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कामगारों का हमेशा से होता रहा शोषण,फैक्ट्री मालिक करते रहते है मजदूरों का शोषण

सरकार का वेज बोर्ड भी नहीं बदल सकेगा हाल, श्रम के प्राइवेटाइजेशन से कानून के अमल पर उठे सवाल

* नोएडा से लेकर फरीदाबाद और वाराणसी तक सड़क पर उतरे कामगार
* कई स्थानों पर वाहन फूंके, गिरफ्तारियां और पुलिस के डंडे
* एक ही रोना- महंगाई को देखते हुए सैलरी काफी नहीं
* ठेकेदार ने 25 हजार में कराई भर्ती, मिल रहा है 10 से 12 हजार
* नए लेबर कोड में दावे बहुत, लेकिन प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ सरकार भी बेअसर

नोएडा/फरीदाबाद। भारत की राजधानी नई दिल्ली से सटे नोएडा में मदरसन के नाम से एक कंपनी है। दुनिया के 40 देशों में इस कंपनी के ऑफिस हैं।
यह भारत की प्रमुख मल्टीनेशनल कंपनी है, जो वायरिंग हार्नेस, विजन सिस्टम (मिरर), प्लास्टिक मॉड्यूल और अन्य महत्वपूर्ण ऑटो पार्ट्स बनाती है। लेकिन सोमवार से नोएडा में शुरू हुए मजदूरों के आंदोलन में इस कंपनी के मजदूरों ने बरसों से महीने के केवल 10 हजार सैलरी मिलने की शिकायत की।

ऐसी ही शिकायतें नोएडा से लेकर फरीदाबाद तक देश के औद्योगिक हब माने जाने वाले शहरों में मजदूरों ने की है। रोजाना बिना छुट्टी के 12 घंटे काम, वेतनवृद्धि के नाम पर 200 से 500 रुपए और बोनस, ग्रैच्युटी नहीं देने की शिकायतें आईं। मजदूरों का कहना था कि अब जबकि मकान किराए से लेकर गैस का सिलेंडर और आटा-चावल तक सब-कुछ महँगा हो गया है, महीने के 10 हजार में गुजारा करना नामुमकिन है।

योगी सरकार को 12 साल बाद वेज बोर्ड की याद आई

योगी सरकार ने रातों-रात न्यूनतम मजदूरी 21 फीसदी बढ़ाने का ऐलान किया, बल्कि 12 साल बाद वेज बोर्ड के गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी। योगी सरकार ने ऐलान किया है कि अगले महीने यानी मई में प्रदेश में नए वेज बोर्ड का गठन किया जाएगा। यह फैसला नोएडा की फैक्ट्रियों में हुए हालिया विवाद और उसके बाद गठित हाईपावर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। वेज बोर्ड ही न्यूनतम मजदूरी की मूल दरें तय करता है। यूपी सरकार ने श्रमिकों की मजदूरी में एक अप्रैल से 21 फीसदी तक की अंतरिम बढ़ोतरी का फैसला किया है। नोएडा और गाजियाबाद के श्रमिकों की मजदूरी (मूल वेतन और मंहगाई भत्ता सहित) सबसे ज्यादा 21 फीसदी बढ़ाई गई है। अब अंतरिम तौर पर मजदूरी दरें नोएडा और गाजियाबाद में अकुशल श्रमिकों के लिए 13690 रुपये अर्ध कुशल मजदूरों के लिए 15059 रुपये और कुशल श्रमिकों के लिए 16868 रुपये तय की गई हैं। अकुशल श्रमिकों के लिए मासिक वेतन 11313.65 रुपये और दैनिक मजदूरी 435.14 रुपये तय की गई है। अर्धकुशल श्रमिकों के लिए मासिक 12446 रुपये और दैनिक 478.69 रुपये से निर्धारित है।जबकि कुशल श्रमिकों के लिए मासिक 13940.37 रुपये और दैनिक 536.16 रुपये तय किए गए।हालांकि सरकार ने 20 हजार रुपये न्यूनतम वेतन की खबर को भ्रामक बताया है। भारत सरकार ने नए श्रम संहिता के तहत राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन तय करने की कार्यवाही शुरू की है।इसका मकसद सभी राज्यों में श्रमिकों को न्यायसंगत और समान वेतन सुनिश्चित करना है।

आखिर लेब कोड का विरोध क्यों?

अपनी मांगों के समर्थन में नोएडा और ग्रेटर नोएडा की फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर सड़कों पर उतर आए। उन्होंगने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर जमकर तोड़फोड़ की। मजदूर संघों के नेताओं का आरोप है कि श्रम कानूनों का पालन न किए जाने पर मजदूरों की शिकायतें नहीं सुनी जा रही हैं और प्रशासन की ओर से ट्रेड यूनियनों को साइडलाइन कर दिए जाने से वर्कर बिना किसी लीडरशिप के अतिवादी कदम उठा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह लेबर कोड में ट्रेड यूनियनों के खिलाफ प्रावधान किए गए हैं, वे औद्योगिक शांति और देश के विकास के लिए ठीक नहीं हैं। मजदूर संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने पिछले साल 21 नवंबर को लेबर कोड जारी किए थे। अभी जो उल्लंघन हो रहे हैं, लेबर कोड उनको कानूनी रूप दे देंगे। हरियाणा में करीब 10 साल से वेज रिवीजन नहीं हुआ था। वहां इस बारे में बोर्ड ही नहीं बना था। मानेसर में आंदोलन और ट्रेड यूनियनों के दखल के बाद सरकार ने 1 अप्रैल से वेतन बढ़ोतरी लागू करने की बात मानी। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की महासचिव अमरजीत कौर का कहना है कि फैक्ट्री मालिक ट्रेड यूनियन बनने नहीं देते। ऐसे में वर्कर्स से बातचीत का औपचारिक मंच नहीं बन पाता। लेबर कोड में भी यूनियन विरोधी प्रावधान है। इनसे स्थिति और बिगड़ सकती है। यह बात औद्योगिक शांति और विकास के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस तरह लेबर कोड में ट्रेड यूनियनों के खिलाफ प्रावधान किए गए हैं, वे औद्योगिक शांति और देश के विकास के लिए ठीक नहीं हैं।

क्या कहता है नया लेबर कोड

1. न्यू लेबर कोड के तहत हर कर्मचारी को अपॉइंटमेंट लेटर देना कानूनी रूप से जरूरी है। अगर भविष्य में सैलरी या काम से निकालने को लेकर विवाद होता है, तो कर्मचारी के पास यह पक्का सबूत होगा कि वह उस कंपनी का हिस्सा है। ‘समान काम, समान वेतन’ को सख्ती से लागू किया जाएगा, ताकि जेंडर के आधार पर सैलरी में भेदभाव न हो सके।

2. समय पर सैलरी
सैलरी देने की एक तय समय सीमा होगी। कंपनियों को महीने के अंत के बाद एक निश्चित समय सीमा (आमतौर पर 7 दिन) के अंदर वेतन का भुगतान करना होगा। चाहे कर्मचारी फुल-टाइम, अनुबंधित हो या दिहाड़ी मजदूर, सभी को समय पर सैलरी देनी होगी।

3. काम के घंटों का हिसाब
लेबर कोड लागू होने के बाद 10-12 घंटे तक अगर काम करवाया जाता है तो 8 घंटे के निश्चित समय के बाद मजदूर जितने घंटे काम करेगा, उस हिसाब से प्रबंधन को ओवरटाइम देना होगा। ओवरटाइम सामान्य सैलरी से दोगुना होगा। यानी अगर 1 घंटे की सैलरी 100 रुपये है, तो एक्स्ट्रा घंटे के 200 रुपये मिलेंगे। न्यू लेबर कोड में अधिकतम काम के घंटे (राज्यों के नियमों के अनुसार आमतौर पर 8 से 12 घंटे के बीच) निर्धारित किए गए हैं। हफ्ते में एक दिन की छुट्टी भी मिलेगी।

4. मुफ्त इलाज और पीएफ की सुविधा
अब छोटे कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों को भी कर्मचारी भविष्य बीमा और भविष्य निधि जैसी सामाजिक सुरक्षा मिलेगी। बीमारी की स्थिति में या रिटायरमेंट के समय यह मजदूर के लिए एक बड़ा आर्थिक सहारा होगा।

5. महिलाओं के लिए बराबरी
महिलाएं अपनी मर्जी से नाइट शिफ्ट में काम कर सकेंगी, लेकिन कंपनी की जिम्मेदारी होगी कि वह उन्हें घर तक सुरक्षित छोड़ने और दफ्तर में सुरक्षा का पूरा इंतजाम करे। इसके अलावा समान वेतन का प्रावधान है।

मोदी सरकार ने श्रम कानून को बेच दिया

बीते साल नवंबर में लाए गए चारों श्रम कानून केंद्र की पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के श्रम कानूनों का ही विस्तार है। फर्क केवल इतना है कि मोदी सरकार ने भारत के श्रम बाजार को निजी हाथों को बेच दिया। सरकार ने श्रम कानून तो लागू कर दिया और आगे न्यूनतम वेतन भी लागू करेगी, लेकिन इन कानूनों पर अमल अब पूरी तरह से निजी कंपनियों और कारखानों के हाथ में होगा। भारत में श्रम कानून की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि कंपनियां और कारखाने इन्हें पिछले दरवाजे से लागू करते हैं। ग्रेटर नोएडा में एक मजदूर ने कहा कि कंपनी के रजिस्टर में उसका वेतन तो 25 हजार दिखाया गया है कि लेकिन उसे मिलते हैं महीने के केवल 10 हजार रुपए। नए श्रम कानून में नियमित मजदूर का सीटीसी, यानी सैलरी का पूरा पैकेज बनाने का प्रावधान है। इसी के आधार पर उसका पीएफ और ग्रैच्युटी तैयार होता है। यह उसके मूल वेतन का आधा होना ही चाहिए। लेकिन होता यह है कि कंपनियां और कारखाने मजदूरों को अनुबंध या ठेके पर नियुक्त करते हैं। श्रम के इस बाजार में ठेकेदार वही बेहतर होता है, जो मजदूर को तगड़ी तनख्वाह का लालच देकर भर्ती कर ले और फिर उसे मनमानी मजदूरी दे। इस मामले में केंद्र और राज्यों की सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हैं, क्योंकि कानून पर अमल निजी कंपनियों के हवाले है। सरकार इस मामले में श्रम अधिकारी के जरिए कार्रवाई कर सकती है, लेकिन करने से हिचकती है, क्योंकि इससे कंपनी या कारखाने की वित्तीय स्थिति पर विपरीत असर पड़ता है।

लेबर ऑफिस में भ्रष्टाचार की मार

श्रम कानूनों में विभिन्न कंपनियों और कारखानों में जाकर मजदूरी की स्थिति, उनके वेतन और अन्य भत्तों की जांच करने का अधिकार लेबर ऑफिसर को है। लेकिन यहां भ्रष्टाचार आड़े आ जाता है और कुछ ले-देकर कंपनियां छूट जाती हैं। अक्सर मजदूर भी गरीबी और अशिक्षा के कारण हालात से समझौता कर चुपचाप काम करते हैं। इससे काम की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। केंद्र सरकार ने स्किल इंडिया के तहत अकुशल और अर्धकुशल श्रमिकों का कौशल विकास करने के लिए एक योजना शुरू की थी, लेकिन वह भी करप्शन की भेंट चढ़ गई। अब तो ऐसे मजदूरों के लिए न तो सरकारी और न ही निजी स्तर पर कोई कौशल विकास योजना है। नए लेबर कोड में कर्मचारी के बीमार होने पर कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के अस्पतालों का प्रावधान है, लेकिन इन अस्पतालों की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में बीमार होने पर मजदूर को प्राइवेट अस्पताल में दिखाना भी बेहद खर्चीला मामला है। कुछ मिलाकर केंद्र की मोदी सरकार के नए लेबर कोड हाथी के दांत जैसे हैं, जो खाने और दिखाने के अलग-अलग हैं।

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