
* पांच जिलों में कर्फ्यू में ढील, लेकिन इंटरनेट सेवाएं अभी भी बंद
* सादी वर्दी में सुरक्षा बलों के जवानों को देखते ही भीड़ का हमला
* मैतेई और कुकी जो बहुल इलाकों में पुलिस और लोगों की बैरकेटिंग से लोग सहमे
* राज्य सरकार दोनों पक्षों में सुलह कराने और मामला शांत करवाने में नाकाम
* दोनों समुदायों में नहीं रहा भरोसा, इससे राज्य में अमन की उम्मीद कम हो रही है

इंफाल। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में हिंसा को तीन साल से अधिक समय बीतने के बाद भी हालात किस कदर खराब हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विष्णुपुर जिले में मंगलवार 14 अप्रैल को एक अफवाह फैली कि सुरक्षा बलों ने हथियारों और बारूद से भरा एक ट्रक पकड़ा है। जैसे ही पुलिस उस जगह पर पहुंची सैकड़ों लोगों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया।
लोगों के इस गुस्से का कारण विष्णुपुर में ही हिंसा के एक मामले में दो बच्चों की मौत थी। इसके बाद राज्य में दंगे भड़क उठे और कर्फ्यू लगाना पड़ा और हिंसाग्रस्त इलाकों में इंटरनेट सेवाएं बंद करनी पड़ी। यह हालत अभी भी बरकरार है। शुक्रवार 17 अप्रैल को खुरई लामलोंग नाम के एक इलाके में लोगों की मशाल रैली को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। रैली का आयोजन मणिपुर यूनाइटेड क्लब नाम के एक संगठन ने किया था। इसमें महिला कार्यकर्ता बड़ी संख्या में अपने हाथों में मशाल लेकर हिंसा पर विरोध जता रही थीं। उन्होंने रैली में केंद्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ नारेबाजी भी की। रैली के बाद इलाके के सुरक्षा बंदोबस्त इस कदर चाक-चौबंद कर दिए गए हैं कि वह किसी जंग के मोर्चे जैसा लगता है।

कश्मीर के आंतकवादी दौर की याद आई
सुरक्षा बलों के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि मणिपुर के हलात उन्हें कश्मीर के आतंकवाद से ग्रस्त दिनों की याद दिलाते हैं, जब सड़कों पर लोग कम और सेना, अर्धसैन्य बलों और पुलिस के जवाबन अधिक नजर आते थे। अब सड़कों पर जगह-जगह सुरक्षा बलों के बैरिकेड नजर आते हैं और लोगों की आंखों में अविश्वास और गुस्सा ज्यादा दिखता है। सुरुक्षा बल इसी हालात को शांतिपूर्ण स्थिति कहते हैं। उनका कहना है कि जब ये हालात बिगड़ते हैं तो लगता है कि घाटी में गृह युद्ध की स्थिति बन गई है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि हालात विष्णुपुर के उस बम हमले के बाद भड़के, जिसमें दो बच्चों की मौत हो गई थी और उनकी मां घायल हो गईं। इसके बाद मैतेई इलाके सुलग उठे और जगह-जगह हिंसा की घटनाएं होने लगीं। इंफाल के एक स्थानीय निवासी ने बताया कि हालात इस कदर खराब हैं कि न तो लोगों और न ही सुरक्षा बलों को यह समझ आता है कि कौन सा शांतिपूर्ण प्रदर्शन कब हिंसक हो जाए। गुरुवार को लिलोंग से लेकर सिंगजामेई तक लोग जगह-जगह धरने पर बैठे। लेकिन कुछ घंटों में ही उनका शांतिपूर्ण धरना हिंसक प्रदर्शनों में बदल गया। सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी के साथ ही कहीं-कहीं गोलीबारी की भी खबरें हैं।
मैतेई महिलाओं ने सीएम को सौंपा ज्ञापन
हिंसा के बाद मैतेई महिलाओं के जन संगठन मीरा पाइबी ने सीएम युमाम खेमचंद सिंह से मिलकर उन्हें हाल की हिंसा पर चिंता जताते हुए एक ज्ञापन सौंपा। मीरा पाइबी मूल रूप से मैतेई महिलाओं का ही संगठन है, जिसने मशाल रैली निकाली थी और जिस पर सुरक्षा बलों ने आंसू गैस के गोले छोड़े थे। लेकिन ऐसे ज्ञापनों का राज्य की कानून-व्यवस्था पर कोई खास असर नहीं दिखता। मणिपुर के त्रांगलाओबी में भी हिंसक घटनाएं हुई हैं। इन्हें रोकने के राज्य सरकार ज्यादा कुछ नहीं, लेकिन सुबह से शाम तक केवल कर्फ्यू लगा देती है, इंटरनेट बंद कर देती है और सुरक्षा इंतजामों को और कड़ा कर देती है। फिलहाल, मैतेई बहुत इंफाल घाटी के पांच जिलों- इंफाल ईस्ट, वेस्ट, थोउबाल, काकचिंग और विष्णुपुर में सुबह से शाम तक कर्फ्यू में ढील दी गई है। लेकिन इन जिलों में इंटरनेट सेवा अभी भी बंद है। माना जा रहा है कि अगले दो दिन तक ये सेवाएं आगे भी बंद रहेंगी, ताकि अफवाहों के बाजार पर विराम लगाया जा सके।
अफवाहों ने बढ़ाई दरारें
विश्णुपुर एक मैतेई बहुल इलाका है, जबकि चुराचंदपुर एक कुकी जो बहुल इलाका है। 7 अप्रैल को विष्णुपुर में एक बम विस्फोट में दो मैतेई बच्चों की मौत के बाद ही इलाके में अफवाहों का बाजार गर्म है। इस घटना की जांच एनआईए को सौंपी गई है। पुलिस और सुरक्षा बलों ने इस मामले में तीन कुकी जो समुदाय के लोगों को पकड़कर उनसे पूछताछ की जा रही है। लेकिन अफवाहों के कारण राज्य ें सुरक्षा बलोंपर लगातार हमले हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिस जगह पर बम फटा, उसके नजदीक ही सीआरपीएफ का कैंप है। भीड़ ने कैंप से हथियार लूटने की कोशिश की। जवाब में सीआरपीएफ की फायरिंग में तीन लोगों की मौत हो गई। इस घटना के बाद से इस कदर अफवाहें उड़ीं कि सुरक्षा बलों पर लगातार हमले हुए। चुराचंदपुर जाने वाले हाईवे के दोनों ओर नागरिकों, खासकर मीरा पाइबिस और सुरक्षा बलों ने नाकाबंदी कर रखी है। लोगों ने हथियारों के साथ जगह-जगह चेकपोस्ट बना रखे हैं। वे वाहनों को रोकते हैं और शक होने पर उन्हें आग लगा देते हैं। अकेले चुराचंदपुर के बॉर्डर तोरबंग में 8 ऐसे चेकपोस्ट हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि चुराचंदपुर जाने वाली रैपिड एक्शन फोर्स और असम राइफल्स की गाड़ियों को भी रोका जाता है। ऐसे में अगर आप सुरक्षा बलों से पूछें कि इलाके में हो क्या रहा है तो आपको जवाब नहीं मिलेगा। सुरक्षा बलों को मीडिया से बात करने की मनाही है। पड़ोसी म्यांमार से लोग बेधड़क घुस आते हैं। उनके पास हथियार होते हैं, वॉकी-टॉकी होते हैं और मैतेई चेकपोस्ट पर उन्हें रोका नहीं जाता। पूरे इलाके में घूमकर रिपोर्टिंग करने वाले एक तमिल पत्रकार ने बताया कि भीड़ ने एक सफेद कार में बैठे व्यक्ति को जमकर पीटा। कार में सवार बाकी लोग किसी तरह भागने में सफल रहे। बाद में पता चला कि सफेद रंग की कार सुरक्षा बलों की थी, लेकिन व्यक्ति के वर्दी में न होने के कारण भीड़ ने केवल संदेह के आधार पर उसे पीट दिया। पत्रकार को बाद में पता चला कि वह व्यक्ति असम राइफल्स का था, जिसे बाद में पुलिस ने रेस्क्यू किया।
हर कुकी जो पर शक
मैतेई लोगों का मानना है कि सुरक्षा बलों से मिलीभगत के कारण इलाके में कुकी-जो समुदाय के लोग आराम से घूमते हैं। सुरक्षा बल उन्हें रोकते नहीं है और इसी के कारण वे वारदात कर भाग निकलते हैं। मणिपुर में लोगों का कहना है कि राज्य में रोज जगह-जगह रैलियां होती हैं। भीड़ जुटती है। सुरक्षा बलों से झड़प होती है। जवानों को भीड़ द्वारा पीटा जाता है और आखिर में पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स आकर मोर्चा संभालती है। सुरक्षा बलों का दावा है कि इन सबके लिए अफवाहें जिम्मेदार हैं। लेकिन राज्य सरकार की ओर से मामले को शांत कराने या दोनों पक्षों में सुलह की कोई कोशिश नहीं होती। मणिपुर के लोगों को अब ऐसे हालात की आदत पड़ने लगी है।



