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दिल्ली में दिहाड़ी मजदूर हो रहे आत्महत्या के शिकार, हत्यारी बनी हुई है मोदी सरकार

10 साल में जितनी आबादी बढ़ी, उससे ज्यादा आत्महत्याएं दिहाड़ी मजदूरों की; एनसीआरबी के आंकड़ों ने बताया- जान से ज्यादा आस मरने की

– 3 गुना बढ़ी दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्या, देश में कुल आत्महत्याओं का 31%
– देश में मजदूरों की हर पांचवीं आत्महत्या तमिलनाडु में
– आत्महत्या करने वाले 63% लोगों की सालाना आय 1 लाख रुपए
– भारत में अभी भी रोजाना 28 किसानों की आत्महत्या
– घरेलू झगड़े और बीमारी बने आत्महत्याओं के सबसे बड़े कारण

नई दिल्ली। भारत में दिहाड़ी मजदूरों की कोई बात नहीं करना चाहता। एक तरह से लगता है कि देश के लिए वे मर चुके हैं। कोविड लॉकडाउन के दौरान अपने राज्य से बाहर काम करने वाले प्रवासी दिहाड़ी मजदूरों के लौटने का किसी ने ध्यान नहीं रखा। घिसटते-पैदल चलते ढेरों मजदूर मारे गए, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कह दिया कि कोविड महामारी में किसी प्रवासी मजदूर की मौत नहीं हुई है।

अब एनसीआरबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 से देश में आबादी के बढ़ने की रफ्तार भले ही केवल 13 फीसदी रही हो, लेकिन दिहाड़ी मजदूरों की खुदकुशी की दर तीन गुना ज्यादा रही। यानी आबादी बढ़ने की तिगुनी रफ्तार से देश में मजदूरों की आत्महत्याएं हो रही हैं।

10 साल में सबसे ज्यादा तिगुनी मौतें

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में देश में आत्महत्या करने वालों में सबसे बड़ा वर्ग दिहाड़ी मजदूरों का रहा। कुल आत्महत्या मामलों में इनकी हिस्सेदारी 31% दर्ज की गई, जो पिछले दस वर्षों (2015-2024) में सबसे ज्यादा है। साल 2024 में 52000 से ज्यादा दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की। इससे पहले साल 2022 में यह आंकड़ा कुल आत्महत्याओं का 26.4% था। देश में कुल आत्महत्या मामलों की संख्या भी बढ़ गई है। आत्महत्या करने वाले राज्यों में तमिलनाडु सबसे आगे है। यहां आत्महत्या करने वालों की संख्या देश के कुल मामलों का लगभग पांचवां हिस्सा है। साल 2024 में कुल 52,910 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की। यह साल 2022 के 26.4% के पिछले रिकॉर्ड से कहीं अधिक है। भारत में आत्महत्या के कुल मामले बढ़कर 1.7 लाख पहुंच गए हैं, जो 2015 में 1.34 लाख थे। आत्महत्या करने वाले लगभग 62.9% लोग (करीब 1.1 लाख) ऐसे थे जिनकी वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम थी।

आत्महत्या के मामलों में दिल्ली टॉप पर
एनसीआरबी के 2024 के आंकड़ों ने देश की राजधानी दिल्ली की एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में साल 2024 के दौरान आत्महत्या के 2,905 मामले दर्ज किए गए, जो भारत के 53 प्रमुख शहरों में सबसे अधिक है। इस सूची में बेंगलुरु 2,403 मामलों के साथ दूसरे और मुंबई 1,406 मामलों के साथ तीसरे स्थान पर है। हालांकि आत्महत्या के कुल मामलों में दिल्ली सबसे टॉप पर है, लेकिन प्रति लाख आबादी पर आत्महत्या दर के मामले में बेंगलुरु आगे निकल गया है। आंकड़ों की माने तो, बेंगलुरु में प्रति लाख व्यक्ति पर 16.7 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए, जबकि दिल्ली में यह दर 13.2 और मुंबई में 11 रही।

महंगाई, कर्ज और गरीबी प्रमुख कारण

पिछले कुछ सर्वे रिपोर्टों में पाया गया है देश में विकास के नाम पर पलायन की शब्दावली दरअसल एक छलावा है। अपने गांव, समाज, परिवार और रिश्तेदारों के संरक्षण से अलग बाहरी राज्यों में मजदूरी करने जाना और वहां गरिमामय जीवन जी पाना काफी मुश्किल काम होता है। गांव से मजदूरों को उनके ठेकेदार मोटी पेशगी देकर बुक कर लेते हैं। किसी तरह ट्रेन या बस में बैठकर वे इस सपने के साथ शहर आते हैं कि वहां मिलने वाली ज्यादा मजदूरी से कुछ पैसे बचाकर वे अपने गांव में परिवार को भी भेज सकेंगे। लेकिन वह पेशगी असल में कर्ज होती है, जिसे चुकाते वे अपना जीवन काट देते हैं। वहीं, शहरों की महंगाई से न्यूनतम मजदूरी की दर पूरी नहीं पड़ती। लिहाजा वे अपने मालिक से कुछ कर्ज भी लेते हैं, जिनका असल और सूद चुकाने के एवज में उन्हें बंधुवा मजदूरी भी करनी पड़ती है। बीते दिनों रसाई गैस की किल्लत के बाद गुजरात के विभिन्न हिस्सों से मजदूरों का पलायन पूरे देश ने देखा है। इन मजदूरों ने खुद को महंगे गैस और फैक्ट्री बंद होने की आशंका के चलते गुजारे की समस्या से निजात पाने के लिए अपने घर का रुख किया था। लेकिन सभी घर वापस नहीं जा पाते। कर्ज और महंगाई के कारण परिवार का पेट पालने में नाकाम मजदूरों के सामने आत्महत्या के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। ऐसे में परिवार में स्वयं को या किसी अन्य सदस्य को बीमारी पूरे परिवार की आर्थिक ताकत को तोड़कर रख देती है। एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक पिछले एक दशक में आत्महत्या करने वालों में दिहाड़ी मजदूर, गृहिणियां और स्वरोजगार से जुड़े लोग सबसे बड़े वर्ग बने हुए हैं। हालांकि गृहिणियों और स्वरोजगार वालों की हिस्सेदारी में कुछ गिरावट दर्ज की गई है। खेती और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की आत्महत्या की हिस्सेदारी साल 2016 के 8.7% से घटकर साल 2024 में 6.2% रह गई। एनसीआरबी ने खेती से जुड़े आत्महत्या आंकड़ों को पहली बार साल 2016 में अलग श्रेणी के रूप में शामिल किया था। खेती से जुड़े 10,546 लोगों में आत्महत्या करने वालों में 5,913 कृषि मजदूर थे। यानी कुल मामलों में उनकी हिस्सेदारी 56 प्रतिशत रही, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा है।

रोजाना 28 किसानों की खुदकुशी

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। यह देश में कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत है। यह संख्या 2023 की तुलना में थोड़ी कम है, जब 10,786 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी। फिर भी देश में प्रतिदिन लगभग 28 किसान और कृषि मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं। वर्ष 2022 में कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक 11,290 दर्ज की गई थी और उसके बाद से इसमें लगातार कमी आई है। लेकिन पिछले पांच वर्षों के रुझान बताते हैं कि जमीनी हालात में बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ है। भारत में अब भी लगभग हर घंटे एक किसान आत्महत्या कर रहा है। एनसीआरबी आंकड़ों में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। खेती-किसानी से जुड़े 10,546 व्यक्तियों में से, आत्महत्या करने वालों में कम से कम 56 प्रतिशत (5,913) खेतिहर मजदूर थे, जो पिछले पांच वर्षों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। साल 2020 में, कृषि क्षेत्र में होने वाली कुल आत्महत्याओं में इनकी हिस्सेदारी 47.75 प्रतिशत थी। कृषि मजदूरों में आत्महत्या की हिस्सेदारी पहली बार 2021 में बढ़ी थी और उसके बाद से इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्षों से औसत कृषि परिवार की आय में खेती से होने वाली मजदूरी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जबकि फसल उत्पादन से आय अपेक्षाकृत कम हो रही है।

आत्महत्याओं में तमिलनाडु सबसे ऊपर
दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्या के मामले में कुछ राज्यों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली 343 मौतों के साथ सबसे आगे रहा।
तमिलनाडु: 10556 मौतें
महाराष्ट्र: 6811 मौतें
तेलंगाना: 5745 मौतें
मध्य प्रदेश: 5299 मौतें
छत्तीसगढ़: 3413 मौतें

आत्महत्या के मुख्य कारण और तरीके

एनसीआरबी की रिपोर्ट केवल आर्थिक तंगी ही नहीं, बल्कि सामाजिक कारणों पर भी रोशनी डालती है। 35% मामलों के साथ पारिवारिक समस्याएं सबसे बड़ा कारण रहीं। इसके बाद बीमारी (17.9%) का स्थान रहा। वहीं सबसे अधिक मौतें फांसी (62.3%) के कारण हुईं। इसके बाद जहर का सेवन (24.5%), डूबना (4.4%) और चलती ट्रेनों या वाहनों के नीचे आना (2.5%) रहा।

छात्रों में बढ़ता मानसिक दबाव
रिपोर्ट में छात्रों की आत्महत्या के आंकड़े भी बेहद चिंताजनक हैं। 2015 से 2024 के बीच छात्र आत्महत्या के मामलों में 62.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। पिछले दस वर्षों में कुल 1,15,850 छात्रों ने आत्महत्या की। कुल आत्महत्या के मामलों में छात्रों की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ रही है। 2015 में यह 6.7 प्रतिशत थी, जो 2024 में बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गई।
2015 में छात्र आत्महत्या: 8,934
2020 में: 12,526
2024 में: 14,488

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