कांवड़ में भक्ति कम,उदण्डों व लम्पटों की भरमार,भगवान शिव के गरिमा को कर रहे तार -तार

- आस्था के नाम पर सड़क पर कानून क्यों हार जाता है?
- सरकारें सुविधाएं देती रहीं, लेकिन कुछ कांवड़ियों ने आस्था को अराजकता में बदल दिया
- कांवड़ से टक्कर हुई तो कार, बाइक और एंबुलेंस पर टूट पड़ा गुस्सा
- पुलिस सामने रही, मगर कार्रवाई के बजाय कई जगह तमाशबीन बनी रही
- जहां भक्ति में संयम होना चाहिए था, वहां डीजे, नशा और अश्लीलता ने ली जगह
- आस्था के नाम पर आम आदमी की सड़क, दुकान और रोजी-रोटी क्यों कुर्बान?
- उपद्रव करने वाले भी हिंदू, पीड़ित भी हिंदू फिर कार्रवाई से किसकी भावना आहत होगी
- धर्म को सत्ता का संरक्षण मिला तो क्या श्रद्धा पीछे और प्रदर्शन आगे निकल गया?
भारत में धर्म केवल पूजा-पाठ की व्यवस्था नहीं रहा, बल्कि उसने सदियों तक समाज को जोड़ने, सहने और अलग-अलग आस्थाओं के साथ रहने की संस्कृति भी विकसित की। इस देश में धर्म के नाम पर पाखंड, कर्मकांड, छल-कपट और टकराव के उदाहरण कभी कम नहीं रहे, लेकिन इसके बावजूद सामाजिक सहिष्णुता की एक मजबूत धारा बनी रही। समस्या तब शुरू होती है, जब धर्म निजी आस्था की सीमा पार कर सत्ता के संरक्षण और सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनने लगे। कांवड़ यात्रा इसका सबसे चर्चित उदाहरण बनती जा रही है। सावन आते ही लाखों श्रद्धालु कंधों पर कांवड़ उठाकर शिवालयों की ओर निकलते हैं। यह धार्मिक यात्रा है, आस्था का पर्व है और करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ी परंपरा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके साथ एक ऐसी तस्वीर भी उभर रही है जिसमें भक्ति के साथ उग्रता, सड़क पर दबंगई, तोड़फोड़, मारपीट, नशा, तेज डीजे और अश्लील प्रदर्शन जैसी घटनाएं भी दिखाई देती हैं।
सरकारें कांवड़ियों के लिए रास्ते साफ करती हैं, भोजन की दुकानों के संचालन पर प्रतिबंध लगाती हैं, यातायात व्यवस्था बदलती हैं, सुरक्षा बल तैनात करती हैं और कई जगह स्वागत-सत्कार के इंतजाम करती हैं। कहीं हेलीकॉप्टर से फूल बरसते हैं तो कहीं पुलिसकर्मी सेवा करते दिखाई देते हैं। यह सब श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर किया जाता है। सवाल यह है कि जब राज्य इतनी बड़ी व्यवस्था किसी धार्मिक यात्रा के लिए करता है, तो कानून का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उतनी ही दृढ़ता से क्यों नहीं निभाई जाती? कांवड़ यात्रा में करोड़ों श्रद्धालु शांतिपूर्वक चलते हैं। इसलिए हर कांवड़िये को उपद्रवी बताना उतना ही गलत है जितना उपद्रव को आस्था का स्वाभाविक हिस्सा मान लेना। असली सवाल उन लोगों का है जो धार्मिक पहचान को कानून से ऊपर समझने लगते हैं।

धर्म की यात्रा या शक्ति प्रदर्शन
कांवड़ यात्रा हिन्दू धर्म की अत्यंत लोकप्रिय धार्मिक परंपरा है। श्रद्धालु गंगाजल लेकर शिवालयों में भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। तप, संयम और श्रद्धा इस यात्रा की मूल भावना मानी जाती है। लेकिन जब धार्मिक यात्रा का सार्वजनिक रूप ऐसा होने लगे कि सड़क पर चलने वाला आम नागरिक भयभीत हो, दुकानदार अपनी दुकान बंद करने को मजबूर हो, वाहन चालक मामूली दुर्घटना के बाद भीड़ के डर से कांपने लगे और पुलिस कार्रवाई करने से पहले श्रद्धालुओं की नाराजगी का हिसाब लगाने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। आस्था को सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन कानून से ऊपर किसी आस्था को नहीं रखा जा सकता। धर्म अगर अनुशासन सिखाता है तो धार्मिक यात्रा में अनुशासन सबसे पहले दिखाई देना चाहिए।
सरकार की मेहरबानी, कानून की मजबूरी कांवड़ यात्रा के दौरान राज्य सरकारें व्यापक इंतजाम करती हैं। मार्गों पर सुरक्षा, चिकित्सा, पेयजल, विश्राम स्थल और यातायात व्यवस्था की जाती है। कई राज्यों में कांवड़ मार्गों पर दुकानों और खानपान प्रतिष्ठानों को लेकर विशेष निर्देश जारी किए जाते हैं। कांवड़ियों के स्वागत में राजनीतिक दलों और प्रशासनिक तंत्र की सक्रियता भी दिखाई देती है। यह सब गलत नहीं है। श्रद्धालुओं की सुविधा सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब सुविधा के साथ जवाबदेही नहीं आती। यदि किसी धार्मिक यात्रा के लिए सड़क बंद की जाती है तो प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उस सड़क पर चलने वाले नागरिक के अधिकार समाप्त न हो जाएं। यदि किसी समुदाय की धार्मिक भावना का सम्मान किया जा रहा है तो दूसरे नागरिक की जान और संपत्ति की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
मामूली टक्कर, बड़ी हिंसा
कांवड़ से किसी वाहन की टक्कर हो जाना निश्चित रूप से अप्रिय घटना है। कांवड़ का टूटना श्रद्धालु के लिए भावनात्मक क्षति हो सकती है। लेकिन इसका समाधान क्या है। हरिद्वार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सामने आई घटनाओं में कांवड़ से वाहन टकराने के आरोप में कार चालकों, बाइक सवारों और ट्रक चालकों के साथ मारपीट और वाहनों में तोड़फोड़ की घटनाएं चर्चा में रही हैं। अगर दुर्घटना जानबूझकर की गई है तो कानून अपना काम करे। अगर गलती से हुई है तो भीड़ को सजा देने का अधिकार किसने दिया। यही प्रश्न कांवड़ यात्रा की पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा है। एंबुलेंस भी नहीं बची तो समझिए समस्या कितनी गंभीर है। सबसे विचलित करने वाली तस्वीर तब बनती है जब धार्मिक जुलूस और आम नागरिक की बुनियादी जरूरत आमने-सामने खड़ी हो जाए। एंबुलेंस किसी मरीज को लेकर जा रही है। उसका समय जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर हो सकता है। अगर उसका किसी कांवड़ यात्रा से मामूली संपर्क हो जाए और उसके चालक की पिटाई शुरू हो जाए, सड़क रोक दी जाए और मरीज समेत एंबुलेंस जाम में फंस जाए, तो सवाल केवल यातायात का नहीं रहता। सवाल यह बन जाता है कि आस्था के सामने इंसान की जिंदगी की कीमत कितनी है? किसी भी धर्म की मूल भावना किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचने से रोकना नहीं हो सकती।
पुलिस की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल
कांवड़ यात्रा के दौरान पुलिस भारी संख्या में तैनात रहती है। उसका पहला दायित्व श्रद्धालुओं की सुरक्षा के साथ-साथ आम जनता की सुरक्षा करना भी है। लेकिन कई वायरल वीडियो और घटनाओं में पुलिसकर्मी भीड़ के सामने असहाय दिखाई देते हैं। कहीं पुलिसकर्मी के साथ बदसलूकी होती है। कहीं वाहन तोड़े जाते हैं, कहीं चालक की पिटाई होती है, कहीं पुलिस के हस्तक्षेप का भी विरोध किया जाता है। यदि पुलिस कानून लागू करने के बजाय भीड़ के गुस्से से बचने लगे तो कानून का शासन किसके भरोसे रहेगा? धार्मिक पहचान किसी को पुलिस पर हाथ उठाने का अधिकार नहीं देती और पुलिस की वर्दी किसी धार्मिक भीड़ के सामने कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।
नशा और डीजे ने बदला यात्रा का स्वरूप
कांवड़ यात्रा का धार्मिक स्वरूप संयम और साधना से जुड़ा है। लेकिन सोशल मीडिया पर सामने आने वाले अनेक वीडियो में तेज डीजे, नृत्य, नशे और हुड़दंग की तस्वीरें दिखाई देती हैं। कुछ जगहों पर युवक-युवतियों के अशोभनीय नृत्य के वीडियो सामने आते हैं। कहीं नशे में धुत लोग सड़क पर नाचते दिखाई देते हैं। कहीं पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी तक के दृश्य सामने आते हैं। यहां प्रश्न केवल नैतिकता का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या धार्मिक यात्रा को मनोरंजन और शक्ति प्रदर्शन का मंच बना दिया जाना चाहिए। यदि शासन-प्रशासन ने नियम बनाए हैं तो उनका पालन क्यों नहीं होता और यदि नियम लागू करने में प्रशासन असफल है तो फिर नियम बनाने का उद्देश्य क्या है।
अश्लीलता पर मौन क्यों
किसी भी धार्मिक आयोजन में अश्लीलता का प्रवेश उस धर्म की छवि को ही नुकसान पहुंचाता है। यदि कोई महिला या पुरुष अपनी निजी जिंदगी में नृत्य करता है तो वह अलग बात है। लेकिन धार्मिक यात्रा के नाम पर सार्वजनिक सड़क को ऐसे प्रदर्शन का मंच बना देना बहस का विषय जरूर है। यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब यही व्यवहार किसी दूसरे धार्मिक आयोजन से जुड़ा हो तो समाज का एक बड़ा हिस्सा तुरंत विरोध में खड़ा हो जाता है। लेकिन अपने धार्मिक आयोजन में वही लोग चुप हो जाते हैं। धर्म की आलोचना तभी सार्थक है जब वह अपने घर से शुरू हो। यदि हम दूसरे धर्म की भीड़ में उग्रता देखते हैं तो अपने धर्म की भीड़ में भी उग्रता को गलत कहने का साहस रखना होगा।
सत्ता और धर्म की नजदीकी का असर
धर्म को राज्यसत्ता का संरक्षण मिलना अपने आप में गलत नहीं है, यदि उसका उद्देश्य सभी धार्मिक समुदायों को समान सुरक्षा और सुविधा देना हो। लेकिन जब संरक्षण विशेष धार्मिक पहचान के प्रदर्शन में बदल जाए तो खतरा पैदा होता है। राज्य को धर्म के प्रति सम्मान रखना चाहिए, लेकिन राज्य की शक्ति कानून के प्रति जवाबदेह रहनी चाहिए। यदि धार्मिक यात्रा के दौरान किसी को विशेष सुविधा मिलती है तो उसके साथ विशेष अनुशासन भी होना चाहिए।
जितनी बड़ी सुविधा, उतनी बड़ी जिम्मेदारी
यह सिद्धांत हर धार्मिक आयोजन पर लागू होना चाहिए।
कांवड़ यात्रा को बदनाम करने की जरूरत नहीं, सुधारने की जरूरत है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि लाखों कांवड़ियों में कुछ लोगों की हिंसक या अनुशासनहीन गतिविधियों के आधार पर पूरी यात्रा को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। अधिकांश श्रद्धालु शांतिपूर्वक यात्रा करते हैं, वे कठिन परिस्थितियों में पैदल चलते हैं।
वे धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। वे पूजा-अर्चना करते हैं और वापस लौटते हैं। लेकिन कानून तोड़ने वाले कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई न होने से पूरी यात्रा की छवि खराब होती है। इसलिए धार्मिक संगठनों और कांवड़ समितियों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने सदस्यों को अनुशासन का पाठ पढ़ाएं। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून तोड़ने वाले किसी व्यक्ति को धार्मिक पहचान के आधार पर संरक्षण न दे। पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष कार्रवाई करे और समाज की जिम्मेदारी है कि वह गलत को गलत कहे।
* कांवड़ यात्रा श्रद्धा की परंपरा है, उसे अराजकता का लाइसेंस नहीं बनाया जा सकता।
* धार्मिक भावना का सम्मान जरूरी है, लेकिन कानून का सम्मान उससे कम जरूरी नहीं।
* मामूली दुर्घटना पर हिंसा किसी भी धार्मिक सिद्धांत का हिस्सा नहीं हो सकती।
* एंबुलेंस, मरीज, स्कूली बच्चे और आम नागरिक किसी भी धार्मिक आयोजन के कारण बंधक नहीं बन सकते।
* पुलिस को भीड़ के दबाव में नहीं, कानून के अनुसार काम करना चाहिए।
* नशा, अश्लीलता और हुड़दंग को धार्मिक आस्था का नाम देना स्वयं धर्म का अपमान है।
* कांवड़ यात्रा में शांतिपूर्वक शामिल होने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को कुछ उपद्रवियों से अलग करके देखना जरूरी है।
* धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक संरक्षण मिले तो जवाबदेही भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए।
* धर्म की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि वह अपने नाम पर होने वाली गलतियों का विरोध कितनी ईमानदारी से करता है।




