अनिल अंबानी ने देश के न्यूक्लियर सिस्टम का किया सत्यानाश,मोदी का मिल रहा साथ
अंबानी के सर्वर से लीक हुईं भारत के सबसे बड़े कुडनकुलम न्यूक्लियर रिएक्टर की 19 हजार फाइलें,

मजबूर सरकार का जवाब- ऑल इज वेल, रिलायंस ने गलती मानी
नई दिल्ली। तमिलनाडु में भारत के सबसे बड़े कुडनकुलम परमाणु संयंत्र में विगत सप्ताह सायबर हमला हुआ। यह हमला संयंत्र के लिए ठेके पर काम करने वाले अंबानी के रिलायंस समूह के सर्वर में हुआ। हैकर्स का दावा है कि उन्होंने हमले में 19 हजार फाइलें बरामद की हैं, जिसमें न्यूक्लियर रिएक्टर से जुड़ी और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित बेहद अहम जानकारियां हैं।
लेकिन मामले की जांच कर कर रही ‘न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का दावा है कि हैकर्स इस रिएक्टर के कोर यानी भीतर तक नहीं घुस पाए, इसलिए सब सुरक्षित है। यानी अंबानी का नाम आते ही इतने बड़े मुद्दे पर मोदी सरकार ने लुकाछिपी का खेल शुरू कर दिया है। उधर, रिलायंस ने रॉयटर्स को भेजे अपने बयान में कहा कि एक सर्वर पर उनके डाटा में “आंशिक सेंधमारी” हुई है और इसकी जानकारी भारत सरकार को दे दी गई है। रिलायंस ने यह नहीं बताया है कि कौनसा डाटा लीक हुआ है। डार्क वेब पर मौजूद डेटा में बैठकों और जांचों से जुड़ी जानकारी भी शामिल है। अनिल अंबानी का रिलायंस समूह, इस संयंत्र के अनुबंधकों में शामिल है। विशेषज्ञों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर साइबर खतरा बताया है, जबकि मामले की जांच सर्ट-इन और न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया कर रहे हैं।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, रैनसमवेयर समूह वर्ल्ड लीक्स ने डार्क वेब पर बड़ी संख्या में इस संयंत्र से जुड़ी फाइलें जारी की हैं, जिसमें इसके कुछ हिस्सों के कथित ब्लूप्रिंट और आपूर्तिकर्ताओं की जानकारी शामिल है। यह जानकारी रिलायंस समूह के सर्वर से मिलने का दावा किया गया है। लेकिन सरकार का दावा है कि रिएक्टर और उसके अहम सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित हैं।

डेटा हैकर्स के हाथ कैसे लगा?
‘रैनसमवेयर ग्रुप’ नाम के हैकर्स ने कुडनकुलम प्लांट में ठेके पर काम करने वाले ‘रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर’ के सर्वर में सेंध पहले तो सेंध लगाई। हैकर्स का दावा है कि उन्हें प्लांट के ब्लूप्रिंट, तकनीकी दस्तावेज, निरीक्षण रिकॉर्ड और दूसरी संवेदनशील फाइलें हाथ लगी हैं। अब सवाल उठता है कि ये डेटा बाहर कैसे पहुंचा? दरअसल, हैकर्स आम तौर पर उन सप्लायर्स, वेंडर्स और ठेकेदारों को निशाना बनाते हैं, जो कमजोर कड़ी साबित होते हैं। यानी इस बार भी सवाल सिर्फ हैकिंग का नहीं, बल्कि पूरे सप्लाई चेन की साइबर सुरक्षा का है। हैकिंग होने के बाद भी सरकार इसी अहम सवाल को अनदेखा कर रही है। मान लीजिए किसी ठेकेदार के सर्वर पर प्लांट का ब्लूप्रिंट रखा है, लेकिन उसका सिक्योरिटी सिस्टम अपडेट नहीं है, या किसी कर्मचारी ने गलती से फिशिंग ईमेल पर क्लिक कर दिया। वहीं से हैकर्स को अंदर घुसने का रास्ता मिल जाता है। अगर ऐसे दस्तावेज वाकई डार्क वेब तक पहुंच गए हैं, तो वे सिर्फ फाइलें नहीं रह जाते, बल्कि किसी दुश्मन देश या आतंकी संगठन के लिए प्लांट की कमजोरियों का नक्शा भी बन सकते हैं। इसलिए इस पूरे मामले को सिर्फ डेटा चोरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
कुडनकुलम को गंभीर खतरे की चेतावनी
ये दस्तावेज करीब 8.58 लाख फाइलों के उस बड़े डेटा सेट का हिस्सा हैं, जिसे कथित तौर पर परियोजना से जुड़े ठेकेदार रिलायंस ग्रुप से चुराया गया। रिलायंस ग्रुप ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बातचीत में तीसरे पक्ष के डेटा सेंटर प्रोवाइडर ‘योटा’ के सर्वर पर ‘आंशिक डेटा उल्लंघन’ की पुष्टि की। ये फाइलें 2016 से लेकर 2025 के बीच की हैं। इनमें वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम के इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट, कॉमन कंट्रोल रूम के फ्लोर लेआउट, उपकरणों की निरीक्षण रिपोर्ट, सप्लायर सूची, वेंडर प्रस्ताव, बैठकों के रिकॉर्ड और बीमा से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं। अधिकांश दस्तावेज कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की यूनिट-3 और यूनिट-4 से संबंधित हैं, जिनका निर्माण कार्य जारी है और जिनके 2027 तक चालू होने की उम्मीद है। लीक हुईं फाइलों में परमाणु रिएक्टर के कोर सिस्टम की डिजाइन शामिल नहीं दिखती, क्योंकि वे रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम उपलब्ध करा रही है। इन दस्तावेजों से यह जानकारी मिल सकती है कि परियोजना तक किसकी पहुंच है और वह पहुंच किन-किन सिस्टम तक जाती है, जिससे किसी संभावित हमलावर को रणनीतिक फायदा मिल सकता है। परमाणु सुरक्षा पर काम करने वाले संगठन न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव के सीनियर डायरेक्टर निकोलस रोथ ने कहा कि यह डेटा लीक संयंत्र की सुरक्षा के लिए ‘गंभीर जोखिम’ पैदा कर सकता है।


हमारे लिए कितनी बड़ी चेतावनी?
अगर किसी न्यूक्लियर प्लांट से जुड़े ब्लूप्रिंट, तकनीकी दस्तावेज और दूसरे संवेदनशील रिकॉर्ड वाकई साइबर अपराधियों के हाथ लग जाते हैं, तो खतरा सिर्फ डेटा चोरी तक सीमित नहीं रहता। ऐसी जानकारी का इस्तेमाल भविष्य में और बड़े साइबर हमलों की योजना बनाने, सप्लाई चेन को निशाना बनाने या फिर रैनसमवेयर अटैक के जरिए अहम संस्थानों पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। दुनिया भर में न्यूक्लियर सेक्टर पर होने वाले साइबर हमलों को सिर्फ आईटी सिक्योरिटी का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा माना जाता है। कुडनकुलम विवाद की जांच के बाद सच चाहे जो भी सामने आए, लेकिन इस घटना ने एक बात साफ कर दी है कि अब सिर्फ रिएक्टर की सुरक्षा काफी नहीं है। उससे जुड़े हर ठेकेदार, हर सर्वर और हर डिजिटल कड़ी को उतना ही मजबूत बनाना होगा। साइबर की दुनिया में कई बार दुश्मन किले का दरवाजा नहीं, उसकी सबसे कमजोर खिड़की तलाशता है।
रिलांयस से कोई सवाल नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, ‘वर्ल्ड लीक्स’ इससे पहले टाटा ग्रुप और नाइकी जैसी कंपनियों को भी निशाना बना चुका है। हालांकि इस ताजा मामले पर समूह की ओर से किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया गया। डेटा सेंटर सेवा प्रोवाइडर योटा ने बताया कि उसने 29 मई को एक सर्वर पर संदिग्ध गतिविधि का पता लगाया था और संभावित रैनसमवेयर हमले को निष्प्रभावी कर दिया था। हालांकि बाद में रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने उसे डेटा लीक के दावे की जानकारी दी। इस मामले पर परमाणु ऊर्जा विभाग और प्रधानमंत्री कार्यालय ने सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है।
साइबर अटैक का पता ही नहीं
साइबर सुरक्षा कंपनी सर्फशार्क के अनुसार, पिछले वर्ष भारत में 2.89 करोड़ (28.9 मिलियन) अकाउंट डेटा उल्लंघन का शिकार हुए, जिससे भारत दुनिया के सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल रहा। वहीं एक हालिया इंडस्ट्री सर्वे में पाया गया कि 73% भारतीय संगठन यह तक नहीं जानते कि उन पर कभी साइबर हमला हुआ या नहीं, जबकि 57% संस्थानों में बुनियादी साइबर हाइजीन प्रणालियों का अभाव है।




