ट्रंप को पटाने के लिये के लिए मुकेश अंबानी 13 करोड़ चढ़ाया, तब जाकर देश रूस से तेल खरीदने का परमिशन पाया
भाजपा ने इसे बताया था पीएम मोदी की विदेश नीति की बड़ी जीत, हार पहनाकर किया था सम्मान

* लेकिन पहली बार भारत की विदेश नीति अंबानी के 13 करोड़ के आगे हार गई
* अमेरिकी सीनेट में रखी रिपोर्ट, दिसंबर में रिलायंस ने दिए 7.60 लाख डॉलर
* अब अमेरिका में तेल रिफाइनरी लगाएगा रिलायंस, तेल बेचने की मिलेगी छूट

नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोलाल्ड ट्रंप ने इस माह जब ऐलान किया कि भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज टेक्सास में तेल रिफाइनरी लगाने के लिए 300 अरब डॉलर का निवेश करेगी, उससे कई महीने पहले ही मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने ट्रंप पर डोरे डालने के लिए 13 करोड़ रुपए फूंक दिए थे। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने रिलायंस इंडस्ट्रीज को रूस से तेल खरीदने की इजाजत दे दी थी।
अब एक विदेशी अखबार ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में यह सच सामने आया है। ब्लूमबर्ग ने यह रिपोर्ट अमेरिकी सीनेट के सामने पेश की गई एक रिपोर्ट के हवाले से दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 13 करोड़ में से 7.60 लाख डॉलर 31 दिसंबर 2025 को दिए। इसके बाद ही पांच मार्च को अमेरिका के वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रक ने रिलायंस को रूसी तेल खरीदने के लिए छूट दी। रिलायंस को यह छूट 4 अप्रैल 2026 तक के लिए दी गई थी। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने रिलायंस को यह छूट ईरान युद्ध के कारण हॉर्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत में पेट्रोल-डीजल की कमी को देखते हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए दी गई थी। इससे पहले अमेरिकी पाबंदी के कारण रिलायंस ने वेनेजुएला से तेल खरीदने की इच्छा जताई थी। बताया जाता है कि कंपनी की इसी इच्छा को देखते हुए अमेरिका ने बाद में पाबंदी उठा ली।



खोखला निकला भाजपा का दावा
इससे पहले रूस से तेल खरीद पर लगी अमेरिकी पाबंदी को हटाने के बाद भाजपा ने दावा किया था कि यह पीएम नरेंद्र मोदी की बड़ी जीत है। भाजपा ने इसे मोदी की कूटनीतिक जीत बताया था, जिसने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित किया। भाजपा ने अपने सांसदों के सम्मेलन में बाकायदा पीएम का हार पहनाकर स्वागत भी किया था। लेकिन अब ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में भाजपा का यह दावा खोखला निकला है। इससे पता चलता है कि रूस से तेल खरीद की अमेरिकी पाबंदी का हटना भारत की कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि रिलायंस इंडस्ट्री की 13 करोड़ की लॉबिंग थी। इससे यह भी सबित होता है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में विदेश नीति किस कदर नाकाम रही और एक कॉर्पोरेट सेक्टर की कंपनी ने किस तरह 13 करोड़ रुपए खर्च कर देश को तेल संकट से निजात दिला दिया। इस मामले पर केंद्र सरकार पर विपक्ष के सभी आरोप सही साबित हुए हैं, जिसने अमेरिका के आगे गिरवी रखी भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाए थे। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद में यह सवाल तब उठाया था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को रूसी तेल खरीद से रोक दिया था। राहुल गांधी ने सरकार से पूछा था कि अमेरिका होता कौन है भारत को यह सलाह देने वाला कि वह किससे तेल खरीदे और किससे नहीं? इसका मतलब यह हुआ कि पीएम मोदी ने भारत की विदेश नीति को अमेरिका के आगे सरेंडर कर दिया है।
फटाफट हुई तेल की खरीद
रिलांयस के 13 करोड़ खर्च के बदले जैसे ही अमेरिका ने उसे रूस से तेल खरीदने की परमिशन दी, अंबानी और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी इंडियन ऑयल ने झटपट रूस से 10 मिलियन बैरल तेल खरीद लिया। बाद में भारत की और भी रिफाइनरीज ने कुछ 30 मिलियन बैरल तेल की ऑन द स्पॉट खरीदारी की। इसमें यूराल, ईएसपीओ और वरांडे मार्क के तेल की खरीद की पुष्टि ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में की गई है। रूस ने 2 से 8 डॉलर ज्यादा भाव के साथ ये तेल भारतीय कंपनियों को बेचे। अमेरिकी पाबंद लगने से पहले भारत रूस से भारी डिस्काउंट पर तेल खरीदता था। यही हाल ईरान का भी था, जिसने भारत को तेल बेचने के लिए टैंकरों की बीमा राशि पर तो छूट दी ही थी, साथ ही पेट्रोल-डीजल का सारा परिवहन भी मुफ्त कर दिया था। लेकिन अमेरिका के इशारे पर भारत ने मारे डर के ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। लेकिन चीन उससे तेल खरीदता रहा और आज भी वह ईरान से तेल खरीदता है। लेकिन अब वही रूस भारत को कच्चे तेल के बाजार भाव से 8 डॉलर ज्यादा कीमत वसूल रहा है।
रिलायंस और अमेरिका की जोड़ी मजबूत
रूसी तेल के लिए अमेरिका में 13 करोड़ रुपए की लॉबिंग के बदले मिली छूट ने अब मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री और अमेरिका के बीच की जोड़ी को और मजबूत कर दिया है। इसी साल फरवरी में रिलायंस को वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए अमेरिका का लाइसेंस मिला था। यह लाइसेंस रिलायंस को रूसी तेल पर लगी पाबंदी के बदले मिला था। अमेरिका ने यह कहकर रूसी तेल पर पाबंदी लगाई थी कि इससे यूक्रेन के साथ जंग में रूस को मदद मिल रही है। उसके बाद 11 मार्च को राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐलान किया कि अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री 50 साल में पहली बार अमेरिका के टेक्सास में एक रिफाइनरी स्थापित करने के लिए 300 अरब डॉलर का निवेश करेगी। ट्रंप ने हालांकि, 300 अरब डॉलर की रकम बताई है, लेकिन माना जा रहा है कि रिलायंस इस रिफाइनरी पर 5 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश नहीं करेगा। रिलायंस ने अभी तक ट्रंप की घोषणा पर कोई जवाब नहीं दिया है और न ही अंतिम समझौते पर दस्तखत की तारीख बताई है। ब्लूमबर्ग का कहना है कि रूसी तेल खरीद की छूट लेने के बाद अब रिलायंस इंडस्ट्रीज अमेरिका का दुश्मन नहीं, बल्कि दोस्त बन गया है। अब टेक्सास में रिफाइनरी लगाकर रिलायंस अमेरिका से अगले 20 साल तक तेल खरीदकर बेचने का समझौता कर सकता है। माना जा रहा है कि यह इक्विटी समझौता होगा, जिसमें रिलायंस को रिफाइनरी से अपने हिस्से का तेल मनचाहे देशों में मुंहमांगी कीमत पर बेचने की छूट भी मिलेगी।



