
● अंतरिक्ष में ही नहीं पहुंच पा रहा इसरो का यान! तो इंसानों को कैसे उड़ाएगा मोदी सरकार का गगनयान ?
● पीएसएलवी-62 फेल, डाटा दबाने में जुटा पीएमओ
● पीएसएलवी-62 मिशन फेल, तीसरा स्टेज अनियंत्रित होकर अंतरिक्ष में गुम
● लगातार दूसरी नाकामी, 2020 के बाद पांचवा असफल मिशन
● दो महीने बाद गगनयान की तैयारी, लेकिन भरोसे का आधार ही दरका
● लाइव टेलीकास्ट रोका गया, मीडिया से दूरी पारदर्शिता पर सवाल
● तीसरे स्टेज के नोजल में लीकेज, क्वालिटी कंट्रोल पर गंभीर संदेह
● पीएमओ के दबाव में तकनीकी डाटा दबाने का आरोप
● न्यू स्पेस इंडिया व निजी कंपनियों की एंट्री पर सवाल
● वैश्विक साख को झटका, व्यावसायिक लॉन्च पर मंडराता संकट
◆ अमित मौर्य
बेंगलुरु। भारत जिस अंतरिक्ष महाशक्ति बनने के सपने को रोज विज्ञापनों, भाषणों और सरकारी दावों में सुनता-देखता है, उसकी जमीनी हकीकत सोमवार को एक बार फिर अंतरिक्ष में ही गुम हो गई। इसरो का पीएसएलवी-62 मिशन फेल हो गया और इसके साथ ही नरेंद्र मोदी सरकार के गगनयान मिशन की विश्वसनीयता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया। विडंबना यह है कि जिस पीएसएलवी रॉकेट को इसरो की सबसे भरोसेमंद रीढ़ कहा जाता था, वही रॉकेट तीसरे स्टेज में तकनीकी खामी के चलते नियंत्रण से बाहर हो गया। यह कोई अकेली या आकस्मिक चूक नहीं है। यह इसरो की लगातार दूसरी नाकामी है और 2020 के बाद से पांचवीं बार ऐसा हुआ है जब भारतीय रॉकेट अपने पेलोड को तय कक्षा तक पहुंचाने में असफल रहा। ऐसे समय में, जब केंद्र सरकार मार्च में ही मानव अंतरिक्ष उड़ान गगनयान का ऐलान कर चुकी है और दो महीने बाद तैयारी की बातें हो रही हैं, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब मशीनें सुरक्षित नहीं उड़ रहीं, तो इंसानों को कैसे भेजा जाएगा? पीएसएलवी-62 का प्रक्षेपण जैसे ही 203 सेकंड पार करता है, इसरो के मिशन कंट्रोल से संपर्क टूट जाता है। घबराहट में लाइव टेलीकास्ट रोका जाता है, मीडिया के लिए दरवाजे बंद हो जाते हैं और देश को वही पुराना आश्वासन सुनाया जाता है कि जांच की जा रही है। बाद में इसरो अध्यक्ष वी. नारायण बताते हैं कि तीसरे स्टेज में तकनीकी खामी आई, रॉकेट अनियंत्रित होकर स्पिन करने लगा और मिशन विफल हो गया। लेकिन सवाल तकनीकी खामी से कहीं आगे का है। सवाल पारदर्शिता, जवाबदेही और राजनीतिक हस्तक्षेप का है। आरोप हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने बदनामी के डर से मिशन की विस्तृत तकनीकी जानकारी सार्वजनिक न करने के निर्देश दिए। यदि यह सच है, तो यह सिर्फ इसरो की नहीं, बल्कि देश की वैज्ञानिक संस्कृति पर सीधा आघात है। क्योंकि विज्ञान में सुधार डेटा से होता है, दबाव से नहीं। 2014 से पहले इसरो का पीएसएलवी विश्वसनीयता का पर्याय था। भारत न सिर्फ अपने, बल्कि दर्जनों देशों के उपग्रहों को व्यावसायिक रूप से अंतरिक्ष में भेजता था। आज वही इसरो लगातार असफलताओं से जूझ रहा है। क्या यह महज संयोग है, या फिर नीतिगत बदलावों निजी कंपनियों की जल्दबाज़ी, सस्ते आयात, और क्वालिटी कंट्रोल में समझौते का नतीजा है। गगनयान सिर्फ एक मिशन नहीं है, यह मानव जीवन से जुड़ा सवाल है। ऐसे में हर विफलता का ईमानदार पोस्ट-मॉर्टम जरूरी है। लेकिन जब डेटा दबाया जाएगा, आलोचना को देशद्रोह समझा जाएगा और असफलताओं को छोटा तकनीकी मसला बताकर टाल दिया जाएगा तो सवाल उठेगा ही कि क्या हम अंतरिक्ष में छलांग लगा रहे हैं, या अंधेरे में कूद रहे हैं?
पीएसएलवी-62: क्या, कैसे और कहां फेल हुआ
पीएसएलवी चार-चरणीय ठोस-ईंधन रॉकेट है, जिसकी पहचान उसकी स्थिरता और सटीकता रही है। 12 जनवरी को श्रीहरिकोटा से उड़ा पीएसएलवी-62 शुरुआती दो चरणों तक सामान्य रहा। लेकिन तीसरे स्टेज में नोजल लीकेज की सूचना मिली। नोजल से गैस रिसाव शुरू होते ही रॉकेट असंतुलित हुआ, तेजी से स्पिन करने लगा और नियोजित प्रक्षेप पथ से भटक गया। इसरो की टेलीमेट्री बताती है कि चौथे स्टेज में लगे एंटी-स्पिन थ्रस्टर्स सामान्यतः ऐसे हालात में स्थिरता बहाल कर देते हैं। लेकिन तीसरे स्टेज का स्पिन इतना तीव्र था कि चौथा स्टेज भी उसे संभाल नहीं सका। नतीजा पेलोड तय कक्षा से पहले ही मिशन समाप्त।
जांच जारी है लेकिन डेटा कहां?
हर असफल मिशन के बाद जांच होना स्वाभाविक है। लेकिन अस्वाभाविक यह है कि विस्तृत डेटा सार्वजनिक न किया जाए। वैज्ञानिक समुदाय जानता है कि असफलताओं से ही तकनीक परिपक्व होती है। पर 2020 के बाद से हुई विफलताओं में हर बार गोल-मोल बयान आए, पर विस्तृत निष्कर्ष सामने नहीं रखे गए।
अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, इस बार भी पीएमओ के निर्देश के बाद डेटा साझा करने पर रोक लगी। यदि ऐसा है, तो यह वैज्ञानिक स्वायत्तता के लिए खतरनाक मिसाल है।
निजीकरण तेजी या जल्दबाजी?
मोदी सरकार के कार्यकाल में इसरो के साथ निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ी। उद्देश्य था तेजी, लागत में कमी और व्यावसायिक विस्तार। लेकिन आलोचक कहते हैं कि क्वालिटी कंट्रोल की कीमत पर यह विस्तार हुआ। सूत्र बताते हैं कि पीएसएलवी-62 के तीसरे स्टेज का निर्माण न्यू स्पेस इंडिया से जुड़े सप्लाई-चेन में हुआ। यदि नोजल पैकिंग में खामी थी, तो यह सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं—प्रक्रियात्मक विफलता है। ठोस-ईंधन रॉकेट में नोजल लीकेज सबसे गंभीर जोखिमों में से एक माना जाता है। आठ महीने पहले पीएसएलवी-61 विफल रहा। तब भी तीसरे। चौथे चरण की स्थिरता पर सवाल उठे। क्या उन सबको लागू किया गया? यदि किया गया होता, तो एक ही प्रकृति की खामी दोहराई क्यों गई?
वैश्विक साख पर असर
इसरो की सफलता का बड़ा आधार उसका व्यावसायिक लॉन्च बाजार था। लगातार विफलताओं से विदेशी ग्राहक स्वाभाविक रूप से जोखिम आंकेंगे। बीमा प्रीमियम बढ़ेंगे, अनुबंध सख्त होंगे और कुछ ग्राहक वैकल्पिक एजेंसियों की ओर मुड़ सकते हैं। यह सिर्फ प्रतिष्ठा का नहीं, आर्थिक नुकसान का भी मामला है।
गगनयान समय, जोखिम और सच्चाई
मानव अंतरिक्ष उड़ान में विश्वसनीयता सर्वोपरि होती है। नासा, रोस्कोस्मोस और ईएसए जैसी एजेंसियाँ दर्जनों अनक्रूड (बिना मानव) परीक्षणों के बाद ही क्रूड मिशन करती हैं। यदि पीएसएलवी/जीएसएलवी परिवार में स्थिरता के सवाल हैं, तो गगनयान की समय-सीमा पर पुनर्विचार होना चाहिए। राजनीतिक घोषणाएं अक्सर वैज्ञानिक सावधानी पर भारी पड़ती हैं। यही चिंता सबसे बड़ी है।
लाइव टेलीकास्ट क्यों रोका गया?
लॉन्च का लाइव टेलीकास्ट रोकना तकनीकी कारणों से हो सकता है पर उसके बाद मीडिया से दूरी, सवालों से बचना और सीमित बयान देना संदेह बढ़ाता है। पारदर्शिता भरोसा बनाती है, चुप्पी नहीं। अन्य रक्षा-तकनीकी घटनाएं और पैटर्न आलोचक यह भी इंगित करते हैं कि पिछले वर्षों में रक्षा-एयरोस्पेस से जुड़ी कुछ घटनाओं में भी डेटा-कंट्रोल का पैटर्न दिखा। उद्देश्य चाहे नुकसान सीमित करना हो, लेकिन दीर्घकाल में यह सुधार की राह को बाधित करता है।
* पीएसएलवी-62 का तीसरा स्टेज नोजल लीकेज से फेल
* 2020 के बाद पांचवीं असफलता, लगातार दूसरी नाकामी
* लाइव टेलीकास्ट रोका गया, सूचना सीमित
* एंटी-स्पिन थ्रस्टर्स भी स्पिन नियंत्रित नहीं कर पाए
* निजीकरण, सप्लाई-चेन पर क्वालिटी सवाल
* पीएमओ के दबाव में डेटा दबाने के आरोप
* गगनयान की समय-सीमा और सुरक्षा पर प्रश्न
* वैश्विक व्यावसायिक साख को नुकसान का जोखिम




