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दिव्या मित्तल क्या बदल पाएंगी सियासत की तस्वीर? राजनैतिक सफलता में क्या साथ देगी इनकी तकदीर?

कुर्सी से वोट की चौखट तक

  • फाइलों पर कलम चलाना आसान, वोटरों के मिजाज पर कलम चलाना मुश्किल अब दिव्या मित्तल को बाबूगिरी नहीं, बूथगिरी समझनी होगी
  • जनता की तालियां सुनाई दूर से देती हैं, लेकिन वोट की पर्ची बहुत करीब से फैसला करती है, सहानुभूति को वोट समझने की भूल भारी पड़ सकती है
  • अकेले चुनाव लड़ने का जुनून अच्छा है, मगर राजनीति कोई प्रशासनिक परीक्षा नहीं कि मेरिट लिस्ट में नाम आया और कुर्सी मिल गई
  • सिस्टम बदलने निकले अफसरों को राजनीति ने बार-बार बताया है यहां ईमानदार भाषण से ज्यादा जरूरी है जमीनी संगठन और वोट का गणित
  • आईएएस की फाइल में आदेश चलता है, राजनीति में मतदाता चलता है, और मतदाता के सामने न पद चलता है, न पुरानी कुर्सी
  • सपना बड़ा है तो स्वागत है, मगर सियासत सपनों की प्रयोगशाला नहीं यहां जनता पहले उम्मीदवार को तौलती है, फिर उसकी महत्वाकाक्षा को

प्रशासनिक सेवा की चमकदार कुर्सी छोड़कर राजनीति की धूल भरी सड़क पर उतरना आसान फैसला नहीं है। पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने राजनीति में आने का फैसला लेकर निश्चित रूप से एक चुनौतीपूर्ण रास्ता चुना है। उससे भी दिलचस्प उनका यह फैसला है कि वह किसी स्थापित राजनीतिक दल का झंडा थामने के बजाय अकेले मैदान में उतरना चाहती हैं। सुनने में यह बात बेहद रोमांटिक लगती है व्यवस्था बदलेंगे, राजनीति की गंदगी साफ करेंगे और जनता को नया विकल्प देंगे। मगर राजनीति की असली पाठशाला में प्रवेश करते ही रोमांस अक्सर वोटों के गणित में बदल जाता है। प्रशासन में आदेश जारी होता है और व्यवस्था उसका पालन करती है। राजनीति में नेता भाषण देता है और जनता चाहे तो ताली बजाती है, चाहे तो घर जाकर दूसरे उम्मीदवार को वोट दे आती है। यही वह मामूली-सा दिखने वाला अंतर है, जो बड़े-बड़े अफसरों को राजनीति की जमीन पर उतारकर अचानक साधारण उम्मीदवार बना देता है। देश और प्रदेश की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब प्रशासनिक या पुलिस सेवा से निकले अधिकारियों ने राजनीति में प्रवेश किया। कुछ ने इतिहास बनाया, तो कुछ इतिहास के फुटनोट बनकर रह गये। किसी को स्थापित दल का सहारा मिला तो संसद और मंत्रालय तक पहुंच गये, किसी ने अकेले उड़ान भरने की कोशिश की तो जनता ने बता दिया कि लोकप्रियता और वोट बैंक दो अलग-अलग चीजें हैं।
दिव्या मित्तल की प्रतिभा और प्रशासनिक उपलब्धियों पर सवाल नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक सफलता का प्रमाणपत्र राजनीति में जीत की गारंटी भी बन सकता है? इसका जवाब अभी भविष्य के मतदाताओं के पास है।

राजनीति में उतरने का फैसला जितना साहसिक है, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प

पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल का राजनीति में उतरने का फैसला जितना साहसिक है, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प उनका अकेले राजनीतिक मैदान में उतरने का संकल्प है। न कोई बड़ा राजनीतिक झंडा, न किसी स्थापित दल की चुनावी मशीनरी और न ही किसी पार्टी का वर्षों पुराना कैडर सिर्फ अपना नाम, अपनी छवि, अपने विचार और जनता से सीधे संवाद का भरोसा।
सुनने में यह व्यवस्था परिवर्तन का शानदार फार्मूला लगता है। मगर भारतीय राजनीति की विडंबना यही है कि यहां फार्मूले अक्सर भाषणों में सफल होते हैं और बूथ पर जाकर उनकी असली परीक्षा होती है। दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा में अपनी पहचान बनाई। अकादमिक जीवन में भी उनकी सफलता उल्लेखनीय रही। लेकिन प्रशासनिक सेवा और राजनीति दो बिल्कुल अलग मैदान हैं। आईएएस अधिकारी के पास पद की वैधानिक शक्ति होती है। राजनीति में उम्मीदवार के पास सिर्फ जनता का विश्वास मांगने का अधिकार होता है। वहां आदेश नहीं चलता, आग्रह चलता है। फाइल नहीं चलती, वोट चलता है। यही कारण है कि प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आये अधिकारियों का इतिहास बेहद मिश्रित रहा है।

सहानुभूति को वोट समझने की भूल

उत्तर प्रदेश में शैलेंद्र सिंह का उदाहरण अक्सर इस संदर्भ में याद किया जाता है। वर्ष 2004 में नौकरी छोड़कर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। उस समय उनके पक्ष में जबरदस्त सहानुभूति का माहौल था। कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां उन्हें अपने साथ लेने और टिकट देने के लिए तैयार थीं, लेकिन उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ना पसंद किया। नतीजा सामने था। सहानुभूति का शोर वोटों की खामोशी में बदल गया। वह वाराणसी से चुनाव हार गये। बाद में कांग्रेस से जुड़े, चंदौली से चुनाव लड़ा, फिर भाजपा का भी हिस्सा बने, लेकिन वह राजनीतिक सफलता हासिल नहीं कर सके जिसकी उम्मीद शुरुआती लोकप्रियता से पैदा हुई थी। यही राजनीति का पहला व्यंग्य है जिस जनता को देखकर उम्मीदवार को लगता है कि पूरा शहर उसके साथ है, वही जनता मतदान केंद्र पर जाकर अक्सर किसी और के साथ खड़ी मिलती है। जनसमर्थन और वोट बैंक के बीच यही महीन फर्क कई राजनीतिक सपनों को धराशायी कर चुका है।

स्थापित पार्टी क्यों बनती है राजनीतिक बैसाखी?

यहां स्थापित राजनीतिक दलों की ताकत समझना जरूरी है। पार्टी केवल झंडा और चुनाव चिन्ह नहीं होती। उसके पीछे बूथ स्तर तक संगठन, कार्यकर्ता, स्थानीय नेताओं का नेटवर्क, प्रचार तंत्र, संसाधन और वर्षों से बना मतदाता संपर्क होता है। एक नया उम्मीदवार कह सकता है कि वह जनता के बीच लोकप्रिय है। लेकिन चुनाव पूछता है आपके बूथ एजेंट कौन हैं? मतदाता तक संदेश कौन पहुंचाएगा? गांव-गांव कौन जाएगा? मतदान के दिन कार्यकर्ता कौन खड़ा करेगा? संगठनात्मक संकट में कौन साथ देगा?
यहीं अकेले चुनाव लड़ने का रोमांच जमीन पर आकर गणित बन जाता है।

अरविंद केजरीवाल अपवाद को नियम कैसे मानें?

अधिकारियों की राजनीतिक सफलता की चर्चा में अरविंद केजरीवाल का नाम सबसे अलग दिखाई देता है। उन्होंने स्थापित दल का टिकट लेकर शुरुआत नहीं की। अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई और दिल्ली में सत्ता तक पहुंचे। पंजाब में भी उनकी पार्टी ने सरकार बनाई।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता केजरीवाल सीधे चुनाव मैदान में नहीं कूदे थे। उनके पीछे अन्ना आंदोलन से बनी राष्ट्रीय पहचान, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जनलोकपाल का मुद्दा और लंबे समय तक बना जनसंपर्क था। अर्थात उन्होंने पहले राजनीतिक जमीन तैयार की और बाद में चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। इसलिए केजरीवाल का उदाहरण दिव्या मित्तल के लिए प्रेरणा जरूर हो सकता है, लेकिन उसे राजनीतिक सफलता का आसान फार्मूला मानना जोखिम भरा होगा।

पार्टी में शामिल होकर भी हर कोई सफल नहीं हुआ

यह भी सच है कि स्थापित राजनीतिक दल का टिकट मिल जाने भर से सफलता सुनिश्चित नहीं होती।
तमिलनाडु के पूर्व आईपीएस के. अन्नामलाई ने पुलिस सेवा छोड़कर भाजपा का दामन थामा। उन्होंने सक्रिय राजनीति में मजबूत पहचान बनाई, लेकिन चुनावी सफलता हर बार उनके साथ नहीं रही। बाद में उन्होंने अलग राजनीतिक राह बनाने की कोशिश की। पूर्व आईएएस वी.एस. चंद्रलेखा ने भी प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में कदम रखा और अलग-अलग राजनीतिक मंचों से चुनावी राजनीति में सक्रिय रहीं, लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। तेलंगाना के पूर्व आईपीएस आर.एस. प्रवीण कुमार ने भी राजनीति में प्रवेश किया। बहुजन समाज पार्टी और बाद में भारत राष्ट्र समिति के साथ राजनीतिक सक्रियता दिखाई, लेकिन चुनावी सफलता आसान नहीं रही। अर्थात पार्टी संगठन जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

दिव्या के सामने असली चुनौती यहीं से

दिव्या मित्तल की चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि उनके सामने जनता की उम्मीद और चुनावी वास्तविकता दोनों एक साथ खड़ी हैं। प्रशासनिक सेवा में उन्होंने जो काम किया, वह उनके कैरियर का हिस्सा है। राजनीति में वही काम राजनीतिक पूंजी तभी बनेगा, जब जनता उसे अपना मुद्दा माने और उसके आधार पर वोट देने का फैसला करे। उनका यह कहना कि वह किसी पार्टी में शामिल नहीं होंगी और स्वतंत्र रूप से राजनीति करेंगी, सुनने में साहसिक है। मगर स्वतंत्र राजनीति में स्वतंत्र संगठन भी चाहिए। अकेला उम्मीदवार स्वतंत्र हो सकता है, लेकिन चुनाव अकेले नहीं लड़ा जाता। यह राजनीति का सबसे कठोर व्यंग्य है। यहां मतदाता सिर्फ यह नहीं पूछता कि उम्मीदवार ईमानदार है या नहीं। वह पूछता है आप मेरे इलाके के लिए क्या करेंगे? आपके साथ कौन है? चुनाव के बाद आपकी पहुंच कहां होगी? आपकी राजनीतिक ताकत कितनी है? और सबसे बड़ा सवाल जीतने के बाद मेरी आवाज कौन सुनेगा?

 

आईएएस की मेरिट और राजनीति की मेरिट अलग-अलग

दिव्या मित्तल के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह प्रशासनिक मेरिट को राजनीतिक मेरिट में कैसे बदलती हैं। प्रतियोगी परीक्षा में हजारों अभ्यर्थियों के बीच चयन हुआ। वहां उत्तर सही था तो अंक मिले। राजनीति में उत्तर सही होने के बावजूद वोट न मिले तो पूरा गणित गलत। यही कारण है कि प्रशासनिक सफलता को चुनावी सफलता का प्रमाणपत्र समझना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल हो सकती है। राजनीति में जनता अंतिम परीक्षक है। यहां कोई इंटरव्यू बोर्ड नहीं, कोई सेवा आयोग नहीं और कोई मेरिट सूची नहीं। यहां सिर्फ एक बटन दबता है और उस बटन पर उम्मीदवार का पूरा सपना टिका होता है। दिव्या मित्तल का राजनीति में उतरना निश्चित रूप से लोकतांत्रिक विकल्पों की दृष्टि से स्वागत योग्य है। नए लोग राजनीति में आएं, व्यवस्था पर सवाल उठाएं और बदलाव की बात करें, इससे लोकतंत्र मजबूत ही होगा। लेकिन राजनीति में प्रवेश और राजनीति में सफलता के बीच जितनी दूरी है, उतनी शायद प्रशासनिक सेवा की किसी परीक्षा में भी नहीं। दिव्या मित्तल के सामने अब फाइलें नहीं होंगी, मतदाता होंगे। आदेश नहीं होंगे, आग्रह होंगे। सरकारी तंत्र नहीं होगा, अपना संगठन बनाना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण सहानुभूति, लोकप्रियता और भाषणों के बीच वोट तलाशना होगा। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि दिव्या मित्तल राजनीति बदलेंगी या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या दिव्या मित्तल पहले राजनीति के उस कठोर गणित को बदल पाएंगी, जिसमें अकेली लोकप्रियता से ज्यादा ताकत संगठन, जमीन और वोट की होती है? फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि आईएएस की कुर्सी छोड़ना साहस हो सकता है, लेकिन राजनीति में झंडा गाड़ना उसके बाद शुरू होने वाली असली परीक्षा है।

* प्रशासन की फाइलों से निकलकर अब वोट की पर्चियों के बीच उतरेंगी पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल
* पार्टी से दूरी और अकेले चुनाव लड़ने का फैसला क्या यह आत्मविश्वास है या सियासी जमीन की कठिन परीक्षा?
* शैलेंद्र सिंह से लेकर इरोम शर्मिला तक के उदाहरण बताते हैं कि सहानुभूति हमेशा वोट नहीं बनती
* शाह फैजल, अमिताभ ठाकुर और दूसरे अधिकारियों की राजनीतिक यात्राएं भी देती हैं बड़ा सबक
* दूसरी ओर अजीत जोगी, यशवंत सिन्हा, एस. जयशंकर, हरदीप पुरी और असीम अरुण जैसे नाम बताते हैं कि स्थापित राजनीतिक संगठन का सहारा कितना महत्वपूर्ण है
* अरविंद केजरीवाल अपवाद, लेकिन उनके पीछे वर्षों का जनआंदोलन और मजबूत राजनीतिक जमीन
* प्रशासनिक सफलता की परीक्षा खुद की मेहनत से होती है, राजनीति में अंतिम फैसला जनता के वोट से

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