहे हैं कि मोदी सरकार ने इस बढ़त को 1.5 से 2 प्रतिशत ज्यादा दिखाया। उनका कहना है कि भारत की विकास दर स्थायी रूप से पिछले दो दशकों में 6 फीसदी कभी नहीं रही। यह तो साल 2000 के दशक से ही आगे बढ़नी शुरू हुई।
भारत की विकास दर 4 फीसदी के बराबर
अरविंद ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि साल 2023 तक मोदी राज में भारत की विकास दर 4 से 4.5 प्रतिशत ही रही। वर्किंग पेपर के लेखकों का कहना है कि इसके बावजूद भारत की विकास दर दुनिया के सबसे तेज 6 या 7 देशों में रही। लेखकों का कहना है कि जीडीपी के आंकलन में सबसे बड़ी गड़बड़ जनवरी 2015 में गणना की प्रणाली में फेरबदल से हुई। इसके लिए मोदी सरकार के पास डेटा के जितने स्रोत होने चाहिए थे, वे नहीं थे। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस में प्रोफेसर और अर्थशास्त्री नरेंद्र पानी कहते हैं, जीडीपी की गणना या तो वस्तुओं और सेवाओं के सारे मूल्यों को मिलाकर की जानी चाहिए या फिर बाजार की दर से उसका अंतिम मूल्य निकालकर किया जा सकता है। 2015 से पहले भारत फैक्टर कॉस्ट प्रणाली का उपयोग करता था। इसके लिए सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़े चाहिए, जो कि मोदी सरकार के आने के बाद सरकार को कभी नहीं मिले। इसी को देखते हुए जनवरी 2015 में मोदी सरकार ने बाजार दर पर जीडीपी को आंकना शुरू किया। लेकिन सरकार ने देश के अनौपचारिक क्षेत्र को आंकन के लिए औपचारिक क्षेत्र के फर्जी आंकड़ों का उपयोग किया, जिससे जीडीपी के आंकड़ों में विसंगतियां पेश आईं। पाणी कहते हैं कि जब इन अनुमानों को व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है तो देश की आर्थिक विकास दर गलत रूप में सामने आती है।
कोविड का नुकसान ऐसे छिपाया
वर्किंग पेपर में यह साफ लिखा है कि कोविड महामारी के दौरान देश की आर्थिक स्थिति को भारी नुकसान हुआ, लेकिन मोदी सरकार ने अनौपचारिक क्षेत्र के फर्जी आंकड़ों की बदौलत इस नुकसान को छिपा लिया। अरविंद कहते हैं कि नोटबंदी के दौरान भारत की जीडीपी 8.3 प्रतिशत की रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। लेकिन नोटबंदी के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले ने भारत में क्रेडिट क्रंच पैदा कर दिया और तब गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं ही ऐसी थीं, जिनके सहारे देश की इकोनमी बच पाई। वर्किंग पेपर में उसके बाद, यानी जून 2025 की स्थिति का आंकलन किया गया है, जिसमें देश में निजी निवेश और रोजगार का सृजन तो कमजोर था, लेकिन जीडीपी तेजी से बढ़ रही थी। पेपर में कहा गया है कि 2015 से 2020 तक औपचारिक सेक्टर जहां 10 फीसदी की दर से बढ़ रहा था, वहीं अनौपचारिक क्षेत्र की रफ्तार 6.8 प्रतिशत ही थी। लेकिन मोदी सरकार ने दोनों को एक-समान बढ़त वाला मान लिया। इससे जीडीपी की बढ़त गलत साबित हो गई। इसके बाद फरवरी 2026 में मोदी सरकार ने जीडीपी के आंकलन की प्रणाली एक बार फिर बदलकर 2023 के मापकों के आधार पर कर दी।
असली आंकड़ों से मल नहीं
वर्किंग पेपर में जीडीपी को सही मायनों में मापने वाले एक्सपोर्ट, बैंक लोन और औद्योगिक विकास के आंकड़ों के साथ बिजली की खपत, टैक्स से सरकार को आय और कॉर्पोरेट की बिक्री को ध्यान में रखा गया है। इसमें कहा गया है कि 1995 से 2011 तक भारत सरकार ने इन्हीं आंकड़ो के आधार पर जीडीपी की गणना की थी। लेकिन मोदी सरकार ने गणना की प्रणाली इस तरह से बदली कि तमाम आंकड़े झूठे साबित हो गए। 2016 की नोटबंदी के दौरान कॉर्पोरेट की बिक्री 1.4 फीसदी थी, लेकिन मोदी सरकार ने आम लोगों को बरगलाने के लिए उसे 8 फीसदी बताया। उसी तरह 2019 में कॉर्पोरेट की बिक्री 4.5 फीसदी थी और 2024 में यह 2.2 प्रतिशत हो गई। लेकिन दोनों ही समय समग्र वैल्यू एडेड 3 से 6.4 प्रतिशत तक रहा, लेकिन भारत के जीडीपी आंकड़ों में वह कहीं नजर नहीं आता।
वित्त और निवेश पर दुष्प्रभाव
प्रोफेसर पाणि कहते हैं कि जीडीपी के फर्जी आंकड़ों का सबसे बुरा प्रभाव वित्त और निवेश पर पड़ा है। मोदी सरकार ने नॉमिनल आय पर टैक्स लगाया, न कि वास्तविक आय पर। सरकार ने नॉमिनल जीडीपी से महंगाई दर को बाहर निकाल दिया और वास्तविक जीडीपी का आंकलन करने लगी, जो कि गलत है। इस तरह मोदी सरकार ने मूल्य वृद्धि को अनदेखा किया और जीडीपी को नॉमिनल आधार पर लाकर खड़ा कर दिया। इसका परिणाम प्रोफेसर पाणि के अनुसार, आय में भीषण असंतुलन के रूप में सामने आया है। वे कहते हैं कि जीएसटी असल में एक परोक्ष कर प्रणाली है, जो सभी को देनी पड़ती है। यह एक गैर बराकरी वाला कर ढांचा है, जिसे गरीब और अमीर सभी को चुकाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जब वस्तुओं की मांग कमजोर होती है तो अर्थव्यवस्था विभाजित हो जाती है। इसमें एक तरफ की अर्थव्यवस्था तो चलती है, लेकिन दूसरी ओर की आर्थिक स्थिति कमजोर हो जाती है। इससे राजनीतिक दबाव पैदा होता है और सरकार जनकल्याणकारी कार्यक्रमों से समझौता करने लगती है। इस समय कई सरकारें इस रास्ते पर चल रही हैं। पाणि ने कहा कि जीडीपी के आंकड़ों में फर्जीवाड़े का असर भारत में निवेश पर भी दिखाई दे रहा है। इसे देश में विदेशी बनाम देशी निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।



