मोदी के क्षेत्र में कानून का खून संपत्ति विवाद बना खूनी खेल, दबंगों के आगे वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट फेल
घर में घुसकर बुजुर्गों और महिलाओं पर बेरहम हमला

- कैंसर पीड़िता तक को नहीं बख्शा, इंसानियत हुई शर्मसार
- संपत्ति विवाद में गुंडाराज का खुला प्रदर्शन
- पुलिस की मौजूदगी के बावजूद अपराधियों के हौसले बुलंद
- दबंगों का नाम सामने, लेकिन कार्रवाई पर सवाल
- माफिया कनेक्शन की चर्चा से सिहर उठा शहर
- कानून का डर खत्म, परिवार खून से लथपथ
- पुलिस कमिश्नरेट के सिस्टम की साख पर लगा दाग
वाराणसी। यह वही काशी है, जहां धर्म, आस्था और सभ्यता की मिसाल दी जाती है, लेकिन इसी शहर की एक पॉश कॉलोनी में जो हुआ, उसने कानून-व्यवस्था के तमाम दावों को खून से लथपथ कर दिया। कैंट थाना क्षेत्र की डीआईजी कॉलोनी में संपत्ति विवाद ने ऐसा भयावह रूप लिया कि इंसानियत तक शर्मसार हो गई। दबंगों का एक गिरोह खुलेआम घर में घुसा और पूरे परिवार पर जानलेवा हमला कर दिया। बुजुर्गों को पीटा गया, महिलाओं को नहीं बख्शा यहां तक कि कैंसर से जूझ रही महिला तक को बर्बरता का शिकार बनाया गया। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की असलियत है, जो खुद को सख्त कानून-व्यवस्था का प्रतीक बताता है। सवाल यह है कि आखिर एक सुरक्षित मानी जाने वाली कॉलोनी में दिनदहाड़े या देर शाम इस तरह का हमला कैसे हो जाता है। क्या अपराधियों को कानून का कोई डर नहीं बचा या फिर उन्हें यह भरोसा है कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। घटना में 70 वर्षीय विराज सिंह से लेकर 35 वर्षीय विश्वजीत सिंह, कैंसर पीड़ित किरण सिंह, शिवा सिंह, ज्योति सिंह, नीलम सिंह और आभा सिंह गंभीर रूप से घायल हुए हैं। यह सिर्फ हमला नहीं, बल्कि एक परिवार को खत्म कर देने की कोशिश थी। घायलों को आनन-फानन में पुलिस की 112 टीम द्वारा पं.दीनदयाल उपाध्याय राजकीय अस्पताल पहुंचाया गया, जहां से गंभीर हालत में कुछ लोगों को ट्रॉमा सेंटर रेफर करना पड़ा। सबसे डरावनी बात यह है कि इस हमले के पीछे जिस नाम की चर्चा हो रही है, वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बताया जा रहा, बल्कि उसका संबंध कभी माफिया नेटवर्क से रहा है। आरोप है कि अभिषेक सिंह उर्फ ‘बड़े’ इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है, जो कभी कुख्यात माफिया मुख्तार अंसारी का करीबी रहा है। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ एक संपत्ति विवाद नहीं, बल्कि अपराध और संरक्षण के गठजोड़ की खतरनाक झलक है। प्रशासन ने मामले में बीएनएस की धारा 115(2), 352, 351(3), 109(1) और 110 के तहत एफआईआर दर्ज कर ली है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एफआईआर दर्ज कर देने से न्याय मिल जाएगा या फिर यह भी उन हजारों मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा, जहां पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटकते रह जाते हैं और आरोपी खुलेआम घूमते रहते हैं। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वाराणसी में कानून का खौफ खत्म होता जा रहा है। दबंगों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि वे अब घरों में घुसकर हमला करने से भी नहीं हिचक रहे। और जब एक कैंसर पीड़ित महिला तक को नहीं बख्शा जाता, तो यह समझना मुश्किल नहीं कि अपराधियों के भीतर इंसानियत नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। यह सिर्फ एक परिवार पर हमला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है। क्या पुलिस और प्रशासन इस तरह की घटनाओं को रोक पाने में सक्षम हैं? या फिर यह शहर धीरे-धीरे उन हालात की ओर बढ़ रहा है, जहां कानून सिर्फ कागजों में रह जाएगा और सड़कों पर दबंगों का राज होगा।

सुरक्षित मानी जाने वाली डीआईजी कॉलोनी में खौफ का तांडव
कैंट थाना क्षेत्र की डीआईजी कॉलोनी, जिसे आमतौर पर शहर के सुरक्षित और व्यवस्थित इलाकों में गिना जाता है, उसी इलाके में इस तरह की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। जिस कॉलोनी में आमतौर पर शिक्षित, संपन्न और जागरूक परिवार रहते हैं, वहां अगर दबंग खुलेआम घर में घुसकर हमला कर सकते हैं, तो शहर के अन्य इलाकों की स्थिति का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। घटना के वक्त आसपास के लोगों ने चीख-पुकार सुनी, लेकिन हमलावरों के आतंक के चलते कोई तुरंत हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। यह भय का वही माहौल है, जो तब बनता है जब अपराधियों को यह भरोसा हो जाता है कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।
संपत्ति विवाद लालच, दबंगई और हिंसा का घातक मेल
सूत्रों के अनुसार, इस परिवार के बीच लंबे समय से संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था। लेकिन इस विवाद को सुलझाने के बजाय इसे दबंगई और ताकत के दम पर खत्म करने की कोशिश की गई। यह घटना उदाहरण है कि किस तरह संपत्ति विवाद अब कानूनी प्रक्रिया से हटकर सीधे हिंसा और हमले में बदलते जा रहे हैं। अदालतों में लंबित मामलों, धीमी न्याय प्रक्रिया और प्रशासनिक उदासीनता का फायदा उठाकर दबंग तत्व सीधे हमला करने का रास्ता अपना रहे हैं।
सुनियोजित हमला अचानक नहीं, पूरी तैयारी के साथ थे हमलावर
प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह हमला अचानक नहीं था, बल्कि पूरी योजना के तहत अंजाम दिया गया। हमलावरों की संख्या अधिक थी और वे लाठी-डंडों सहित अन्य हथियारों से लैस थे। जिस तरह से घर में घुसकर एक-एक व्यक्ति को निशाना बनाया गया, उससे साफ जाहिर होता है कि हमलावरों का मकसद सिर्फ डराना नहीं, बल्कि गंभीर चोट पहुंचाना था। कुछ लोगों का मानना है कि अगर समय पर पुलिस नहीं पहुंचती, तो यह घटना और भी भयावह रूप ले सकती थी।
इंसानियत शर्मसार कैंसर पीड़िता तक को नहीं बख्शा
इस घटना का सबसे क्रूर और अमानवीय पहलू यह रहा कि हमलावरों ने यह तक नहीं देखा कि सामने कौन है। 70 वर्षीय बुजुर्ग विराज सिंह पर हमला तो हुआ ही, लेकिन कैंसर से जूझ रही किरण सिंह को भी नहीं छोड़ा गया। यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती संवेदनहीनता का खतरनाक संकेत है। जब बीमार और असहाय लोगों पर भी हमला होने लगे, तो यह समझना मुश्किल नहीं कि अपराधियों के भीतर किसी तरह की नैतिकता या भय शेष नहीं बचा है।
खून से लथपथ घर घटनास्थल का भयावह मंजर
घटना के बाद जब पुलिस मौके पर पहुंची, तो घर के अंदर का दृश्य बेहद भयावह था। फर्श पर खून के धब्बे, टूटा हुआ सामान और घायल पड़े लोग यह सब इस बात का प्रमाण था कि हमला कितनी बर्बरता से किया गया।
परिजनों के अनुसार, हमलावरों ने न सिर्फ मारपीट की, बल्कि घर के सामान को भी नुकसान पहुंचाया। यह हमला सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी तोड़ देने वाला था। हालांकि 112 पुलिस टीम ने मौके पर पहुंचकर घायलों को अस्पताल पहुंचाया, लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह प्रतिक्रिया पर्याप्त थी। सवाल यह भी है कि क्या इलाके में पहले से चल रहे विवाद की जानकारी पुलिस को थी, अगर थी, तो फिर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
माफिया कनेक्शन की चर्चा
इस मामले में जिस नाम की चर्चा हो रही है अभिषेक सिंह उर्फ ‘बड़े’ का संबंध माफिया नेटवर्क से बताया जा रहा है। यह कनेक्शन ही इस पूरे मामले को और ज्यादा गंभीर बना देता है। अगर किसी आरोपी का संबंध पहले से संगठित अपराध से रहा है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई और भी सख्त होनी चाहिए। लेकिन अक्सर देखा गया है कि ऐसे मामलों में पुलिस पर दबाव या राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका बनी रहती है।
एफआईआर दर्ज, लेकिन कार्रवाई अधूरी
कैंट थाने में बीएनएस की धारा 115(2), 352, 351(3), 109(1) और 110 के तहत मामला दर्ज किया गया है। लेकिन एफआईआर दर्ज करना ही अंतिम समाधान नहीं है। अब तक की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या आरोपियों की गिरफ्तारी हुई अगर नहीं, तो क्यों। क्या पुलिस को उनकी लोकेशन नहीं पता, या फिर किसी दबाव में कार्रवाई टाली जा रही है।
कमिश्नरेट सिस्टम की परीक्षा
वाराणसी में लागू कमिश्नरेट सिस्टम को कानून-व्यवस्था मजबूत करने के लिए लाया गया था। लेकिन इस तरह की घटनाएं यह बताती हैं कि सिस्टम की असली परीक्षा जमीनी स्तर पर होती है, जहां वह कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। यह घटना प्रशासन के लिए एक टेस्ट केस है अगर यहां सख्त कार्रवाई होती है, तो यह संदेश जाएगा कि कानून जिंदा है। लेकिन अगर ढिलाई बरती गई, तो यह अपराधियों के लिए खुला आमंत्रण होगा।
पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद या सिस्टम से निराशा
घटना के बाद पीड़ित परिवार दहशत में है। उनके लिए यह सिर्फ शारीरिक चोट नहीं, बल्कि मानसिक आघात भी है। क्या उन्हें न्याय मिलेगा या फिर यह मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा। यह घटना सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह पूरे समाज के लिए चेतावनी है कि अगर कानून का डर खत्म हो गया, तो कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। या तो वह इस मामले में सख्त कार्रवाई करके उदाहरण पेश करे, या फिर चुप रहकर अपराधियों के हौसले और बुलंद कर दे। काशी की गलियों में अगर अब घर के अंदर घुसकर खून बहाया जा रहा है, बुजुर्गों और बीमारों को पीटा जा रहा है, और आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं यह उस व्यवस्था का पतन है, जो खुद को मजबूत बताती है। यह घटना एक आईना है, जिसमें प्रशासन की असल तस्वीर दिख रही है।
* संपत्ति विवाद ने लिया हिंसक रूप
* घर में घुसकर पूरे परिवार पर हमला
* बुजुर्ग और कैंसर पीड़ित महिला भी घायल
* माफिया कनेक्शन की चर्चा
* पुलिस की भूमिका पर सवाल
* एफआईआर दर्ज, लेकिन गिरफ्तारी का इंतजार
* कमिश्नरेट सिस्टम की विफलता उजागर
* इलाके में डर और असुरक्षा का माहौल



