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बच्चों में हिंसा की बढ़ती मनोवृत्ति, नौनिहालों की खतरनाक है ये प्रवृत्ति

  • कटघरे में अभिभावक: जिम्मेदारी से कब तक भागेंगे माता-पिता?
  • बच्चे के हाथ में हथियार, मोबाइल में हिंसा और माता-पिता की आंखों पर लापरवाही की पट्टी!
  • स्कूलों में हिंसा, घरों में लापरवाही और समाज के सामने खड़ा होता भयावह भविष्य

हरियाणा में आठ साल के बच्चे की बर्बरता और आंध्र प्रदेश के स्कूल में एक छात्रा पर जानलेवा हमला केवल कानून-व्यवस्था के सवाल नहीं हैं। ये उन माता-पिता की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं, जो बच्चों को महंगे मोबाइल, इंटरनेट और सुविधाएं तो देते हैं, लेकिन उनके मन में क्या चल रहा है, इसकी खबर तक नहीं रखते। आखिर बच्चों के हाथों में हिंसा का विचार कौन पहुंचा रहा है? क्या अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए अभिभावक भी इस बिगड़ती तस्वीर के हिस्सेदार नहीं बन रहे हैं?

 

आठ साल की उम्र में इतनी नफरत कहां से आई?

हरियाणा में तीसरी कक्षा के एक बच्चे ने अपनी ही स्कूल की केजी की छात्रा को जिस बर्बरता से पीटा, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को भीतर तक झकझोर देने के लिए काफी है। बच्ची को बुरी तरह घायल किया गया। दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में एक युवक बैटरी से चलने वाली आरी लेकर कक्षा में घुसा और छात्रा सहित कई बच्चों को घायल कर दिया।
दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन इनके भीतर छिपा सवाल एक है—हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है?
आठ साल का बच्चा जब किसी छोटी बच्ची को चोट पहुंचाने में आनंद महसूस करने की बात करता है, तो यह केवल उसके व्यवहार का मामला नहीं रह जाता। यह सवाल भी उठता है कि उसने हिंसा को समझा कहां से, उसके मन में दूसरे की पीड़ा के प्रति संवेदना इतनी कमजोर कैसे हुई और उसके आसपास के वयस्कों ने उसके व्यवहार में उभरते संकेतों पर कितना ध्यान दिया?
यह मान लेना आसान है कि बच्चा बिगड़ गया है। लेकिन क्या उसके बिगड़ने की प्रक्रिया में परिवार, आसपास का वातावरण और डिजिटल दुनिया की कोई भूमिका नहीं हो सकती?

मोबाइल देकर जिम्मेदारी से मुक्त हो गए माता-पिता!

आज बहुत से अभिभावकों के लिए मोबाइल फोन बच्चों को व्यस्त रखने का सबसे आसान साधन बन गया है। बच्चा रो रहा है, मोबाइल पकड़ा दिया। खाना नहीं खा रहा है, वीडियो चला दिया। परेशान कर रहा है, गेम खेलने के लिए दे दिया।
माता-पिता को कुछ देर की शांति मिल जाती है, लेकिन इस शांति की कीमत क्या है, इसकी चिंता कम ही लोग करते हैं।
बच्चा मोबाइल पर क्या देख रहा है, किससे बात कर रहा है, कौन-सा गेम खेल रहा है और उसमें किस तरह की हिंसा दिखाई जा रही है, इन सवालों का जवाब बहुत से अभिभावकों के पास नहीं होता।
बच्चे को मोबाइल देना आसान है, लेकिन उसकी डिजिटल दुनिया की जिम्मेदारी उठाना मुश्किल। समस्या यह है कि अनेक माता-पिता सुविधा को प्राथमिकता देते हैं और निगरानी को अनावश्यक झंझट समझते हैं।
यह सही है कि हिंसक गेम खेलने वाला हर बच्चा हिंसक नहीं बनता। किसी एक घटना के पीछे केवल वीडियो गेम को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं है। लेकिन जब बच्चों के सामने बार-बार मारपीट, हथियारों और दूसरों को नुकसान पहुंचाने को मनोरंजन की तरह प्रस्तुत किया जाता है, तो अभिभावकों के लिए उसके संभावित प्रभावों को समझना जरूरी हो जाता है।

घर में बच्चों के सामने क्या परोसा जा रहा है?

बच्चे केवल स्कूल की किताबों से नहीं सीखते। वे घर में माता-पिता का व्यवहार देखते हैं, उनकी भाषा सुनते हैं और उनके आचरण की नकल करते हैं।
घर में यदि छोटी-छोटी बातों पर गाली-गलौज होती है, गुस्से में मारपीट की जाती है, महिलाओं का अपमान किया जाता है और कमजोर व्यक्ति को दबाने को ताकत समझा जाता है, तो बच्चे के मन में हिंसा के प्रति कैसी धारणा बनेगी?
माता-पिता बच्चों को ईमानदारी, अनुशासन और सम्मान का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन क्या वे खुद इन मूल्यों का पालन करते हैं?
बच्चे से कहा जाता है कि झूठ मत बोलो, जबकि वह अपने सामने बड़ों को झूठ बोलते देखता है। उसे दूसरों का सम्मान करने की सीख दी जाती है, जबकि घर में ही दूसरों का अपमान होता है। उसे गुस्सा नियंत्रित करने को कहा जाता है, लेकिन अभिभावक स्वयं छोटी-सी असहमति पर अपना आपा खो देते हैं।
बच्चों को संस्कार भाषण से नहीं, व्यवहार से मिलते हैं। माता-पिता जिस आचरण को रोजमर्रा की जिंदगी में सामान्य बनाते हैं, बच्चा उसी को जीवन का सामान्य तरीका मान सकता है।

बच्चे की गलती दिखती है, अपनी परवरिश की कमी नहीं!

समाज में एक अजीब प्रवृत्ति दिखाई देती है। बच्चा गलती करता है, तो माता-पिता सबसे पहले दूसरे बच्चों, स्कूल, शिक्षकों और समाज को दोष देने लगते हैं। अपनी परवरिश पर सवाल उठाना उन्हें पसंद नहीं आता।
स्कूल की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। शिक्षकों को भी बच्चों के व्यवहार में दिखाई देने वाले गंभीर बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन क्या बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण की पूरी जिम्मेदारी स्कूल की है?
बच्चे के जीवन में सबसे अधिक समय और प्रभाव परिवार का होता है। उसके स्वभाव, भावनाओं, डर, गुस्से और व्यवहार को समझने का अवसर माता-पिता के पास सबसे अधिक होता है।
यदि बच्चा लगातार दूसरों को पीटता है, जानबूझकर किसी को चोट पहुंचाता है, पश्चाताप नहीं दिखाता या हिंसा को मनोरंजन समझने लगता है, तो उसे केवल शरारत कहकर टालना खतरनाक हो सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में बच्चे को अपमानित करने या पीटने के बजाय उसके व्यवहार की वजह समझने और जरूरत पड़ने पर बाल मनोवैज्ञानिक की सहायता लेने की आवश्यकता है।
माता-पिता को यह स्वीकार करना होगा कि बच्चे की हर गलती का बचाव करना प्यार नहीं है। कभी-कभी समय रहते गलती पहचानना और सुधार की जिम्मेदारी उठाना ही सच्चा प्यार होता है।

महंगी फीस और अच्छे कपड़े संस्कारों की गारंटी नहीं!

आज बच्चों के भविष्य को लेकर अभिभावकों की चिंता अक्सर स्कूल, ट्यूशन, प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर तक सीमित हो गई है। बच्चा कितने अंक लाया, किस स्कूल में पढ़ता है, अंग्रेजी कितनी अच्छी बोलता है और आगे कितना कमाएगा—इन सवालों पर परिवार में खूब चर्चा होती है।
लेकिन बच्चा दूसरों के दुख को समझता है या नहीं? वह गुस्से में अपने व्यवहार को नियंत्रित कर पाता है या नहीं? वह किसी कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है? उसमें गलती स्वीकार करने का साहस है या नहीं? इन सवालों को कितनी प्राथमिकता दी जाती है?
अच्छे अंक बच्चे को सफल पेशेवर बना सकते हैं, लेकिन संवेदनशीलता, आत्मनियंत्रण और नैतिक जिम्मेदारी के बिना अच्छी शिक्षा भी उसके व्यक्तित्व की सारी कमियां दूर नहीं कर सकती।
बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा करना नहीं, सहयोग करना भी सिखाना होगा। केवल जीतना नहीं, हार स्वीकार करना भी सिखाना होगा। केवल अपना अधिकार नहीं, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी सिखाना होगा।

बच्चों की हिंसा को नजरअंदाज करना पूरे समाज के लिए खतरा

जब नाबालिगों के बीच चाकूबाजी, मारपीट, नशे और गंभीर अपराधों की घटनाएं सामने आती हैं, तो समाज अक्सर दो हिस्सों में बंट जाता है। एक पक्ष कठोर सजा की मांग करता है, जबकि दूसरा बच्चों की उम्र और परिस्थितियों का हवाला देता है।
वास्तविक समाधान इन दोनों के बीच जिम्मेदार संतुलन में है।
गंभीर अपराध को केवल उम्र का हवाला देकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीड़ित बच्चे को न्याय, उपचार और सुरक्षा मिलनी चाहिए। साथ ही, कम उम्र में हिंसक व्यवहार दिखाने वाले बच्चों के मामले में यह भी समझना होगा कि उन्हें जवाबदेह बनाने के साथ सुधार का अवसर कैसे दिया जाए।
माता-पिता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि उनके बच्चे की हिंसा केवल घर की चारदीवारी तक सीमित रहेगी। यदि समय रहते व्यवहार में सुधार नहीं हुआ, तो उसके परिणाम दूसरे बच्चों, परिवारों और अंततः स्वयं उस बच्चे के भविष्य को भी प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए परिवार, स्कूल, समाज और प्रशासन को मिलकर काम करना होगा। बच्चों में हिंसा के शुरुआती संकेतों को पहचानना, नशे की पहुंच रोकना, डिजिटल गतिविधियों पर उम्र के अनुरूप निगरानी रखना और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है।

बच्चों को कठघरे में खड़ा करने से पहले अभिभावक खुद से सवाल करें

हरियाणा की मासूम बच्ची के साथ हुई हिंसा हो या आंध्र प्रदेश के स्कूल में छात्रा पर हुआ हमला, ऐसी घटनाएं हमें चेतावनी देती हैं कि बच्चों की सुरक्षा और उनके व्यवहार को लेकर लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
लेकिन किसी घटना की पूरी जानकारी सामने आए बिना उसके लिए माता-पिता को अकेले दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। हर हिंसक व्यवहार के पीछे परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच, प्रमाण और विशेषज्ञों की समझ जरूरी है।
फिर भी एक सवाल हर अभिभावक को खुद से पूछना चाहिए—क्या मैं अपने बच्चे को केवल सुविधाएं दे रहा हूं या उसे एक जिम्मेदार इंसान भी बना रहा हूं?
क्या मुझे पता है कि वह मोबाइल पर क्या देखता है? उसके मित्र कौन हैं? उसे किस बात पर गुस्सा आता है? वह दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है? क्या वह अपनी परेशानी मुझसे साझा करने में सहज महसूस करता है?
बच्चों के हाथों में मोबाइल, खिलौने और महंगी सुविधाएं थमाकर माता-पिता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। बच्चों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए उनके मन, व्यवहार और संवेदनाओं की देखभाल भी उतनी ही जरूरी है।
समाज को बच्चों की हिंसा पर केवल आक्रोश व्यक्त करने से आगे बढ़ना होगा। स्कूलों को जवाबदेह बनाना होगा, कानून को अपना काम करने देना होगा और परिवारों को अपनी भूमिका समझनी होगी।
क्योंकि जब किसी बच्चे के भीतर दूसरे की पीड़ा के प्रति संवेदना कमजोर पड़ने लगती है, तब सवाल केवल उस बच्चे का नहीं होता। सवाल उस पूरे वातावरण का होता है जिसमें वह बड़ा हो रहा है।
बच्चों का भविष्य सुधारना है, तो अभिभावकों को भी आत्ममंथन करना होगा। आखिर परवरिश केवल बच्चे को बड़ा करने का नाम नहीं, उसे इंसान बनाने की जिम्मेदारी भी है।

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