Newspublicई-पेपरउत्तर प्रदेशराजनीतिलखनऊ

2024 की हार से भाजपा ने नहीं किया कोई सुधार, 2027 में अंतर्द्वंद्व भारी पड़ेगा सरकार

योगी को कमतर आंकने, क्षत्रिय नाराजगी और दिल्ली के फैसलों ने यूपी में बिगाड़ा भाजपा का गणित

  • 62 से 33 आंकड़ा नहीं, भाजपा के लिए खतरे की घंटी
  • दिल्ली में टिकट तय करने से गांव की नाराजगी नहीं समझी जा सकती
  • क्षत्रिय असंतोष की चिंगारी समय रहते बुझाने में नाकाम रही भाजपा
  • योगी को हटाने की चर्चा ने समर्थकों के मन में पैदा किया अविश्वास
  • 2022 में योगी की ताकत बनी, 2024 में उसी ताकत को नजरअंदाज करने का सवाल
  • 2027 में भाजपा को योगी से संघर्ष नहीं, योगी के साथ चुनावी संघर्ष करना होगा
  • 2024 का जनादेश सिर्फ हार-जीत नहीं, भाजपा के लिए चेतावनी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2024 का लोकसभा चुनाव महज 80 सीटों के परिणाम का नाम नहीं था। यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के उस राजनीतिक मॉडल की परीक्षा था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय लोकप्रियता, अमित शाह की चुनावी रणनीति, भाजपा का सांगठनिक ढांचा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रदेशव्यापी प्रभाव एक साथ चुनावी मैदान में उतरते हैं। परिणाम आया तो भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हुआ कि जिस उत्तर प्रदेश ने 2014 और 2019 में पार्टी को अभूतपूर्व ताकत दी थी, उसी प्रदेश में 2024 में ऐसा क्या बदल गया कि भाजपा 62 सीटों से घटकर 33 पर आ गई और समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। चुनाव में विपक्ष की रणनीति तभी सफल होती है जब सत्ता पक्ष के खिलाफ पर्याप्त असंतोष या भ्रम मौजूद हो। 2024 में उत्तर प्रदेश में यही दिखाई दिया। भाजपा की अपनी समीक्षा में भी कई कारण सामने आए। उत्तर प्रदेश भाजपा की रिपोर्ट, जिसे करीब 40 हजार कार्यकर्ताओं के फीडबैक के आधार पर तैयार बताया गया, में कार्यकर्ताओं की नाराजगी, अग्निवीर योजना, पेपर लीक और राजपूत समुदाय की नाराजगी जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया था। इसलिए 2024 के परिणाम को केवल अखिलेश की जीत या भाजपा की हार कह देना उस चुनाव की गहराई को कम करके देखना होगा। भाजपा की अपनी राजनीतिक मशीनरी में कहां चूक हुई और इसी सवाल का दूसरा सिरा योगी आदित्यनाथ तक पहुंचता है। 2017 में भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया था। उस समय मुख्यमंत्री पद पर उनकी नियुक्ति केंद्रीय नेतृत्व का निर्णय थी। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव ने योगी की राजनीतिक स्थिति को बदल दिया। उनके नेतृत्व में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। इसके बाद योगी को केवल केंद्रीय नेतृत्व द्वारा नियुक्त मुख्यमंत्री मानना राजनीतिक रूप से पर्याप्त नहीं रहा। वे अपने चुनावी प्रदर्शन और अलग राजनीतिक पहचान के आधार पर भाजपा के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं में शामिल हो चुके थे। यही कारण है कि 2024 के चुनाव में योगी को लेकर बना कोई भी राजनीतिक संदेश सीधे भाजपा के मूल समर्थक वर्ग तक पहुंचता था। चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने पर योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाएगा। यह दावा केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से किया था। योगी आदित्यनाथ ने इसका जवाब भी दिया और केजरीवाल के दावे को खारिज किया। लेकिन भाजपा के समर्थक वर्ग के एक हिस्से में सवाल यह बना रहा कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व इस मुद्दे पर उतनी स्पष्टता से क्यों नहीं उतरा, जितनी अपेक्षा की जा रही थी। राजनीति में कई बार जो कहा जाता है उससे अधिक प्रभाव उस बात का होता है जिसे लेकर भ्रम बना रहता है। यही भ्रम 2024 में भाजपा के लिए महंगा पड़ा।

 

62 से 33 का आंकड़ा नहीं, भाजपा के लिए खतरे की घंटी

2019 में उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में भाजपा ने 62 सीटें जीती थीं। 2024 में उसका आंकड़ा घटकर 33 रह गया। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी 2019 की पांच सीटों से बढ़कर 37 पर पहुंच गई। कांग्रेस भी एक से बढ़कर छह सीटों पर पहुंची। यह बदलाव इतना बड़ा था कि इसे सामान्य एंटी-इनकंबेंसी कहकर टाला नहीं जा सकता। भाजपा के लिए विशेष चिंता इसलिए भी थी क्योंकि यह वही उत्तर प्रदेश था जहां 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की थी और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की सत्ता पर कब्जा किया था। 2024 में भाजपा का मूल वोट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। उसने 33 सीटें जीतीं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से निर्वाचित हुए।

उम्मीदवार दिल्ली में तय होंगे तो गांव की नाराजगी कौन सुनेगा

2024 में भाजपा के उम्मीदवार चयन को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठे। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा रही कि दो दर्जन से अधिक सीटों पर यदि उम्मीदवार बदले जाते तो पार्टी बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी। यह कोई प्रमाणित चुनावी गणित नहीं, बल्कि चुनाव के बाद का राजनीतिक आकलन है। लेकिन इस बहस के पीछे असली मुद्दा उम्मीदवार नहीं, फीडबैक सिस्टम है।
क्या पार्टी ने प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को समझा।

समय रहते नहीं बुझी राजनीतिक चिंगारी

2024 में क्षत्रिय नाराजगी भाजपा के लिए गंभीर राजनीतिक संकेत थी। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि केवल क्षत्रिय वोटों की नाराजगी से भाजपा उत्तर प्रदेश में 29 सीटें हार गई। चुनाव इतने सरल समीकरण से नहीं जीते या हारे जाते। लेकिन यह भी उतना ही गलत होगा कि इस नाराजगी को महत्वहीन मान लिया जाए।
चुनाव के दौरान समुदाय के एक हिस्से में टिकट वितरण, प्रतिनिधित्व और अग्निवीर योजना सहित कई मुद्दों पर असंतोष सामने आया। भाजपा ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। अमित शाह ने समुदाय के नेताओं से संवाद किया और राजनाथ सिंह तथा योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं को भी संपर्क की भूमिका में इस्तेमाल किया गया। फिर भी चुनाव पूर्व आकलनों में उत्तर प्रदेश में भाजपा के क्षत्रिय समर्थन में गिरावट के संकेत मिले थे।
यहां असली सवाल यह है कि भाजपा को यह नाराजगी चुनाव के ठीक पहले क्यों दिखाई दी। यदि संगठन के पास मजबूत बूथ नेटवर्क और करोड़ों मतदाताओं तक पहुंच का दावा है, तो सामाजिक असंतोष का संकेत महीनों पहले क्यों नहीं मिला। राजनीति में नाराजगी अचानक पैदा नहीं होती। वह पहले फुसफुसाहट बनती है, फिर बातचीत बनती है, फिर स्थानीय बैठक बनती है और अंत में वोटिंग मशीन पर फैसला बन जाती है। 2024 में भाजपा के सामने यही चुनौती थी।

योगी को हटाने की चर्चा ने समर्थकों का मन तोड़ा

चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि यदि भाजपा सत्ता में लौटती है तो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि अमित शाह प्रधानमंत्री बनेंगे। योगी आदित्यनाथ ने इस पर पलटवार करते हुए केजरीवाल के दावे को खारिज किया था।
यहां तथ्य और राजनीतिक धारणा को अलग-अलग रखना जरूरी है। तथ्य यह है कि ऐसा दावा किया गया था। यह तथ्य नहीं है कि भाजपा की कोई ऐसी योजना थी। लेकिन चुनावी राजनीति में धारणा भी एक राजनीतिक तथ्य की तरह काम करती है। योगी समर्थकों के एक वर्ग ने इसे इस रूप में देखा कि क्या वास्तव में दिल्ली और लखनऊ के बीच सब कुछ सहज है। क्या योगी को केंद्रीय नेतृत्व से चुनौती है या 2024 के बाद उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। इन सवालों का जवाब पार्टी ने जिस स्तर की स्पष्टता से देना चाहिए था, उस पर राजनीतिक बहस बनी रही। यही वह बिंदु है जहां भाजपा के लिए सबक छिपा है। यदि पार्टी के सबसे लोकप्रिय क्षेत्रीय चेहरे को लेकर उसके अपने समर्थक असमंजस में पड़ जाएं, तो वह असमंजस विपक्ष के लिए राजनीतिक हथियार बन जाता है।

2027 भाजपा को योगी से संघर्ष नहीं, योगी के साथ संघर्ष करना होगा

2027 का विधानसभा चुनाव 2024 से बिल्कुल अलग होगा। लोकसभा में प्रधानमंत्री का चेहरा निर्णायक होता है। विधानसभा में मुख्यमंत्री का चेहरा अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। मतदाता विधायक को देखता है। स्थानीय प्रशासन को देखता है। कानून-व्यवस्था को देखता है।
सरकार के कामकाज को देखता है और सबसे महत्वपूर्ण यह देखता है कि राज्य की सत्ता किसके हाथ में होगी। ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही होगा कि उत्तर प्रदेश में वह किस चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरती है। यदि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को पार्टी अपनी ताकत के रूप में इस्तेमाल करती है, तो 2024 की कमजोरियों को 2027 की ताकत में बदला जा सकता है। लेकिन यदि 2024 के बाद भी केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व के बीच शक्ति-संतुलन का सवाल पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बना रहा, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान संगठन को होगा। भाजपा को यह तय करना होगा कि उत्तर प्रदेश में उसका लक्ष्य एक नेता को नियंत्रित करना है या एक मजबूत चुनावी मशीन को मजबूत करना।

* 2024 में भाजपा 62 से घटकर 33 सीटों पर पहुंची।
* समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ यूपी की सबसे बड़ी पार्टी बनी।
* भाजपा की अपनी समीक्षा में कार्यकर्ताओं की नाराजगी, अग्निवीर, पेपर लीक और राजपूत असंतोष जैसे मुद्दों का उल्लेख     हुआ।
* क्षत्रिय असंतोष को चुनाव से काफी पहले राजनीतिक संकेत के रूप में गंभीरता से लिया जाना चाहिए था।
* उम्मीदवार चयन में स्थानीय फीडबैक की भूमिका और मजबूत होनी चाहिए।
* योगी आदित्यनाथ को लेकर पैदा होने वाला नेतृत्व-संदेह भाजपा के अपने समर्थकों में भ्रम पैदा कर सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button