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ब्रजेश पाठक का बटुक पूजन के बहाने योगी पर निशाना,बाबा बिगाड़ देंगे डिप्टी सीएम का फ़साना

ब्राह्मण प्रेम या राजनीतिक प्रपंच? बृजेश पाठक की ‘चोटी राजनीति’ बनाम योगी का ‘माफिया मुक्त’ मॉडल

  • एक महीने बाद जागी संवेदना! माघ मेला प्रकरण ठंडा
  • पड़ने के बाद उपमुख्यमंत्री की ‘चोटी’ राजनीति क्यों?
  • 101 बटुक सम्मान समारोह संवेदना या सियासी संदेश?
  • यूजीसी नए रेगुलेशन पर सवर्ण असंतोष के बीच ब्राह्मण अस्मिता का मुद्दा उछालना सिर्फ संयोग?
  • योगी बनाम समानांतर ब्राह्मण चेहरा? सत्ता के भीतर शक्ति संतुलन की आहट।
  • कोरोना काल की ‘लीक’ चिट्ठी क्या तब भी असहज करने की कोशिश थी?
  • कृष्णानंद राय से लेकर माफिया दौर तक—तब चोटी पर चुप्पी क्यों?
  • माफिया मुक्त यूपी के बाद नई सियासी पटकथा?
  • क्या यह दिल्ली-लखनऊ समीकरण का संकेत है?

लखनऊ। सियासत में इन दिनों एक सवाल गूंज रहा है क्या उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक का ब्राह्मण प्रेम अचानक जागा है, या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है? माघ मेले में बटुकों के साथ हुए विवाद को एक महीना बीत चुका था। पुलिस और बटुकों के बीच हाथापाई की घटना पर तत्कालीन प्रशासनिक कार्रवाई भी हो चुकी थी। मामला ठंडा पड़ चुका था। लेकिन ठीक उसी समय उपमुख्यमंत्री का बयान आया कि बटुकों की चोटी खींचने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। इसके बाद उनके सरकारी आवास पर 101 बटुकों का सम्मान समारोह। सवाल उठना लाज़िमी है यह संवेदना है या सियासी रणनीति? प्रदेश की राजनीति में यह कोई रहस्य नहीं कि सत्ता के भीतर भी शक्ति संतुलन की लड़ाई चलती रहती है। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक यह चर्चा अक्सर सुनाई देती है कि भाजपा के कुछ नेता योगी आदित्यनाथ के बढ़ते कद से असहज हैं। योगी का ‘माफिया मुक्त’ अभियान, बुलडोजर मॉडल और प्रशासनिक सख्ती ने उन्हें एक अलग पहचान दी है। ऐसे में यदि कोई समानांतर ब्राह्मण चेहरा गढ़ने की कोशिश करता दिखे, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह भी संयोग नहीं कि इसी दौर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए रेगुलेशन को लेकर सवर्ण समाज में असंतोष की फुसफुसाहट सुनाई दी। देश का शीर्ष नेतृत्व नरेंद्र मोदी और अमित शाह के फैसलों पर सवाल उठ रहे थे। ऐसे समय में उपमुख्यमंत्री का ब्राह्मण अस्मिता के प्रतीकों ‘चोटी’ और ‘बटुक सम्मान’ को केंद्र में लाना क्या महज भावनात्मक प्रतिक्रिया है, या ध्यान भटकाने की कोशिश? आरोप यह भी है कि बृजेश पाठक अपने ही मुख्यमंत्री को असहज करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। कोरोना काल में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर प्रमुख सचिव को लिखी गई चिट्ठी, जो पहले मीडिया में पहुंची, ने भी यही संकेत दिया था। तब भी सवाल उठा कि क्या यह सुधार की मंशा थी या राजनीतिक संदेश? जब प्रदेश में माफिया जैसे मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो चुकी है, और कानून व्यवस्था को लेकर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, तब चोटी के मुद्दे पर अचानक उभरी संवेदनशीलता राजनीति की बिसात पर एक नई चाल तो नहीं? क्या यह ब्राह्मण सम्मान है, या सत्ता संतुलन की सियासी पटकथा? क्या उपमुख्यमंत्री एक वैकल्पिक चेहरा गढ़ रहे हैं, या शीर्ष नेतृत्व के संकेत पर सवर्ण समाज की नाराजगी को बांटने का प्रयास हो रहा है? और सबसे बड़ा प्रश्न क्या यह सब मुख्यमंत्री की छवि को चुनौती देने की कोशिश है?

माघ मेला प्रकरण एक महीने बाद जागी संवेदना

माघ मेले में पुलिस और कुछ बटुकों के बीच विवाद हुआ। प्रशासन ने अपनी कार्रवाई की। सरकार की ओर से कानून व्यवस्था को लेकर स्पष्ट रुख सामने आया। मामला धीरे-धीरे शांत हो गया। लेकिन ठीक एक महीने बाद उपमुख्यमंत्री का बयान बटुकों की चोटी खींचने वालों पर सख्त कार्रवाई हो राजनीतिक टाइमिंग पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। क्या यह देर से आई संवेदना थी? या फिर राजनीतिक परिस्थितियों के बदलते समीकरणों का परिणाम।

101 बटुक सम्मान समारोह संदेश किसे

सरकारी आवास पर 101 बटुकों का सम्मान यह केवल धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक सशक्त प्रतीकात्मक संदेश भी था। राजनीति में प्रतीक बहुत कुछ कहते हैं। ‘चोटी’ केवल बालों का गुच्छा नहीं, बल्कि परंपरा और ब्राह्मण अस्मिता का प्रतीक है।
ऐसे समय में जब प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त छवि स्थापित है, उपमुख्यमंत्री द्वारा अस्मिता आधारित राजनीति को सामने लाना क्या समानांतर नैरेटिव गढ़ने का प्रयास है?

यूजीसी रेगुलेशन और सवर्ण असंतोष

देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर शिक्षित वर्ग में बहस छिड़ी। सवर्ण समाज के कुछ वर्गों में असंतोष की चर्चा भी सामने आई। ऐसे समय में ब्राह्मण अस्मिता को केंद्र में लाने का अर्थ राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्या यह असंतोष को मोड़ने की रणनीति है। क्या यह संदेश है कि आपके सम्मान की आवाज हम उठा रहे हैं। जब देश का नेतृत्व नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेताओं के हाथ में है, तब प्रदेश स्तर पर इस तरह का अलग स्वर उभरना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विश्लेषण का विषय बनता है।

अतीत की घटनाएं चुप्पी क्यों

राजनीति में स्मृति चयनात्मक नहीं हो सकती। जब भाजपा नेता स्वर्गीय कृष्णानंद राय की हत्या के बाद चोटी काटे जाने की घटना सामने आई थी, तब इस तरह की मुखर प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई। पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे माफिया सक्रिय थे, तब ब्राह्मण अस्मिता के मुद्दे पर खुली सियासत क्यों नहीं दिखी। क्या उस समय राजनीतिक समीकरण अलग थे या आज समीकरण बदल गए हैं?

योगी मॉडल कानून बनाम प्रतीक

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माफिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। गैंगस्टर एक्ट, संपत्ति जब्ती, एनकाउंटर नीति इन कदमों ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को नई पहचान दी। आज जब प्रदेश को ‘माफिया मुक्त’ बताया जा रहा है, तब ‘चोटी’ के मुद्दे को केंद्र में लाना क्या कानून आधारित मॉडल से ध्यान हटाने की कोशिश है। योगी का नैरेटिव प्रशासनिक कठोरता पर आधारित है। बृजेश पाठक का हालिया नैरेटिव सांस्कृतिक प्रतीकों पर आधारित दिख रहा है।

कोरोना काल की चिट्ठी पुराना पैटर्न

कोविड काल में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर उपमुख्यमंत्री द्वारा लिखी गई चिट्ठी, जो पहले मीडिया में पहुंची उस समय भी आरोप लगा कि यह मुख्यमंत्री को असहज करने का प्रयास था। आज का घटनाक्रम क्या उसी राजनीतिक शैली की निरंतरता है। राजनीति में यह चर्चा लंबे समय से है कि भाजपा के भीतर भी नेतृत्व को लेकर आंतरिक संतुलन साधा जाता है। योगी आदित्यनाथ का राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता कद, उनकी जन स्वीकार्यता क्या कुछ लोगों को असहज करती है क्या समानांतर ब्राह्मण चेहरा गढ़ने की कोशिश उसी रणनीति का हिस्सा है या यह केवल प्रदेश की आंतरिक राजनीति का स्वाभाविक उतार-चढ़ाव है।

जनता का नजरिया

प्रदेश की जनता जातीय प्रतीकों से अधिक परिणाम देखती है। बिजली, सड़क, कानून व्यवस्था, निवेश ये मुद्दे प्रत्यक्ष हैं। यदि चोटी की राजनीति केवल प्रतीक बनकर रह जाती है और ठोस नीति में परिवर्तित नहीं होती, तो वह टिकाऊ नैरेटिव नहीं बन पाती। प्रदेश की राजनीति में यह टकराव केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो दृष्टिकोणों का प्रतीत होता है। एक तरफ कानून और प्रशासन आधारित सख्त शासन मॉडल, दूसरी तरफ सामाजिक-धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से पहचान की राजनीति। उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक का हालिया रुख उन्हें ब्राह्मण चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश माना जा सकता है। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि माफिया के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई करने वाले नेता की है। जबकि राजनीति का अंतिम निर्णय जनता करती है। प्रतीक और बयान क्षणिक हो सकते हैं, लेकिन शासन का मूल्यांकन परिणामों से होता है। फिलहाल प्रदेश की राजनीति में ‘चोटी’ और ‘कानून’ के बीच यह विमर्श आने वाले समय में और तीखा होने की संभावना है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह टकराव केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो शैलियों का है एक तरफ कठोर प्रशासनिक छवि वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दूसरी तरफ सामाजिक प्रतीकों के सहारे अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश करते उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक हैं। सवाल यह नहीं कि ब्राह्मण सम्मान होना चाहिए या नहीं सवाल यह है कि क्या यह सम्मान समय की जरूरत से प्रेरित है, या सियासी जरूरत से।

* माघ मेला प्रकरण के एक महीने बाद बटुक सम्मान समारोह राजनीतिक टाइमिंग पर सवाल।
* ब्राह्मण अस्मिता बनाम कानून व्यवस्था दो अलग राजनीतिक नैरेटिव।
* यूजीसी रेगुलेशन के बीच सवर्ण समाज में असंतोष की पृष्ठभूमि।
* अतीत की घटनाओं पर चुप्पी, वर्तमान में मुखरता—राजनीतिक संदर्भ बदला।
* योगी आदित्यनाथ का ‘माफिया मुक्त’ मॉडल बनाम प्रतीकात्मक राजनीति।
* सत्ता के भीतर संभावित शक्ति संतुलन की लड़ाई।

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