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सुविधा साड़ी के सीए संजय गुप्ता ने भतीजे सौरभ के साथ मिलकर 70 लाख का किया खेल,भतीजा गया जेल संजय को पकड़ने में वाराणसी कमिश्नरेट हुआ फेल

‘सुविधा साड़ी’ में 70 लाख का खेल फर्जी फर्मों के जाल में फंसा मैनेजर, जमानत खारिज

  • जमानत याचिका खारिज, कोर्ट ने माना गंभीर आर्थिक अपराध
  • मैनेजर की कुर्सी से करोड़ों के खेल तक की कहानी
  • फर्जी फर्मों के जरिए 70 लाख की हेराफेरी का खुलासा, सीए की भूमिका पर भी उठे गंभीर सवाल
  • मालिक की सतर्कता से खुला गबन का बड़ा राज, फरारी, फोन बंद और बढ़ता शक
  • पुलिस जांच में सामने आया संगठित आर्थिक षड्यंत्र
  • व्यापारिक जगत में भरोसे पर चोट, सख्त कार्रवाई की मांग

वाराणसी। धर्मनगरी वाराणसी, जहां व्यापार और विश्वास का रिश्ता दशकों से एक-दूसरे के साथ जुड़ा रहा है, वहीं अब इसी भरोसे की नींव पर बड़ा सवाल खड़ा करने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। शहर की चर्चित फर्म सुविधा साड़ी में हुए 70 लाख रुपये के कथित गबन ने न केवल व्यापारिक जगत को हिलाकर रख दिया है, बल्कि यह भी उजागर कर दिया है कि किस तरह अंदरूनी तंत्र की कमजोरियों का फायदा उठाकर आर्थिक अपराधों को अंजाम दिया जा सकता है। इस मामले में आरोपित फर्म के पूर्व मैनेजर अकाउंटेंट सौरभ गुप्ता को अदालत से बड़ा झटका लगा है। अपर जिला जज षष्ठम आलोक कुमार की अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला साधारण वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक अपराध का है, जिसकी गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह प्रकरण केवल एक कर्मचारी द्वारा गबन करने का नहीं है, बल्कि इसमें फर्जी फर्मों का नेटवर्क, बैंकिंग प्रणाली का दुरुपयोग और पेशेवर सलाहकारों की कथित मिलीभगत जैसे कई जटिल पहलू शामिल हैं। प्राथमिकी और जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के अनुसार, आरोपी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कानपुर में तीन फर्जी फर्मों का निर्माण किया और बिना किसी वास्तविक लेन-देन के लाखों रुपये उन खातों में ट्रांसफर कर दिए। इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इसमें फर्म के चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि उन्होंने ही आरोपी मैनेजर की नियुक्ति की सिफारिश की और बाद में फर्जी फर्मों के निर्माण में सहयोग किया। यदि यह आरोप साबित होते हैं, तो यह पेशेवर नैतिकता और वित्तीय पारदर्शिता पर एक गंभीर चोट मानी जाएगी। व्यापारिक संस्थानों में मैनेजर और अकाउंटेंट जैसे पदों पर बैठे लोगों को अत्यधिक भरोसे के साथ जिम्मेदारी सौंपी जाती है। लेकिन जब यही भरोसा टूटता है, तो उसका असर केवल एक फर्म तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे व्यापारिक माहौल में अविश्वास की भावना पैदा हो जाती है। इस मामले में भी यही हुआ। जब फर्म के मालिक ने बैंक स्टेटमेंट की जांच की, तब जाकर इस पूरे गबन का खुलासा हुआ। इसके बाद आरोपी से पूछताछ की गई, लेकिन उसने टालमटोल शुरू कर दी और फिर अचानक फरार हो गया। अब जबकि अदालत ने जमानत अर्जी खारिज कर दी है, यह स्पष्ट संकेत है कि न्यायपालिका इस तरह के आर्थिक अपराधों को लेकर सख्त रुख अपना रही है। यह फैसला न केवल इस मामले के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उन सभी के लिए एक चेतावनी भी है, जो आर्थिक अपराधों को हल्के में लेते हैं।

भरोसे की नींव पर खड़ा था पूरा सिस्टम

वाराणसी के चर्चित सुविधा साड़ी गबन कांड ने यह साफ कर दिया है कि आर्थिक अपराध अब केवल बाहरी हमलों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि संस्थानों के भीतर ही पनप रहे हैं। यह मामला उस खतरनाक प्रवृत्ति को उजागर करता है, जिसमें भरोसे की आड़ में संगठित तरीके से वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया जाता है। अर्दली बाजार निवासी देवानंद सेवारमानी (सप्पू) का सुविधा साड़ी व्यवसाय स्थानीय स्तर पर एक प्रतिष्ठित नाम रहा है। वर्षों से चल रहे इस व्यापार में ग्राहकों और कर्मचारियों के बीच भरोसे का रिश्ता कायम था। इसी भरोसे के चलते 26 जनवरी 2020 को सौरभ गुप्ता को मैनेजर-अकाउंटेंट के पद पर नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति भी किसी सामान्य प्रक्रिया के तहत नहीं, बल्कि फर्म के चार्टर्ड अकाउंटेंट संजय कुमार गुप्ता की सिफारिश पर हुई थी। यहीं से कहानी की शुरुआत होती है जहां भरोसे की नींव पर एक ऐसा व्यक्ति बैठाया गया, जिसने बाद में उसी नींव को कमजोर कर दिया।
चेक साइन, लेकिन रकम और नाम पर नियंत्रण फर्म के संचालन की प्रक्रिया में एक बड़ी खामी यह थी कि चेक पर हस्ताक्षर तो मालिक करते थे, लेकिन उसमें फर्म का नाम, तारीख और रकम भरने की जिम्मेदारी सौरभ गुप्ता के पास थी। यही वह लूपहोल था, जिसका फायदा उठाकर आरोपी ने गबन की पूरी साजिश रची।

फर्जी फर्मों का जाल कानपुर बना ठिकाना

जांच में सामने आया कि सौरभ गुप्ता ने कानपुर में तीन फर्जी फर्में बनाई। ग्रीन सॉल्यूशन, स्काई लाइन वेव सॉल्यूशन, स्प्रिंट एशिया इन फर्मों का कोई वास्तविक व्यवसायिक अस्तित्व नहीं था। यह केवल कागजों पर बनाई गई संस्थाएं थीं, जिनका उद्देश्य केवल धन का ट्रांसफर करना था।

70 लाख का खेल बिना लेन-देन के ट्रांसफर

आरोप है कि इन फर्जी फर्मों के खातों में सुविधा साड़ी से लगभग 70 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए। यह ट्रांजेक्शन बिना किसी वास्तविक व्यापारिक लेन-देन के हुआ। यह एक सुनियोजित वित्तीय धोखाधड़ी का मामला है, जिसमें बैंकिंग सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया। बैंक स्टेटमेंट बना सबसे बड़ा सबूत
इस पूरे खेल का पर्दाफाश तब हुआ, जब फर्म के मालिक ने बैंक स्टेटमेंट की गहन जांच की। जैसे ही इन संदिग्ध ट्रांजेक्शनों का पता चला, पूरा मामला सामने आ गया।

पूछताछ, टालमटोल और फिर फरारी

जब सौरभ गुप्ता से इस बारे में पूछताछ की गई, तो उसने स्पष्ट जवाब देने के बजाय टालमटोल शुरू कर दी।
अगले ही दिन उसका फोन बंद हो गया और वह फरार हो गया।

सीए की भूमिका पेशेवर नैतिकता पर सवाल

इस मामले में सबसे गंभीर आरोप फर्म के चार्टर्ड अकाउंटेंट संजय गुप्ता पर है। आरोप है कि उन्होंने न केवल सौरभ गुप्ता की नियुक्ति करवाई, बल्कि फर्जी फर्मों के निर्माण में भी सहयोग किया। यदि यह आरोप साबित होते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं रहेगा, बल्कि यह एक संगठित आर्थिक षड्यंत्र बन जाएगा। पुलिस ने इस मामले में सौरभ गुप्ता, उसके पिता राजेश गुप्ता और सीए संजय गुप्ता समेत अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। जांच के दौरान यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस पूरे षड्यंत्र में और कौन-कौन शामिल था।

कोर्ट का सख्त रुख जमानत खारिज

अपर जिला जज (षष्ठम) आलोक कुमार की अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह गंभीर आर्थिक अपराध है। वादी पक्ष के अधिवक्ताओं अनुज यादव, आनंद तिवारी, पंकज, नरेश यादव और संदीप यादव ने इस मामले में जोरदार पैरवी की। यह मामला केवल एक फर्म तक सीमित नहीं है। यह पूरे व्यापारिक समुदाय के लिए एक चेतावनी है कि आंतरिक नियंत्रण और निगरानी कितनी जरूरी है। इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या व्यापारिक संस्थाएं अपने आंतरिक सिस्टम को मजबूत करेंगी, क्या पेशेवरों की जवाबदेही तय होगी या फिर ऐसे मामले यूं ही सामने आते रहेंगे।

* 70 लाख रुपये के गबन मामले में मैनेजर की जमानत खारिज
* फर्जी फर्मों के जरिए किया गया धन ट्रांसफर
* सीए की भूमिका भी जांच के दायरे में
* बैंक स्टेटमेंट से खुला पूरा मामला
* आरोपी फरार, पुलिस जांच जारी
* कोर्ट ने माना गंभीर आर्थिक अपराध
* व्यापारिक संस्थानों में आंतरिक नियंत्रण पर सवाल
* पेशेवर नैतिकता और जवाबदेही पर बहस तेज

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