मोदी के कुकर्मो से देश मे गैस की मारामारी, पीएम साहब आ गयी है आप की विदाई की बारी
अंबानी की वादाखिलाफी के कारण गैस की कमी झेल रहा है भारत

– मोदी बचा रहे अंबानी को, वरना देश में नहीं आती इतनी बड़ी आफत
– आंध्र के तट पर केजी बेसिन में अंबानी ने तलाशे थे गैस के कुएं
– लेकिन एक-तिहाई गैस का किया उत्पादन और भाग गया
– भारत ने रिलायंस पर 30 अरब डॉलर का किया है दावा, लेकिन कोर्ट जाएगा अंबानी
– अब कतर से गैस नहीं मिल रही है तो मोदी सत्ता की अक्ल लगी ठिकाने
– बीते 12 साल से हाथ पर हाथ धरे बैठी है सरकार, अब लोगों की लगी है कतार
नई दिल्ली। ईरान युद्ध के कारण आज अगर भारत का एक बड़ा हिस्सा रसोई गैस का सिलेंडर लिए कतार में खड़ा है तो यह केवल आज की बात नहीं है। अगर आप कहें कि भारत बीते 17 साल से गैस की किल्लत लिए दुनिया के बाजार में कतार लगाए खड़ा है तो हैरानी की बात नहीं होगी। 17 साल पहले भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने आंध्रप्रदेश के तट से कुछ दूर गहरे समंदर में गैस के दो कुएं तलाशे थे। इन्हें केजी-डी 6 ब्लॉक का नाम दिया गया। कहा गया कि इन दो कुओं से भारत में गैस का उत्पादन दोगुना हो जाएगा। लेकिन कंपनी ने अपनी सहायक कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम के साथ मिलकर देश को धोखे में रखा और गैस का उत्पादन नहीं किया। आज भारत को अपनी एलपीजी की जरूरतों का आधा हिस्सा विदेशों से मंगवाना पड़ रहा है। लेकिन हॉर्मूज के बंद होने से भारत में गैस की सप्लाई पर बहुत बुरा असर पड़ा है और लोगों को मजबूरन गैस की कतार में खड़ा होना पड़ा है। फिर भी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार रिलायंस से उसके धोखे का हिसाब मांगने में नाकाम है।

कतर से आता है भारत का एलपीजी
भारत अपनी जरूरत का आधा एलपीजी कतर से मंगवाता है। कतर पर ईरानी मिसाइलों के हमले से गैस का उत्पादन बंद हो गया है। कतर के गैस के कुएं सूख गए हैं। अब कमर को गैस का उत्पादन दोबारा शुरू करने के लिए पांच साल के लंबे वक्त तक इंतजार करना होगा। ऐसे समय में जब भारत के पीएम नरेंद्र मोदी संसद में यह कहते हैं कि भारत के लोगों को कठिन परीक्षा का सामना करना होगा तो वे असल में ऐसा कहकर देशवासियों से अपनी गलती छिपा रहे हैं और उन्हें गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि भारत को इन मुश्किल परिस्थितियों में डालने का काम खुद केंद्र सरकार ने ही किया है। वास्तव में यह नतीजा है कि देश की महारत्न और सार्वजनिक कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का दरकिनार कर गैस आपूर्ति की सारी जिम्मेदारी एक प्राइवेट कंपनी रिलायंस को देने का, जिसकी वादाखिलाफी के बावजूद केंद्र सरकार इस समय कोई कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है। 2014 से पहले भारत अपनी जरूरत का 27 फीसदी गैस खुद पैदा करता था। लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद राजनीतिक फायदे के लिए 100 करोड़ परिवारों को उज्ज्वला योजना से जोड़ तो दिया, लेकिन गैस की घरेलू खपत में इजाफे को देखते हुए घरेलू गैस के उत्पादन पर कोई ध्यान नहीं दिया।
रिलायंस पर बाकी है भारत का 30 बिलियन डॉलर
यह खबर अचूक संघर्ष ने ही सबसे पहले आपको बताई थी और अब एक बार फिर याद दिला रहा है कि भारत सरकार ने मुकेश अंबानी के रिलायंस इंडस्ट्रीज पर इस वादाखिलाफी के एवज में 30 बिलियन डॉलर का दावा ठोक रखा है। यह अलग बात है कि पीएम मोदी के करीबी होने के कारण रिलायंस के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। रिलायंस और उसकी सहायक कंपी ब्रिटिश पेट्रोलियम पर आरोप है कि उसने आंध्रप्रदेश के तट से थोड़ी दूर पर कृष्णा-गोदावरी बेल्ट में समुद्र के नीचे डी1 और डी3 नाम के दो कुएं गैस के खोजे थे, लेकिन उसमें से गैस का पूरा उत्पादन नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल में यह मामला 2016 से चल रहा है। इस पर आखिरी बहस बीते साल नवंबर में पूरी हुई थी और इस पर 2026 में जून तक आखिरी फैसला आ जाने की उम्मीद है। लेकिन फैसला अपने खिलाफ आने के बाद भी रिलायंस और ब्रिटिश पेट्रोलियम का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है, क्योंकि वे इस फैसले को भारत की कोर्ट में चुनौती देकर आराम से बच सकते हैं। साल 2012 को पेट्रोलियम मंत्रालय ने संसद में दिए गए जवाब में यह कहा था कि रिलायंस को गैस के दोनों कुंओं से 10.3 ट्रलियन घनफीट गैस मिलने की उम्मीद है। लेकिन आज तक कोई यह नहीं बता पाया कि इतनी गैस कुछ महीनों के बाद 3.1 ट्रिलियन घन फीट यानी एक-तिहाई से भी कम कैसे रह गई ? असल में सारा झोलझाल यहीं से शुरू हुआ, क्योंकि रिलायंस को इन कुओं में से गैस निकालना ही नहीं था, इसलिए उसने जोड़-तोड़ कर गैस उत्पादन के आंकड़ों को कम बता दिया और तीन गुने से कम गैस का उत्पादन कर भारत की कंपनी ओएनजीसी को कमजोर कर दिया।
केंद्र सरकार ने मामला दबाया
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दावे में यह दलील रखी है कि रिलायंस को कावेरी-गोदावरी बेसिन में गैस के 81 कुएं खोदने थे, लेकिन खोदे गए केवल 31 कुएं। अब भारत सरकार बेकार गए गैस का रिलायंस से मुआवजा मांग रही है, जो कि 30 अरब डॉलर से अधिक का है। इस दावे के बावजूद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपना करीबी होने के कारण रिलायंस के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि इस मामले को गोपनीय बताकर जनता की नजरों से छिपाकर रखा।
रिलायंस ने की यह कलाबाजी
2011 में रिलायंस ने अपनी सहयोगी ब्रिटिश पेट्रोलियम को केजी बेसिन में डी6 और 20 अन्य ब्लॉक में गैस के कुओं का बंटवारा कर अपना 30 फीसदी शेयर उसे दे दिया। सूत्रों का कहना है कि यह कलाबाजी रिलायंस ने अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने के लिए की, क्योंकि ब्रिटिश पेट्रोलियम एक विदेशी कंपनी होने के नाते जवाबदेही से साफ बच सकती है। 7.2 बिलियन डॉलर की यह डील केंद्र सरकार की नजर में थी और अगर वह चाहती तो तत्काल हस्तक्षेप कर डील की शर्तें बदलकर रिलायंस की कुछ जवाबदेही तय कर सकती थी। अगर रिलायंस ने देशहित में डी3 और डी1 नाम के दोनों कुओं से पर्याप्त मात्रा में गैस निकाली होती तो आज भारत को एलपीजी उत्पादन के मामले मं विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
खपत में आई कमी
ईरान युद्ध शुरू होने से पहले भारत में रोजाना 90 हजार टन एलपीजी की खपत थी। इसमें से 85 प्रतिशत यानी कि 76,500 टन गैस घरेलू जरूरतों को पूरा करने में काम आती थी। 15 प्रतिशत यानी 13500 टन गैस की खपत औद्योगिक क्षेत्र में होती थी। अब औद्योगिक मांग का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा आपूर्ति पर रोक लगाकर कम किया गया है। वहीं, घरेलू मांग का 20 प्रतिशत हिस्सा कीमतों में बढ़ोतरी और आपूर्ति में छोटी-मोटी रुकावटों के कारण कम हुआ है। युद्ध के बाद से, भारत में कुल घरेलू मांग अब हर दिन 68,000 टन पर आ गई है।

देर से किया प्रयास
मुंबई स्थित फर्म एम्के ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड ने बताया है कि भारत की एलपीजी की 55 प्रतिशत मांग होर्मुज के रास्ते आयात से पूरी होती है। 40 प्रतिशत मांग घरेलू उत्पादन से और 5 प्रतिशत मांग दूसरे स्रोतों से पूरी होती है। अब जबकि, होर्मुज के रास्ते होने वाली आपूर्ति ठप हो गई है तो घरेलू उत्पादन में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन भारत सरकार ने बहुत देर से घरेलू उत्पादन की ओर ध्यान दिया है। अगर यह प्रयास पहले किया गया होता तो आज भारत में एलपीजी की किल्लत नहीं होती।



