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अमीरो का हजारों करोड़ का लोन माफ,किसान बेरोजगार नौजवान सबकी जिंदगी हो रही ‘साफ़’

22 हजार करोड़ की ‘हेयरकट’ पर राहुल का वार, शिक्षा पर खर्च का वादा करें, जनता का पैसा वापस लाएं

  • कर्जदार आम आदमी पर बैंक की सख्ती और बड़े कारोबारियों को राहत
  • ‘राइट ऑफ’ बनाम कर्ज माफी सरकार से पूछा सवाल, छात्रों और किसानों का कर्ज कब माफ होगा?
  • 22,006 करोड़ के कर्ज के महज 6.5 करोड़ में निपटारे के दावे पर सियासी घमासान
  • बैंकों से लेकर एलआईसी तक जनता के पैसे पर बहस, विपक्ष ने मांगा पूरा हिसाब
  • पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा संकट के बीच कर्ज राहत का मुद्दा युवाओं तक पहुंचाने की तैयारी
  • गेम बदलने का दावा अब ‘बातें ही बातें’ नहीं, शिक्षा, रोजगार और हिसाब मांग रही नई पीढ़ी

(शकील अख्तर) । देश की अर्थव्यवस्था, शिक्षा और युवाओं के भविष्य को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच 22 हजार करोड़ रुपये के कथित कर्ज निपटारे ने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसे अब नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। जनता के पैसे से बड़े कर्जदारों को राहत मिल सकती है तो छात्रों, किसानों और मध्यम वर्ग के कर्ज पर वही दरियादिली क्यों नहीं? विपक्ष की ओर से उठाई जा रही इस बहस का सबसे सीधा राजनीतिक जवाब यह हो सकता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सार्वजनिक रूप से वादा करें कि यदि बड़े कारोबारी कर्ज के किसी मामले में जनता के पैसे का नुकसान हुआ है तो उसकी पूरी वसूली कराई जाएगी और वसूली गई राशि शिक्षा व्यवस्था पर खर्च होगी। जिस 22,006 करोड़ रुपये के कर्ज के निपटारे को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उसमें महज 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान पर मामला निपटाने का दावा किया गया है। हालांकि ‘राइट ऑफ’, ‘सेटलमेंट’ और वास्तविक कर्ज माफी के बीच कानूनी एवं वित्तीय अंतर है, लेकिन राजनीतिक सवाल अपनी जगह बेहद तीखा है। क्या जनता के पैसे की कीमत समान है? आम आदमी की ईएमआई रुकने पर बैंक नोटिस, रिकवरी एजेंट और संपत्ति जब्ती तक की कार्रवाई कर सकते हैं, जबकि बड़े कर्जदारों के मामले में भारी कटौती के साथ समझौता क्यों? इसी सवाल को शिक्षा और युवाओं से जोड़ना विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है। देश में छात्र पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा और सीमित अवसरों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे समय में यदि राहुल गांधी यह मुद्दा उठाते हैं कि बड़े कर्ज की वसूली कर शिक्षा पर पैसा लगाया जाए, तो यह बहस सीधे उस नई पीढ़ी से जुड़ सकती है जो अब नारों से ज्यादा अपने भविष्य का हिसाब मांग रही है।

जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा

बड़ा सवाल सिर्फ 22 हजार करोड़ रुपये का नहीं है।
सवाल यह है कि यह पैसा आखिर किसका है?
बैंकों में जमा पैसा जनता का है। वित्तीय संस्थाओं में लगा पैसा जनता की बचत से जुड़ा है। एलआईसी में निवेश करने वाले करोड़ों पॉलिसीधारक आम परिवारों से आते हैं। ऐसे में किसी बड़े कर्जदार के कर्ज में भारी कटौती या समझौता होता है तो उसका असर केवल बैंक की बैलेंस शीट तक सीमित नहीं रहता। उसका सवाल अंततः जनता की जेब तक पहुंचता है। यही वजह है कि विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश कर सकता है। सवाल बिल्कुल सीधा है अगर जनता का पैसा है तो जनता को हिसाब भी मिलना चाहिए।

22,006 करोड़ से 6.5 करोड़ तक का सवाल

जिस मामले को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ी है, उसमें 22,006 करोड़ रुपये के कथित बकाये के मुकाबले महज 6.5 करोड़ रुपये में समझौते का दावा किया गया है। यदि ये आंकड़े और कानूनी प्रक्रिया उसी रूप में सही हैं जैसा दावा किया जा रहा है, तो अंतर इतना बड़ा है कि स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे। लेकिन यहां एक वित्तीय तथ्य समझना भी जरूरी है। राइट ऑफ का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि कर्जदार का पूरा कानूनी दायित्व समाप्त हो गया। बैंकिंग व्यवस्था में राइट ऑफ का इस्तेमाल खराब ऋण को खातों से हटाकर बैलेंस शीट को साफ करने के लिए किया जाता है, जबकि वसूली की प्रक्रिया अलग से जारी रह सकती है। इसके बावजूद सवाल बना रहता है, जब किसी मामले में वास्तविक वसूली बेहद कम रकम पर होती है, तो जनता को यह जानने का अधिकार क्यों न हो कि बैंक को कितना नुकसान हुआ, किस प्रक्रिया से समझौता हुआ और जिम्मेदारी किसकी थी।

आम आदमी की ईएमआई और बड़े कर्जदारों का ‘सेटलमेंट’

एक नौकरीपेशा व्यक्ति की ईएमआई कुछ महीनों तक नहीं जाती तो फोन आने लगते हैं। नोटिस आते हैं। रिकवरी एजेंट पहुंचते हैं। गाड़ी का लोन है तो वाहन जब्त हो सकता है। मकान का कर्ज है तो संपत्ति पर कार्रवाई हो सकती है। किसान के मामले में भी बैंक और वित्तीय संस्थाएं वसूली के लिए कानूनी रास्ते अपनाती हैं। फिर सवाल उठता है कि जब छोटे कर्जदार के लिए नियम इतने कठोर हैं तो बड़े कर्जदारों के मामले में हजारों करोड़ की देनदारी को बड़े डिस्काउंट पर निपटाने की प्रक्रिया इतनी आकर्षक क्यों दिखाई देती है?
यहीं से ‘सिस्टम सबके लिए बराबर है या नहीं’ का सवाल पैदा होता है। राइट ऑफ की असली तस्वीर जनता के सामने आए। सरकार का पक्ष यह रहा है कि राइट ऑफ बैंकिंग व्यवस्था का हिस्सा है और इससे बैंकों की बैलेंस शीट सुधरती है। यह वित्तीय दृष्टि से एक तकनीकी प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन आम नागरिक के लिए सवाल तकनीकी शब्दों से आगे का है। अगर बैंक किसी कंपनी का कर्ज राइट ऑफ करते हैं तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि उसमें से कितना पैसा बाद में वसूल हुआ। कितने मामलों में संपत्ति बेची गई, कितने मामलों में प्रमोटरों से पैसा वसूला गया? कितने मामलों में समझौता हुआ, बैंक को कितना वास्तविक नुकसान हुआ। सबसे महत्वपूर्ण क्या आम आदमी के लिए भी ऐसी ही व्यवस्था उपलब्ध है। छात्रों के कर्ज का सवाल क्यों नहीं, यही बहस शिक्षा तक पहुंचती है। एक छात्र उच्च शिक्षा के लिए एजुकेशन लोन लेता है। उसे उम्मीद होती है कि पढ़ाई पूरी होगी, नौकरी मिलेगी और वह कर्ज चुका देगा। लेकिन यदि नौकरी नहीं मिलती तो ईएमआई कैसे चुकाए? यदि बेरोजगारी बढ़ती है तो शिक्षा ऋण का बोझ परिवार पर पड़ता है। ऐसे में सरकार से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि पिछले वर्षों में कितने शिक्षा ऋण राइट ऑफ हुए? कितने छात्रों को राहत मिली? कितने मामलों में ब्याज माफ हुआ? यही सवाल किसानों और मध्यम वर्ग पर भी लागू होता है। यदि आर्थिक संकट में बड़े कारोबारी कर्ज का पुनर्गठन या समझौता हो सकता है, तो छोटे कर्जदारों के लिए भी पारदर्शी और न्यायपूर्ण राहत व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?

22 हज़ार करोड़ शिक्षा में लगे तो बदलेगी तस्वीर

यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी के लिए एक राजनीतिक प्रतिज्ञा का प्रस्ताव सामने आता है। बड़े कर्जदारों से जनता का पैसा वापस लाने की कोशिश और उस धन को शिक्षा में लगाने का वादा। यह वादा केवल राजनीतिक नारा नहीं होगा। इसका मतलब होगा नए सरकारी स्कूल, पुराने स्कूलों की मरम्मत, बेहतर प्रयोगशालाएं, डिजिटल शिक्षा, शिक्षकों की नियुक्ति, छात्रवृत्ति, गरीब छात्रों के लिए उच्च शिक्षा और सबसे महत्वपूर्ण युवाओं को यह संदेश कि सार्वजनिक धन का पहला अधिकार जनता के बच्चों का है। यदि किसी मामले में कानूनन वसूली संभव है तो पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से हो और वसूली गई धनराशि का इस्तेमाल सार्वजनिक शिक्षा में किया जाए।

1969 से आज तक बदलता आर्थिक दर्शन

भारत के आर्थिक इतिहास में 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण एक बड़ा मोड़ था। इंदिरा गांधी सरकार के बैंक राष्ट्रीयकरण का तर्क यही था कि बैंकिंग व्यवस्था को व्यापक सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों से जोड़ा जाए और वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल देश के विकास के लिए हो। पांच दशक से अधिक समय बाद, बहस एक अलग सवाल पर है। क्या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और वित्तीय संस्थाएं बड़े कर्जदारों के जोखिम का बोझ जनता पर डाल सकते हैं। यहां राजनीतिक दलों को नारे से ज्यादा स्पष्ट आर्थिक नीति सामने रखनी होगी। यह सिर्फ एक केस नहीं, पारदर्शिता की मांग है। 22 हजार करोड़ का मामला यदि राजनीतिक बहस का केंद्र बनता है तो सरकार को केवल यह कहकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए कि यह बैंकिंग प्रक्रिया है।नजनता को पूरी प्रक्रिया समझाई जानी चाहिए, कर्ज कितना था, किस संस्था ने दिया, सुरक्षित और असुरक्षित संपत्तियां कितनी थीं, कितनी वसूली हुई, समझौता किस आधार पर हुआ, बैंक को कितना नुकसान हुआ और क्या भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए कोई जवाबदेही तय हुई। इन्हीं सवालों से वित्तीय पारदर्शिता मजबूत होगी। अब नई पीढ़ी को ‘बातें’ नहीं, भविष्य चाहिए राजनीति में एक दौर ऐसा था जब बड़े-बड़े वादे ही चुनावी हथियार बन जाते थे। यही वजह है कि छात्रों और युवाओं के आंदोलनों को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज करना आसान नहीं होगा। नई पीढ़ी के सामने सवाल अब सीधे हैं। स्कूल कैसा होगा, कॉलेज की फीस कितनी होगी, नौकरी कब मिलेगी, कर्ज कैसे चुकाएंगे और जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा।

गेम बदलने का दावा

राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा बदलाव यही है कि अब विपक्ष केवल सरकार की आलोचना करके नहीं, बल्कि वैकल्पिक वादे करके जनता के बीच जाने की कोशिश कर रहा है। यदि राहुल गांधी यह कहते हैं कि बड़े कर्जदारों से कानून के मुताबिक पूरी वसूली कराई जाएगी और सार्वजनिक धन की वसूली कर शिक्षा पर लगाया जाएगा, तो यह चुनावी घोषणा से ज्यादा एक नीति-प्रतिज्ञा बन सकती है। लेकिन इसके लिए सिर्फ भाषण पर्याप्त नहीं होगा। इन सबसे बढ़कर वसूली का वास्तविक परिणाम चाहिए। जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि सत्ता में आने के बाद यह वादा फाइलों में नहीं दबेगा।

* 22,006 करोड़ रुपये के कथित कर्ज निपटारे ने सार्वजनिक धन पर बहस तेज की।
* महज 6.5 करोड़ रुपये में सेटलमेंट के दावे की स्वतंत्र वित्तीय जांच और पूरा विवरण जरूरी।
* ‘राइट ऑफ’ और कानूनी कर्जमाफी में अंतर को जनता के सामने स्पष्ट करना होगा।
* बैंकों को हुए वास्तविक नुकसान और बाद में हुई वसूली का पूरा आंकड़ा सार्वजनिक होना चाहिए।
* छात्रों, किसानों और मध्यम वर्ग के कर्जदारों के लिए समान राहत व्यवस्था का सवाल।
* बड़े कर्जदारों से वैधानिक वसूली कर शिक्षा में निवेश का प्रस्ताव विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है।
* सरकारी स्कूलों, शिक्षकों, छात्रवृत्ति और उच्च शिक्षा में वसूली गई धनराशि लगाने की मांग।
* बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने की जरूरत।
* नई पीढ़ी अब नारों के बजाय शिक्षा, रोजगार और आर्थिक न्याय का हिसाब चाहती है।
* जनता के पैसे की सुरक्षा किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

 

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