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आस्था पर पहरा या धर्म की ठेकेदारी? नवरात्र से पहले ही छिड़ा थाली और त्योहार से संग्राम की तैयारी

धर्म के नाम पर किसकी चलेगी लाठी, जब हिन्दुस्तान की संस्कृति ही विविधता पर टिकी?

  • आस्था पर पहरा या धर्म की ठेकेदारी? नवरात्र से पहले ही छिड़ा थाली और त्योहार से संग्राम
    की तैयारी
  • धर्म के नाम पर किसकी चलेगी लाठी, जब हिन्दुस्तान की संस्कृति ही विविधता पर टिकी?
  • दुर्गापूजा में मांस पर नसीहत से गरबा में पहचान की जांच तक, अपने ही बिछाए जाल में घिरती भाजपा
  • बंगाल की थाली पर नजर, महाराष्ट्र के गरबा पर पहरा क्या यही है ‘विविधता में एकता’ का नया मॉडल
  • धीरेन्द्र शास्त्री की अपील पर भाजपा में ही उठे सवाल, सामिक भट्टाचार्य व तथागत रॉय ने दिखाया आईना
  • नितेश राणे के बयान पर आठवले का विरोध, अमृता फड़नवीस भी बोलीं बिना खलल आने वालों को रोकना गलत
  • जब अपने ही सवालों के घेरे में खड़े हुए धर्म के स्वयंभू पहरेदार, तो आम आदमी के डर की कल्पना कीजिए

शारदीय नवरात्र अभी दस्तक भी नहीं दे पाया है, लेकिन उससे पहले ही देश के अलग-अलग हिस्सों में आस्था के नाम पर ऐसी बयानबाजी शुरू हो गई है, जिसने त्योहार की उमंग पर सवालों और तनाव की परछाईं डाल दी है। जिस भारत की पहचान इस बात से रही है कि यहां एक ही देवी की आराधना अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग रंग, रस्म व परंपरा के साथ होती है, उसी विविधता को अब खान-पान, पहनावे और पूजा-पद्धति के नाम पर कसौटी पर कसने की कोशिश दिखाई दे रही है। क्या आस्था अब निजी विश्वास नहीं, बल्कि कुछ लोगों द्वारा जारी किया जाने वाला आचार-संहिता बन जाएगी।

 

भारत की ताकत एक रंग नहीं, रंगों की है पूरी दुनिया

भारत को समझना है तो उसके त्योहारों को देखना होगा। देवी एक हैं, लेकिन उनकी आराधना के तौर-तरीके अनगिनत हैं। बंगाल में मां दुर्गा का आगमन केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का सबसे बड़ा उत्सव बन जाता है। पंडाल कला, प्रतिमाओं की भव्यता, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारिवारिक मिलन इसके अभिन्न हिस्से हैं। दूसरी तरफ गुजरात में शक्ति की आराधना गरबा के घेरे में दिखाई देती है। महाराष्ट्र में नवरात्र की अपनी परंपराएं हैं तो उत्तर भारत में देवी जागरण, रामलीला और दुर्गा पूजा के अलग-अलग स्वरूप देखने को मिलते हैं। कहीं सात्विक भोजन पर जोर है तो कहीं सदियों पुरानी स्थानीय परंपराओं में अलग तरह के प्रसाद और खान-पान की मान्यताएं मौजूद हैं, यही तो भारत है। इस देश की खूबसूरती यह नहीं कि हर व्यक्ति एक जैसा सोचता, खाता या पूजा करता है। खूबसूरती यह है कि अलग-अलग आस्थाएं और परंपराएं एक ही सामाजिक धरातल पर साथ-साथ सांस लेती हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी एक पद्धति को ‘सही हिन्दू तरीका’ बताकर बाकी परंपराओं को कमतर साबित करने का अभियान शुरू होता है।

दुर्गापूजा से पहले थाली पर बहस क्यों

बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेन्द्र शास्त्री की कोलकाता में की गई अपील ने इसी बहस को जन्म दिया है। उन्होंने दुर्गापूजा के दौरान हिन्दुओं से मांसाहार से बचने की अपील की और यहां तक कहा कि देवी प्रतिमा के आसपास मांस की बिक्री नहीं होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने ऐसे लोगों के बहिष्कार की बात कही जो पूजा के दौरान मांसाहार करते हैं। शाकाहार को बढ़ावा देना किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता हो सकती है। कोई संत अपने अनुयायियों से अपने विश्वास के अनुरूप आचरण की अपील करे, इसमें भी अपने आप में कोई असाधारण बात नहीं। असली सवाल वहां पैदा होता है, जहां व्यक्तिगत धार्मिक आग्रह को पूरे समाज पर लागू करने की कोशिश दिखाई देने लगे।

बंगाल में दुर्गापूजा सदियों से विकसित हुई

बंगाल में दुर्गापूजा सदियों से विकसित हुई जो वहां की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा है। वहां मां दुर्गा केवल मंदिर की प्रतिमा नहीं हैं, बल्कि बंगाली समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। ऐसे में बाहर से आकर यह तय करने की कोशिश कि बंगाली समाज को त्योहार के दौरान क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, स्वाभाविक रूप से असहजता पैदा करेगी। तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता रिजु दत्ता ने इसी बिंदु को उठाते हुए कहा कि बंगाली समाज की धार्मिक परंपराओं और खान-पान का निर्णय कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा बंगालियों की थाली से मछली और मांस हटाने की कोशिश कर रही है। यदि रेस्तरां के खिलाफ कार्रवाई के उनके आरोप सही साबित होते हैं तो मामला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधे सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़ जाएगा।

भाजपा के भीतर से ही आया आईना

दिलचस्प बात यह है कि इस विवाद में भाजपा को विपक्ष से ज्यादा परेशानी अपने ही नेताओं की प्रतिक्रियाओं से होती दिखी। पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने साफ कहा कि किसी धार्मिक व्यक्ति या राजनीतिक दल को बंगाल के लोगों को यह बताने का अधिकार नहीं कि उन्हें क्या खाना या पहनना चाहिए। उनका सवाल है कि क्या बंगाली मछली और मांस नहीं खा सकते पूरे विवाद का मूल प्रश्न बन गया है। भट्टाचार्य ने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि बंगाल की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को एकरूपता की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। उनके अनुसार संत को शाकाहार का प्रचार करने का अधिकार है, लेकिन उसकी निजी राय को पूरे समाज के लिए नियम नहीं बनाया जा सकता। यही बात भाजपा नेता और मेघालय के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय की प्रतिक्रिया में भी सामने आई। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व किसी एक जीवनशैली को सब पर थोपने का नाम नहीं है और हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विशेषताओं में उसकी विविधता शामिल है। उन्होंने अपने नवरात्रि के खान-पान का उदाहरण देते हुए कहा कि मांसाहार करने वाला व्यक्ति हिन्दू नहीं रह जाता, ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। मोदी सरकार के करीबी माने जाने वाले अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने भी बिना नाम लिए सोशल मीडिया पर हिन्दू धार्मिक परंपराओं में मांस की ऐतिहासिक मौजूदगी की ओर ध्यान दिलाया। उनके तर्क ने यह सवाल और बड़ा कर दिया कि यदि हिन्दू परंपराएं स्वयं इतनी विविध हैं तो फिर एक ही खान-पान की व्यवस्था को धार्मिक शुद्धता का पैमाना बनाने की कोशिश क्यों हो रही है।

बंगाल की थाली से महाराष्ट्र के गरबा तक पहुंची राजनीति

मामला केवल दुर्गापूजा तक नहीं रुका। महाराष्ट्र में गरबा और डांडिया आयोजनों में मुस्लिमों के प्रवेश को लेकर विश्व हिन्दू परिषद की ओर से सवाल उठाए गए। इसके समर्थन में महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नितेश राणे भी सामने आए। उन्होंने गरबा में प्रवेश से पहले पहचान सत्यापन की बात कही और यहां तक सुझाव दिया कि प्रवेश चाहने वालों से हनुमान चालीसा का पाठ कराया जा सकता है। तर्क के केंद्र में फिर वही शब्द था ‘लव जिहाद’। सवाल केवल मुस्लिमों के प्रवेश का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी सार्वजनिक सांस्कृतिक आयोजन में किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान उसके प्रवेश का आधार बननी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति कार्यक्रम में उपद्रव करता है, हिंसा करता है या कानून तोड़ता है तो उसे रोकने के लिए कानून मौजूद है। लेकिन केवल धर्म के आधार पर किसी को संदेह की निगाह से देखना किस सामाजिक व्यवस्था की ओर ले जाएगा?
गरबा के घेरे में नृत्य करने वाले व्यक्ति से पहले उसकी पहचान पूछी जाएगी और फिर उसकी आस्था के अनुसार प्रवेश तय होगा। तो यह उत्सव कम और धार्मिक छंटनी की व्यवस्था ज्यादा नजर आएगी।

एनडीए के भीतर से भी असहमति

नितेश राणे के रुख का केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होने का अधिकार है।
आठवले भाजपा के सदस्य नहीं, लेकिन एनडीए का हिस्सा हैं। इसलिए उनका बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह बताता है कि धार्मिक आयोजनों को लेकर कठोर पहचान-राजनीति पर गठबंधन के भीतर भी एक राय नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की प्रतिक्रिया पर भी नजरें टिकती हैं। उनकी पत्नी अमृता फड़नवीस की टिप्पणी से भी इतना संकेत जरूर मिला कि बिना किसी खलल के गरबा में शामिल होने वाले व्यक्ति को केवल उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर रोकना उचित नहीं होना चाहिए।
यानी एक तरफ धार्मिक पहचान के नाम पर प्रवेश की निगरानी की मांग है, दूसरी तरफ उसी राजनीतिक खेमे के भीतर से यह सवाल उठ रहा है कि आखिर त्योहार को त्योहार रहने क्यों नहीं दिया जाता?

उन्माद की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है

धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि एक समय के बाद उसके निशाने पर केवल विरोधी नहीं रहते। उसके बनाए हुए सवाल उसी के खेमे में लौटने लगते हैं। बंगाल में मछली-मांस को लेकर सवाल उठे तो बंगाल की अपनी भाजपा नेतृत्व को सफाई देनी पड़ी। महाराष्ट्र में गरबा को धार्मिक पहचान से जोड़ने की कोशिश हुई तो एनडीए के भीतर से आवाज उठी। यह विरोधाभास बताता है कि भारत का सामाजिक ताना-बाना किसी एक रंग में रंगना इतना आसान नहीं जितना राजनीतिक मंचों से दिखाई देता है।
हिन्दू समाज स्वयं अनेक परंपराओं का विशाल संसार है। काशी की पूजा परंपरा, बंगाल की दुर्गापूजा, गुजरात का गरबा, महाराष्ट्र की नवरात्रि, दक्षिण भारत की देवी आराधना—हर जगह अपनी स्थानीय संस्कृति का रंग घुला हुआ है। इस विविधता को खत्म कर एक ही खान-पान, एक ही पहनावा, एक ही धार्मिक व्यवहार और एक ही सामाजिक आचार को ‘आदर्श’ बनाने की कोशिश अंततः उसी समाज के भीतर टकराव पैदा करेगी जिसके नाम पर यह राजनीति की जाती है।

आज बंगाल की थाली है, कल किसकी बारी?

सबसे गंभीर प्रश्न यही है, आज सवाल बंगाली की थाली का है। कल किसी दूसरे प्रदेश के त्योहार की रस्म पर आपत्ति हो सकती है। आज गरबा में प्रवेश पर पहचान पूछने की बात हो रही है, कल किसी अन्य सांस्कृतिक आयोजन में कौन शामिल होगा, इसका प्रमाणपत्र मांगने की नौबत आ सकती है। फिर वही सवाल सामने आएगा क्या भारत में त्योहार मनाने के लिए भी धार्मिक पात्रता प्रमाणपत्र जरूरी होगा। यदि हिन्दू धर्म की विशाल परंपरा में अलग-अलग मत, पूजा-पद्धति और जीवनशैली के लिए जगह है तो उसे राजनीतिक आदेशों से संकुचित करने की जरूरत क्यों। धर्म को राजनीति का औजार बनाने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि आस्था आदेश से नहीं चलती। श्रद्धा किसी सरकारी अधिसूचना से पैदा नहीं होती और त्योहार किसी राजनीतिक संगठन की अनुमति से नहीं मनाए जाते।

त्योहारों को डर का मैदान मत बनाइए

दुर्गापूजा हो, गरबा हो, ईद हो, क्रिसमस हो, गुरुपर्व हो या कोई अन्य पर्व त्योहारों का मूल स्वभाव लोगों को जोड़ना है, अलग करना नहीं। यदि किसी समुदाय को अपने धार्मिक पर्व के दौरान यह डर सताने लगे कि उसकी थाली पर कोई टिप्पणी करेगा, उसके पहनावे पर कोई सवाल उठाएगा, उसके आयोजन में प्रवेश से पहले उसकी धार्मिक पहचान जांची जाएगी या उसे किसी राजनीतिक कसौटी पर परखा जाएगा, तो उत्सव की आत्मा वहीं मर जाती है। यही वह बिंदु है जहां सवाल केवल हिन्दू-मुस्लिम का नहीं रह जाता। सवाल नागरिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक स्वायत्तता और सामाजिक सह-अस्तित्व का बन जाता है। भाजपा के सामने इसलिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उसके आसपास पैदा हो रही वह राजनीतिक संस्कृति है जो हर त्योहार में दुश्मन तलाशने लगी है। क्योंकि जब धार्मिक उन्माद की आग भड़काई जाती है तो उसका धुआं केवल विपक्ष के घर तक नहीं जाता। अंततः वह अपने ही आंगन को भी धुंधला कर देता है। मां दुर्गा की आराधना किस थाली से होगी, गरबा के घेरे में कौन नाचेगा और किसी त्योहार की खुशी में कौन शामिल होगा। इसका फैसला धर्म के ठेकेदार नहीं, उस समाज की अपनी जीवंत परंपराएं करेंगी। भारत की ताकत इसी स्वायत्तता में है। वरना जिस ‘विविधता में एकता’ को दुनिया भारत की पहचान मानती रही है, वह धीरे-धीरे ‘एकरूपता के दबाव’ में बदल जाएगी। सवाल केवल इतना नहीं होगा कि त्योहार कौन कैसे मनाएगा। सवाल होगा क्या इस देश में त्योहार मनाने की आजादी भी अब राजनीतिक अनुमति की मोहताज होगी।

* बंगाल की दुर्गापूजा और गुजरात का गरबा भारतीय सांस्कृतिक विविधता के दो अलग लेकिन समान रूप से जीवंत रूप हैं।
* बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेन्द्र शास्त्री ने दुर्गापूजा के दौरान मांसाहार से बचने और मांस की बिक्री रोकने की अपील की।
* तृणमूल कांग्रेस ने इसे बंगाली संस्कृति और अस्मिता में बाहरी हस्तक्षेप बताया।
* पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने भी कहा कि किसी को बंगालियों के खान-पान और जीवनशैली पर आदेश देने का अधिकार नहीं।
* अर्थशास्त्री संजीव सान्याल और भाजपा नेता तथागत रॉय ने भी हिन्दू परंपराओं की विविधता का हवाला देकर ऐसी एकरूपता पर उठाए सवाल।
* महाराष्ट्र में गरबा-डांडिया में मुस्लिमों के प्रवेश को लेकर वीएचपी और मंत्री नितेश राणे की टिप्पणियों से नया विवाद खड़ा हुआ।
* केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने धर्म के आधार पर लोगों को त्योहारों से दूर रखने के विचार का विरोध किया।
* अमृता फड़नवीस की टिप्पणी भी इस बात की ओर संकेत करती है कि बिना खलल त्योहार में शामिल होने वालों को रोकना उचित नहीं।
* धार्मिक आयोजनों को पहचान और खान-पान की राजनीति से जोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान स्वयं त्योहारों की सामाजिक आत्मा को हो सकता है।

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