
- 44 में से दर्जन भर प्लांट खराब, मल-मूत्र वाला पानी सीधे नदी में
- केंद्र सरकार के भेजे 1000 करोड़ रुपए भी नेताओं-अफसरों की जेब में गए
- सीएजी की रिपोर्ट में मिलीं गंभीर खामियां, सरकार का दावा- ऑल इज वेल
- यही प्रदूषित पानी आता है वाराणसी और प्रयागराज
- 1985 से चल रहा है गंगा की सफाई का काम, पर नदी आज भी मैली है

देहरादून। भारत में यह कोई नई बात तो नहीं है, लेकिन पहली बार भारत के महालेखाकार नियंत्रक यानी सीएजी ने सरकार को नदियों में प्रदूषित सीवेज बहाने को लेकर आईना दिखाया है, इसलिए इस रिपोर्ट के सामने आने के उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक में अफसरों के कान खड़े हो गए हैं।
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उत्तराखंड में एक-तिहाई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का गंदा, दूषित पानी गंगा और उसकी सहायक नदियों में बेधड़क बहाया जा रहा है। यह काम राज्य के देवप्रयाग से लेकर हरिद्वार तक लगातार जारी है और इस बात की कोई सुध लेने वाला भी नहीं है।

44 में से 12 सीवेज प्लांट का पानी गंगा में
सीएजी की रिपोर्ट में साफ है कि राज्य के 44 में से 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का गंदा प्रदूषित पानी बिना उपचार के सीधे गंगा और उसकी सहायक नदियों में बहाया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि सरकार के पास बिना उपचारित गंदे पानी को स्टोर करने की जगह नहीं है। कनेक्शन दोषपूर्ण हैं और उनका रखरखाव पर्यापत नहीं है। यह अलग बात है कि गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त और साफ करने का काम 1985 से चल रहा है, लेकिन वाराणसी जैसी मैदानी शहरों में तो छोड़िए, उत्तराखंड जैसे उस राज्य में भी गंगा मैली है, जहां से गंगोत्री ही निकलती है। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा को साफप करने के राज्य सरकार के मिशन में 13 साल के लंब अंतराल के बाद भी राज्य स्तर पर रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान ही नहीं बनाया गया। जिला स्तर पर भी इस तरह का कोई प्लान नहीं बनने की वजह से गंगा नदी को साफ करने की बड़ी योजनाओं को लागू कर पाना बहुत मुश्किल है।
नमामि गंगे में स्थानीय लोगों का योगदान नहीं
सीएमजी ने अपने ऑडिट में कहा है कि राज्य सरकार की गंगा कमेटी, एसएमसीजी और अन्य एजेंसियों ने नमामि गंगे प्लान के तहत ढांचागत विकास योजना बनाने में स्थानीय लोगों की मदद ही नहीं ली। रिपोर्ट में एक सोशल ऑडिट का जिक्र करते हुए कहा गया है कि योजना के तहत जो ढांचागत काम किया गया है, उससे स्थानीय लोग खुश नहीं हैं, क्योंकि वह उनकी जरूरतों को पूरा नहीं करता। उत्तराखंड में गंगा नदी के किनारे 16 शहर बसे हैं, लेकिन किसी भी शहर में राज्य सरकार ने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का ढांचा स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर नहीं बनाया। सरकार ने समूचे प्रोजेक्ट्स को केंद्रीय सहायता और योजनाके हवाले छोड़ दिया।
ढाल पर बना दिए ट्रीटमेंट प्लांट
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में उन 17 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का उल्लेख किया है, जिन्हें पहाड़ की ढाल पर बना दिया गया। अब ये प्लांट बहुत ही असुरक्षित हैं। ऐसा ही करीब 90 लाख रुपए की लागत से बना सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भूस्खलन की चपेट में आकर ढह चुका है। रिपोर्ट में सीवेज ट्रीटमेंट के दौरान जमा होने वाले कीचड़ को लेकर भी चिंता जताई है। हरिद्वार में 3 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट 64 हजार घन मीटर का कीचड़ पैदा करता है, जिसमें से 51 हजार घन मीटर ही किसानों को बांटा गया है। रिपोर्ट कहती है कि बाकी बचे कीचड़ में जिंक और कैडमियम जैसे खतरनाक पदार्थ हैं और इनकी मात्रा भी निर्धारित मात्रा से अधिक है। फिर भी इन्हें किसानों को बांट दिया गया। सीएजी ने इस बात पर सख्त आपत्ति जताई है कि ठेकेदार को पूरा पेमेंट करने के बाद भी इस खतरनाक कीचड़ के उपचार का प्लांट अभी तक तैयार नहीं हो पाया है।
40 साल से चल रहा है गंगा का सफाई अभियान
सीएजी ने 40 साल पहले गंगा एक्शन प्लान के नाम से उत्तरप्रदेश, बिहार और बंगाल में शुरू किए गए प्रोजेक्ट का हवाला दिया है, जिसमें एक लाख की आबादी से अधिक 25 श्रेणी 1 के शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाकार गंगा नदी को प्रदूषण रहित करने की बात कही गई थी। प्रोजेक्ट के 1993 में दूसरे हिस्से में यमुना, दामोदर और गोमती नदी को भी शामिल किया गया। लेकिन प्लानिंग की कमी और सरकारों की इच्छाशक्ति के अभाव में कोई भी योजना साकार नहीं हो सकी और गंगा मैली ही रही। सीएजी की वर्तमान रिपोर्ट 2018 स 2023 तक की है, जिसे उत्तराखंड की विधानसभा में भी रखा गया है। इसमें कहा गया है कि 1000 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी राज्य सरकार के सीवेज प्रबंधन में मामूली सुधार हुआ है।
लाखों लीटर मल-मूत्र सीधे गंगा में
सीएजी ने अपने ऑडिट में पाया है कि 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ने रोजाना लाखों लीटर प्रदूषित मल-मूत्र सीधे गंगा नदी में बहाया जा रहा है। इसका कारण यह है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स में तकनीकी खामियां हैं। उनका रखरखाव पर्याप्त नहीं है और योजनागत कमजोरियां हैं। इसी कारण से 44 में से 18 प्लांट्स का मेंटेनेंस करने वाली एजेंसी ने भी अपने हाथ खींच लिए, क्योंकि उनमें निर्माण संबंधी भारी त्रुटियां हैं। एनजीटी ने ऐसे प्लांट के मेंटेनेंस के मापक निर्धारित किए हैं, लेकिन 44 में से केवल 5 प्लांट ही इन मापकों के अनुसार बने हैं। बाद में 2023 में ही दो और प्लांट इन मापकों पर खरे नहीं उतरे।
सरकार का दावा- निर्मल हुई गंगा
उत्तराखंड में अगले साल हरिद्वार में होने वाले अर्द्धकुंभ से पहले गंगा नदी की स्वच्छता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत 37 परियोजनाएं पूरी होने से गंगा अब ‘अप्रदूषित’ श्रेणी में आ गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में गंगा अब अप्रदूषित श्रेणी में शामिल हो गई है। नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत 37 परियोजनाएं पूर्ण होने के साथ ही सीवेज शोधन क्षमता में 10 गुना तक की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2014 से पहले यह क्षमता महज 18 एमएलडी थी, जो अब 200 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) तक पहुंच गई है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के डीडीजी नलिन कुमार श्रीवास्तव के अनुसार उत्तराखंड में नमामि गंगे के अंतर्गत अब तक 37 परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं। इसके फलस्वरूप 200 एमएलडी क्षमता वाले 50 सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) स्थापित हुए हैं। इसने गंगा में बिना उपचारित अपशिष्ट जल के प्रवाह को रोकने में अहम भूमिका निभाई है। एसटीपी की रियल टाइम निगरानी को ‘गंगा पल्स पोर्टल’ जैसा डिजिटल नवाचार भी किया गया है। यह पोर्टल जवाबदेही भी तय करता है। इसके अलावा गंगा में गिरने वाले 170 में से 155 नालों को टैप कर किया जा चुका है, जबकि शेष की टैपिंग को कार्य चल रहा है।



