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जारी है कांग्रेस में संकटो का दौर, बागियों का नही है कोई ठौर

कांग्रेस का क्षरणकाल पलायन, बगावत और नेतृत्व संकट में डूबती सबसे पुरानी पार्टी

  • नेताओं का पलायन या जहाज छोड़ते सवार? कांग्रेस में भरोसे का संकट गहराया
  • राज्य-दर-राज्य ‘छोटे हाईकमान’ ने तोड़ी संगठन की रीढ़
  • 2014 के बाद 400 के करीब नेताओं का दलबदल क्या बची है कांग्रेस
  • भाजपा बनी राजनीतिक शरणस्थली, कांग्रेस का कैडर हो रहा खाली
  • राहुल गांधी की ‘न झुकने’ वाली राजनीति या संवादहीनता की समस्या
  • मध्यप्रदेश से असम तक हर राज्य में असंतोष की आग
  • पुराने दिग्गज बनाम नई नेतृत्व शैली टकराव से टूट रही पार्टी
  • कमजोर विपक्ष मजबूत सत्ता? क्या यही लोकतंत्र का नया गणित

भारतीय राजनीति में एक समय ऐसा था जब अगर कोई पार्टी ‘सिस्टम’ का पर्याय मानी जाती थी, तो वह कांग्रेस थी। आज वही कांग्रेस सवालों, संकटों और सिमटते जनाधार के बीच खड़ी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पार्टी चुनाव हार रही है। सवाल यह है कि क्या पार्टी खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई हारती जा रही है। बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस के भीतर जो घटनाएं हुई हैं, वे सामान्य राजनीतिक उतार-चढ़ाव नहीं हैं। यह एक गहरे संस्थागत संकट का संकेत हैं। नेताओं का लगातार पार्टी छोड़ना, राज्य इकाइयों में गुटबाजी, और केंद्रीय नेतृत्व से बढ़ती दूरी ये सब मिलकर उस तस्वीर को उकेरते हैं जिसमें कांग्रेस एक राजनीतिक दल कम और संघर्षरत ढांचा ज्यादा दिखाई देती है। असम से पूर्व सांसद का भाजपा में जाना हो, या मध्यप्रदेश में दिग्गज नेताओं की नाराजगी ये एकाकी घटनाएं नहीं हैं, यह एक पैटर्न है। एक ऐसा पैटर्न जिसमें पार्टी के भीतर संवाद की जगह संदेह, और संगठन की जगह व्यक्तिवाद हावी होता दिख रहा है। सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि कांग्रेस की समस्या विचारधारा की नहीं है। आज भी पार्टी के पास उदारवादी, लोकतांत्रिक और समावेशी सोच का ढांचा मौजूद है। लेकिन समस्या उस सोच को लागू करने वाले नेतृत्व और संगठनात्मक संरचना में है। हर राज्य में ‘अपना-अपना हाईकमान’ बन चुका है। जहां नेता संगठन से ज्यादा खुद को महत्वपूर्ण मानते हैं। 2014 के बाद का दौर कांग्रेस के लिए राजनीतिक आपदा जैसा रहा है। एक के बाद एक राज्यों में सत्ता का जाना, और उसके साथ ही बड़े नेताओं का पार्टी छोड़ना इसने कांग्रेस की रीढ़ को कमजोर कर दिया है। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि सैकड़ों नेता इस दौरान पार्टी छोड़ चुके हैं, जिनमें कई पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं।
यह पलायन सिर्फ संख्या का खेल नहीं है यह मनोबल का संकट है। जब बड़े चेहरे पार्टी छोड़ते हैं, तो कार्यकर्ताओं का भरोसा भी डगमगाता है। और जब कार्यकर्ता कमजोर होता है, तो संगठन अपने आप ढहने लगता है। राहुल गांधी इस पूरे परिदृश्य के केंद्र में हैं। एक ऐसे नेता के रूप में जो समझौता नहीं करते, जो अपनी विचारधारा पर अडिग रहते हैं। लेकिन राजनीति सिर्फ विचारधारा नहीं, बल्कि प्रबंधन और संवाद का खेल भी है। और यही वह क्षेत्र है जहां कांग्रेस लगातार पिछड़ती दिख रही है। दूसरी ओर, भाजपा इस पूरे परिदृश्य की सबसे बड़ी लाभार्थी बनकर उभरी है। कांग्रेस से निकले नेताओं को न सिर्फ जगह मिल रही है, बल्कि सत्ता और पद भी मिल रहे हैं। यह सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि कांग्रेस की कमजोरी का सीधा फायदा है। सबसे बड़ा सवाल यही है क्या कांग्रेस टूट रही है, या यह एक संक्रमण काल है। क्या यह बिखराव अंत की शुरुआत है, या नए रूप में उभरने की प्रक्रिया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है अगर विपक्ष ही कमजोर हो जाए, तो लोकतंत्र में संतुलन कैसे बचेगा?

कांग्रेस एक पार्टी या बिखरता हुआ ढांचा

कांग्रेस का इतिहास गौरवशाली रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक, इस पार्टी ने हर मोर्चे पर नेतृत्व किया। लेकिन आज की कांग्रेस उस विरासत से कोसों दूर नजर आती है। आज पार्टी के सामने सबसे बड़ा संकट ‘विश्वास’ का है नेताओं का भी और कार्यकर्ताओं का भी। जब एक के बाद एक बड़े चेहरे पार्टी छोड़ते हैं, तो यह सिर्फ राजनीतिक नुकसान नहीं, बल्कि संगठनात्मक विघटन का संकेत होता है।

दलबदल आंकड़ों में छुपी सच्चाई

2014 के बाद से कांग्रेस में दलबदल एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है। लगभग 400 नेताओं का पार्टी छोड़ना, जिनमें कई पूर्व मुख्यमंत्री शामिल है। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए खतरे की घंटी है। यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उस ‘सिस्टम फेलियर’ का प्रमाण हैं जिसमें पार्टी अपने नेताओं को रोक पाने में असफल रही है।

भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी

जहां कांग्रेस कमजोर हुई, वहीं भाजपा मजबूत होती गई। कांग्रेस से निकले नेताओं को भाजपा ने न सिर्फ अपनाया, बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण पद भी दिए। चाहे असम में हिमंता बिस्वा शर्मा का मुख्यमंत्री बनना हो, या ज्योतिरादित्य सिंधिया का केंद्रीय मंत्री बनना ये उदाहरण बताते हैं कि भाजपा ने कांग्रेस की कमजोरी को अवसर में बदल दिया।

राज्य इकाइयों में गुटबाजी

मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, असम कोई भी राज्य इससे अछूता नहीं है। हर जगह नेताओं के बीच टकराव है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और अजय सिंह जैसे नेताओं की नाराज़गी इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर संवाद की कमी है।

‘छोटे हाईकमान’ की समस्या

कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या अब ‘हाईकमान कल्चर’ नहीं, बल्कि ‘मल्टी हाईकमान कल्चर’ बन चुकी है।
हर राज्य में कई ‘पावर सेंटर’ बन गए हैं, जो संगठन को एकजुट रखने के बजाय उसे तोड़ने का काम कर रहे हैं। राहुल गांधी की छवि एक ऐसे नेता की है जो अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। लेकिन राजनीति में लचीलापन भी जरूरी होता है। पुराने दिग्गजों के साथ उनका तालमेल कमजोर दिखता है। यही कारण है कि पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है।

विचारधारा बनाम महत्वाकांक्षा

कांग्रेस के भीतर विचारधारा का संकट नहीं है, बल्कि महत्वाकांक्षा का टकराव है। नेता संगठन से ज्यादा खुद को प्राथमिकता देने लगे हैं। और जब उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं होती, तो वे पार्टी छोड़ देते हैं। कमजोर विपक्ष का सीधा असर लोकतंत्र पर पड़ता है। जब सत्ता के सामने मजबूत चुनौती नहीं होती, तो जवाबदेही भी कमजोर हो जाती है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पहले से ज्यादा मजबूत दिखती है और इसकी एक बड़ी वजह विपक्ष की कमजोरी है।

क्या कांग्रेस खत्म हो रही है?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि कांग्रेस खत्म हो रही है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि पार्टी अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। अगर समय रहते संगठनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है। कांग्रेस आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां से या तो वह खुद को फिर से गढ़ सकती है, या इतिहास का हिस्सा बन सकती है। राजनीति में खाली जगह कभी नहीं रहती। अगर कांग्रेस कमजोर होती है, तो कोई और ताकत उस जगह को भर देगी और फिलहाल वह ताकत भाजपा है। सवाल सिर्फ कांग्रेस का नहीं है…सवाल भारत के लोकतंत्र का है।

* 2014 के बाद कांग्रेस में बड़े पैमाने पर दलबदल
* भाजपा ने कांग्रेस नेताओं को अवसर देकर खुद को मजबूत किया
* राज्य इकाइयों में गुटबाजी चरम पर
* राहुल गांधी की नेतृत्व शैली पर सवाल
* संगठनात्मक संवाद की भारी कमी
* कमजोर विपक्ष से मजबूत होती सत्ता
* कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट

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