
* एक आरटीआई के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हमारे पास जजों के भ्रष्टाचार का डाटा नहीं
* लोकसभा में कानून मंत्री ने दिया 8630 का आंकड़ा
* लेकिन यह भी अधूरा, क्योंकि यह नहीं बताया कि किस जज के खिलाफ कितने मामले
* बीते 5 साल में जजों के खिलाफ करप्शन के मामलों में 51 फीसदी का इजाफा
नई दिल्ली। भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार के आखिर कितने मामले दर्ज हैं? लगता है यह सवाल अनसुलझा ही रह जाएगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट को ब ताया कि उसके पास जजों के भ्रष्टाचार या गलत व्यवहार से संबंधित कोई भी शिकायत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से पेश वकील रुक्मिनी बोबड़े ने कहा कि कोर्ट की रजिस्ट्री ऐसे रिकॉर्ड रखती ही नहीं है।
उनका जवाब सौरव दास की उस आरटीआई पर था, जो सूचना आयुक्त से मांगी गई थी। सौरव दास ने अप्रैल 2023 को यह आरटीआई दाखिल की थी। मजे की बात यह है कि इसी साल फरवरी में केंद्रीय कानून मंत्री ने लोकसभा को बताया था कि भारत के चीफ जस्टिस को 2016 से 2025 के बीच भारत के विभिन्न न्यायालयों में पदस्थ जजों के खिलाफ 8630 शिकायतें मिली हैं। उन्होंने सदन को बताया कि यह आंकड़ा खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही तैयार किया है। 2016 में जजों के खिलाफ 729 शिकायतें दर्ज हुईं, जबकि 2025 में इनकी संख्या 1102 हो गईं, जो कि 51 फीसदी का इजाफा है।

क्या है पूरा मामला?
पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता सौरव दास ने अप्रैल 2023 में मद्रास हाईकोर्ट के तत्कालीन कार्यवाहक चीफ जस्टिस टी राजा से पूछा था कि क्या उनके खिलाफ भ्रष्टाचार या कदाचार की कोई शिकायत है? अगर हां तो कितनी? इन पर अभी तक क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के जन सूचना अधिकारी ने जवाब देने से मना कर दिया। उन्होंने साफ कह दिया कि इस आरटीआई पर प्रथम अपीलीय अधिकारी ने जवाब देने से मना कर दिया है। इसके बाद सौरव ने केंद्रीय सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। वहां पर भी मुख्य सूचना अधिकारी ने जानकारी देने से मना कर दिया। उसके बाद सौरव ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की।
जजों की साख का सवाल
पहली अप्रैल को जब दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई तो जस्टिस कौरव ने कहा कि इस मामले के दूरगामी परिणाम होंगे। उन्होंने दोनों पक्षों से इस मसले र एक संतुलित प्रणाली बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि जजों की प्रतिष्ठा का कायम रखना जरूरी है। लोगों को पता चलना चाहिए कि जजों के खिलाफ क्या शिकायतें हैं और इनका निराकरण किस तरह से होता है। इस मामले की अगली सुनवाई सात मई को होगी।
संसद में कैसे आई जानकारी?
दिलचस्प बात यह है कि सौरव के वकील प्रशांत भूषण ने सवाल किया कि संसद में सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में यह जानकारी दी है कि देश में जजों के खिलाफ बीते पांच साल में 8630 मामले दर्ज हुए हैं। उन्होंने कोर्ट में दलील रखी कि सुप्रीम कोर्ट ने संसद को साल-दर-साल के आंकड़े दिए हैं। अब ऐसे में सुप्रीम कोर्ट यह कैसे कह सकता है कि उसकी रजिस्ट्री के पास इस तरह की कोई जानकारी है ही नहीं? उन्होंने यह भी कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट के पास 8630 जजों के खिलाफ कदाचार की जानकारी है तो उसे यह भी पता होगा कि किस जज के पास कितने मामले हैं। उन्होंने कहा कि बिना इस तरह के आंकड़े के संख्यात्मक जानकारी कोई मायने नहीं रखती है।
सुप्रीम कोर्ट का दावा झूठा
दिल्ली हाईकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट की वकील रुक्मिनी बोबड़े ने यह कहा कि कोर्ट के पास जजों का व्यक्तिगत आंकड़ा नहीं है। हालांकि, सौरव दास इसे झूठा दावा बताते हैं। उनका कहना है कि जब कोर्ट में कोई शिकायत आती है तो उसमें यह जरूर लिखा होता है कि वह किसके खिलाफ है। अन्यथा 8630 का आंकड़ा कैसे आएगा। इसी सवाल पर हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने भी बार-बार पूछा कि इतनी शिकायतों के बाद भी यह कैसे हो सकता है कि जजों के नाम नहीं मिलें? जज ने इस मसले पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे लोगों की धारणा न्यायपालिका के बारे में गलत बन सकती है। उनका कहना था कि इतनी सारी शिकायतों के बाद भी उनका निराकरण न हो पाना यही जताता है कि इन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। यह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धुंधला करने वाला है।
केजरीवाल की मांग- केस से हटें जज
दिल्ली शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी बात पूरी कर दी है। उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से मांग की है कि वो इस केस को सुनना बंद करें क्योंकि उनके मन में केजरीवाल के खिलाफ पहले से राय बन चुकी है। केजरीवाल ने एक नहीं बल्कि कई बड़े कारण गिनाए हैं। केजरीवाल ने कहा कि जस्टिस शर्मा ने ‘अधिवक्ता परिषद’ के कई कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। यह एक ऐसा संगठन है जो एक खास विचारधारा से जुड़ा है। केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी पार्टी उस विचारधारा का खुलकर विरोध करती है। इसलिए उनके मन में यह डर है कि अगर जज उस विचारधारा की समर्थक हैं और मैं उसका विरोधी हूं तो क्या मुझे इंसाफ मिलेगा? जस्टिस शर्मा ने इस पर पूछा कि क्या उन्होंने उन कार्यक्रमों में कोई राजनीतिक या विचारधारा से जुड़ी बात की या वो सिर्फ कानूनी कार्यक्रम थे। केजरीवाल ने कहा कि इस अदालत ने कई ऐसी टिप्पणियां कीं जो किसी को दोषी ठहराने जैसी लगती थीं, जबकि उस वक्त अभी चार्जशीट यानी आरोप पत्र भी दाखिल नहीं हुआ था। अपने खुद के मामले में उन्होंने कहा कि उनकी गिरफ्तारी सही थी या नहीं, बस यही देखना था। लेकिन अदालत ने सिर्फ दो सुनवाइयों में ही पक्की राय बना ली। उन्होंने कहा कि उन्हें अपना पक्ष ठीक से रखने का मौका भी नहीं मिला और अप्रूवर के बयान पर पांच मिनट की सुनवाई में ही भरोसा कर लिया गया। केजरीवाल ने कहा कि के मामले में इसी अदालत ने उन्हें भ्रष्ट कहा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया। इसी अदालत के तीन आदेश सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिए हैं। इससे साफ पता चलता है कि यह अदालत एकतरफा काम कर रही है।




