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महिला सुरक्षा : कानून सख्त, बेटियां पस्त, दुष्कर्मी मस्त

बेटियां अब भी असुरक्षित क्यों?

 

भारत में महिलाओं की सुरक्षा आज केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि देश के सम्मान और व्यवस्था पर खड़ा एक गंभीर प्रश्न बन चुका है। हर दिन देश के किसी न किसी कोने से छेड़छाड़, उत्पीड़न, दुष्कर्म और घरेलू हिंसा जैसी घटनाएं सामने आती हैं, जो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर बेटियां सुरक्षित कहाँ हैं।
सरकारें लगातार महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करती हैं। सख्त कानून बनाए गए, हेल्पलाइन नंबर जारी किए गए, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए, और पुलिस प्रशासन को संवेदनशील होने के निर्देश भी दिए गए। इसके बावजूद जब कोई बेटी न्याय के लिए दर-दर भटकती है, तो यह केवल अपराधियों की नहीं बल्कि पूरे तंत्र की विफलता मानी जाती है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि कई मामलों में पीड़िता को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है। समाज उसकी आवाज सुनने के बजाय उसके चरित्र पर चर्चा करने लगता है। यही मानसिकता महिला सुरक्षा की सबसे बड़ी बाधा बनती जा रही है। जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा, तब तक केवल कानून बनाकर महिलाओं को सुरक्षित नहीं किया जा सकता।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर दिखाई देती है, जहाँ कई बेटियां डर और सामाजिक दबाव के कारण अपनी पीड़ा खुलकर बता भी नहीं पातीं। कई बार प्रभावशाली लोगों के दबाव में मामले दबा दिए जाते हैं और पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद छोड़ देता है। ऐसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि महिला सुरक्षा सिर्फ सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि ईमानदार क्रियान्वयन से संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिला सुरक्षा के लिए केवल पुलिस गश्त बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा, समाज में संवेदनशीलता, परिवार में सम्मानजनक संस्कार और न्याय प्रणाली में तेजी—इन सबकी एक साथ जरूरत है। जब तक महिलाओं को बराबरी का सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक सुरक्षा अधूरी रहेगी।
आज जरूरत इस बात की है कि महिला सुरक्षा को केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित न रखा जाए। हर बेटी को यह विश्वास होना चाहिए कि वह घर से बाहर निकले तो सुरक्षित लौटेगी। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी बेटियों की सुरक्षा से होती है।

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