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पीछे छूटा गगनयान मिशन- इसरो के 120 से ज्यादा वैज्ञानिकों का इस्तीफा, अब अंबानी से लेंगे वजीफा

  • सरकारी वैज्ञानिकों से इंटरनेट चलवाएंगे अंबानी
  •  इसरो में इस्तीफों की सुनामी के बाद भारत के अंतरिक्ष मिशन को लगा ब्रेक
  •  प्राइवेट कंपनियों में ऊंची तनख्वाह और बेहतर हालात के लिए जा रहे हैं वैज्ञानिक
  •  मोदी सरकार ने इस्तीफों को रोकने लगाई पाबंदी, देखना है कितना असर होता है
  •  1600 उपग्रहों का जाल बिछाएंगे अंबानी, वैज्ञानिकों को तोड़ लिया

नई दिल्ली/बेंगलुरू। अमेरिका के अडानी, यानी कारोबारी एलन मस्क के साथ साझोदारी कर चुके भारत के नंबर 1 उद्योगपति मुकेश अंबानी के छलावे में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र इसरो के 120 से अधिक वैज्ञानिकों ने सरकारी नौकरी छोड़ दी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अंबानी धरती की निचली कक्षा में, यानी जतीन से 600 किमी ऊपर 1600 उपग्रह छोड़ने की तैयारी में हैं। इन्हें बनाने और इनकी निगरानी के लिए अंबानी को वैज्ञानिकों की जरूरत है। लिहाजा ज्यादा तनख्वाह का लालच देकर इन वैज्ञानिकों को सरकारी नौकरी छोड़कर अपने यहां आने को मजबूर किया गया है।

अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इसरो की कमजोरियों की जांच करने के बजाय संस्थान के वैज्ञानिकों को बिना सरकारी अनुमति के नौकरी छोड़ने पर पाबंदी लगा दी है। इसरो के वैज्ञानिकों के इतनी बड़ी संख्या में नौकरी छोड़ने से भारत के गगनयान मिशन और मंगलयान 3 प्रोजेक्ट को गहरा झटका लगा है।

जिओ के मिशन को मोदी सरकार ने सराहा

इस बीच, रिलायंस जियो के लगभग 1,600 लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजेने के प्रस्ताव को मोदी सरकार के इन स्पेस, इसरो और दूरसंचार विभाग ने तकनीकी रूप से पूरी तरह सही और एलन मस्क की स्टारलिंक के बराबर दमदार बताया है। इस फैसले से अब भारत का अंतरिक्ष में अपना खुद का पहला सैटेलाइट नेटवर्क तैयार होने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है। यह नेटवर्क देश की सुरक्षा और मिलिट्री की रणनीतिक जरूरतों के लिए बेहद जरूरी और मददगार साबित होगा। जियो ने भारत के लिए जितनी ज्यादा इंटरनेट स्पीड और डेटा ट्रांसफर करने की क्षमता देने की योजना बनाई है, वह देश के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी तैयारी है। जियो की योजना भारत में 4.5 से 5 टेराबिट प्रति सेकंड की इंटरनेट स्पीड देने की है। जबकि इसकी तुलना में एलन मस्क की स्टारलिंक के पास भारत में सिर्फ 600 गीगाबिट प्रति सेकंड की मंजूरी है और अमेजन भी 3 टीबीपीएस की योजना बना रही है, लेकिन उसे अभी तक इन स्पेस से मंजूरी मिलना बाकी है।

इसरो के कई बड़े स्पेस सेंटरों से वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लगातार इस्तीफे और वॉलंटरी रिटायरमेंट सामने आए हैं। अब तक 100 से 120 वैज्ञानिक संगठन छोड़ चुके हैं। इनमें अकेले यूआर राव सैटेलाइट सेंटर से करीब 80 और विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर से कम से कम 20 वैज्ञानिक शामिल हैं। सबसे अहम बात यह है कि इनमें कई ऐसे विशेषज्ञ भी हैं, जो गगनयान जैसे भारत के सबसे महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन पर काम कर रहे थे। लगातार बढ़ते इस्तीफों के बीच अंतरिक्ष अनुसंधान विभा ने 14 जुलाई को गगनयान और दूसरे अहम स्पेस मिशनों से जुड़े ‘ग्रुप ए’ वैज्ञानिकों के इस्तीफे या वीआरएस को अब सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं माना जाएगा। किसी सेंटर डायरेक्टर के पास अकेले इस्तीफा मंजूर करने का अधिकार नहीं होगा। हर आवेदन सीधे डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस भेजा जाएगा और अंतिम फैसला वहीं लिया जाएगा।

 

इसलिए हो रहे हैं इस्तीफे

मुकेश अंबानी के रिलायंस जैसे प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या भारत में तेजी से बढ़ रही है। इसरो के वैज्ञानिक वहां बेहतर मौकों और पैकेज की ओर रुख कर रहे हैं। अंतरिक्ष मिशनों का दबाव और पिछले कुछ समय में मिले झटकों ने भी वैज्ञानिकों का मनोबल प्रभावित किया है। खबरें हैं कि कई लोग काम से जुड़े मुद्दों और इंटरनल मैनेजमेंट से खुश नहीं हैं। संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, इसरो में काफी समय से स्टाफ की कमी चल रही है। वैज्ञानिक और तकनीकी डोमेन में स्वीकृत पदों के मुकाबले लोग कम हैं, जिससे काम का बोझ उन लोगों पर ज्यादा बढ़ गया है जो अभी वहां हैं।

 

 

टूटेगा मोदी का सपना

गगनयान मिशन भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन है। इसे लेकर प्रधानमंत्री मोदी का सपना बहुत बड़ा है। ऐसे में अगर प्रोजेक्ट के अहम लोग ही छोड़कर चले जाएंगे, तो काम की रफ्तार पर असर पड़ना लाजमी है। इसरो के पूर्व अधिकारी और एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल सरकारी आदेश जारी कर इस्तीफों को रोकना समाधान नहीं है, बल्कि एजेंसी को अपनी आंतरिक समस्याओं और स्टाफ की जरूरतों को गंभीरता से देखने की जरूरत है।

इसरो में इस्तीफे और चुनौती

श्रेणी स्थिति / जानकारी

अनुमानित इस्तीफे 100 – 120 (पिछले कुछ महीनों में)

प्रभावित सेंटर URSC और VSSC

सरकार का नया कदम इस्तीफे पर सख्त रोक, DoS की मंजूरी अनिवार्य

मुख्य कारण प्राइवेट सेक्टर में मौके, वर्क लोड, इंटरनल इश्यू

मौजूदा चुनौती स्टाफ की भारी कमी (साइंटिफिक डोमेन में करीब 11.5% खाली पद)

 

आगे क्या होगा?

इसरो ने अप्रैल 2026 से मार्च 2027 के बीच 13 स्पेस लॉन्च का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। लेकिन साल 2026 में अब तक सिर्फ एक लॉन्च हो सका और वह भी सफल नहीं रहा। ऐसे में एजेंसी के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ मिशनों की रफ्तार फिर से पटरी पर लानी है, तो दूसरी तरफ उन वैज्ञानिकों का भरोसा बनाए रखना है, जिनके दम पर भारत ने चांद से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी पहचान बनाई। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार का नया नियम अनुभवी वैज्ञानिकों के पलायन पर रोक लगा पाता है या नहीं। किसी भी स्पेस एजेंसी की असली ताकत सिर्फ उसके रॉकेट, सैटेलाइट या लॉन्च पैड नहीं होते, बल्कि उन्हें बनाने वाले वैज्ञानिक और इंजीनियर होते हैं। अगर यही लोग लगातार संगठन छोड़ने लगें, तो असर सिर्फ एक संस्थान पर नहीं, बल्कि देश के भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों पर भी पड़ सकता है। इसरो के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नए मिशन लॉन्च करना नहीं, बल्कि अपनी सबसे कीमती पूंजी, यानी अपने वैज्ञानिकों का भरोसा और मनोबल बनाए रखना भी है।

जितेंद्र सिंह बोले- लोग जाते हैं तो आते भी हैं

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इसरो द्वारा जारी किया गया नया निर्देश पूरी तरह प्रशासनिक कारणों से है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके पीछे किसी तरह का विवाद या असाधारण स्थिति नहीं है। मंत्री के अनुसार, इसरो में बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी कार्यरत हैं। समय-समय पर कुछ लोग संस्थान छोड़ते हैं तो नए विशेषज्ञ भी जुड़ते हैं। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण परियोजनाओं में अनुभवी वैज्ञानिकों की भूमिका को देखते हुए अब ऐसे मामलों में निर्णय उच्च स्तर पर अधिक सावधानी से लिया जाएगा। 14 जुलाई को जारी निर्देश में गगनयान और अन्य अहम मिशनों से जुड़े ग्रुप ‘A’ के वैज्ञानिक एवं तकनीकी कर्मचारियों के इस्तीफे या वीआरएस के आवेदन नियमित रूप से स्वीकार नहीं करने की बात कही गई थी।

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