
- ‘छात्रों की गूंज’ में राहुल गांधी ने राजनीतिक बहस की दिशा बदली, महिला बराबरी को बनाया केंद्र
- ‘मां-बहन-बेटी’ से आगे अपनी पहचान की लड़ाई, नई पीढ़ी से राहुल का सीधा संवाद
- महिला सशक्तीकरणथ के नारों से आगे निकला सवाल पूछा, हिंदुस्तान में महिला होने के क्या मायने
- पितृसत्ता पर सीधे प्रहार के सा भाजपा-संघ की विचारधारा को घेरने की कोशिश

- पेपर लीक और बेरोजगारी के बाद महिला अधिकारों को राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में लाए राहुल
- नई पीढ़ी के सामने नया संघर्ष बराबरी का संविधान या सदियों पुरानी सामाजिक गैरबराबरी

पुणे में 22 अगस्त को कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम ने भारतीय राजनीति की उस बहस को छेड़ दिया, जिसे राजनीतिक दल अक्सर महिला सशक्तीकरण के नारों तक सीमित कर देते हैं। कार्यक्रम की घोषणा से ही राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया था कि यहां लड़कियां बोलेंगी और बाकी लोग सुनेंगे। यह महज कार्यक्रम की प्रचार रणनीति नहीं थी, बल्कि पूरी पहल का केंद्रीय विचार था। पुणे पहुंचने से पहले राहुल ने महिलाओं से एक सवाल पूछा कि हिंदुस्तान में महिला होने के क्या मायने हैं? सवाल सरल था, लेकिन इसके जवाबों ने लैंगिक असमानता, पितृ सत्ता और महिलाओं की स्वतंत्र पहचान जैसे मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया। राहुल गांधी ने मंच पर लड़कियों को बुलाकर उनकी रोजमर्रा की परेशानियां सुनीं और महिला होने के अनुभव को महज मां, बहन, बेटी या पत्नी की पारंपरिक पहचान से बाहर देखने की कोशिश की। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में महिलाओं की बराबरी को संविधान के मूल विचार से जोड़ते हुए पितृ सत्तात्मक सोच पर सवाल उठाए। भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं के पुराने विवादित बयानों के वीडियो दिखाकर राहुल ने पूछा कि महिलाओं के प्रति समाज की मानसिकता आखिर बदल क्यों नहीं रही। उनका सबसे तीखा राजनीतिक हमला उस समय सामने आया जब उन्होंने कहा कि देश को ‘मनुस्मृति वाला हिंदुस्तान’ नहीं चाहिए। इस एक वाक्य के साथ राहुल ने महिला अधिकारों की बहस को सीधे संविधान, सामाजिक बराबरी और भाजपा-संघ की वैचारिक राजनीति से जोड़ दिया।
राहुल ने सवाल नहीं, राजनीतिक आईना सामने रखा
‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने जो तरीका अपनाया, उसकी खासियत यह रही कि उन्होंने महिलाओं के बारे में भाषण देने के बजाय महिलाओं को बोलने का अवसर दिया। यही फर्क इस कार्यक्रम को सामान्य राजनीतिक सभा से अलग करता है। महिला सशक्तीकरण पर देश में वर्षों से भाषण होते रहे हैं। सरकारें योजनाएं बनाती हैं। राजनीतिक दल महिलाओं के लिए घोषणाएं करते हैं। चुनाव के दौरान ‘नारी शक्ति’, ‘मातृशक्ति’, ‘बहनों’ और ‘लाड़ली बहनों’ जैसे संबोधनों की भरमार रहती है। लेकिन राहुल गांधी ने सवाल को दूसरी दिशा में मोड़ा। उन्होंने मूल प्रश्न रखा कि एक महिला की स्वतंत्र पहचान क्या है? क्या वह केवल किसी की मां, बेटी, पत्नी और किसी की बहन है, या इन रिश्तों से परे भी उसका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व, अधिकार और अस्तित्व है? यही वह सवाल है जिसने पुणे के मंच को राजनीतिक विमर्श का मंच बना दिया।
हंसा मेहता से राहुल तक बराबरी की बहस
महिला बराबरी के संदर्भ में भारत के संविधान के सामाजिक सुधार की परंपरा का उल्लेख किए बिना यह बहस पूरी नहीं होती। 1948 में संयुक्त राष्ट्र की सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा के प्रारूप में लैंगिक भाषा को लेकर भारतीय प्रतिनिधि हंसा मेहता ने महत्वपूर्ण आपत्ति उठाई थी। उनके हस्तक्षेप के बाद ‘सभी पुरुष’ की जगह ऐसी भाषा को स्वीकार किया गया जिसका अर्थ सभी मनुष्यों की समानता से जुड़ा था। यह सिर्फ शब्दों का बदलाव नहीं था। यह उस विचार का प्रतिनिधित्व था कि मानवाधिकार किसी एक लिंग की संपत्ति नहीं हैं। राहुल गांधी ने पुणे में इसी विचारधारा को आज की राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ने की कोशिश की, कहा बराबरी किसी सरकार की कृपा नहीं, अधिकार है।
भाजपा-संघ के बयानों को बनाकर बनाया राजनीतिक हथियार
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं के पुराने बयानों और वीडियो क्लिपों का इस्तेमाल किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत और पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से जुड़े महिलाओं और बलात्कार के संदर्भ वाले विवादित बयानों को सामने रखकर सवाल उठाया कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं को लेकर राजनीतिक नेतृत्व की भाषा कैसी होनी चाहिए। इन बयानों को सामने रखने का उनका उद्देश्य केवल पुराने विवादों को दोहराना नहीं था। राहुल ने इन्हें एक बड़े सवाल से जोड़ा कि क्या महिलाओं को लेकर समाज की मानसिकता वास्तव में बदली है। जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन के संदर्भ में भी उन्होंने सवाल उठाया कि महिलाओं और पुरुषों के व्यवहार को लेकर राजनीतिक नेतृत्व का पैमाना अलग क्यों हो जाता है। यही वह जगह थी जहां राहुल ने व्यक्तिगत बयानों को व्यापक सामाजिक मानसिकता से जोड़ने की कोशिश की।
‘मनुस्मृति वाला हिंदुस्तान नहीं चाहिए’ सबसे तीखा संदेश
राहुल गांधी के भाषण का सबसे राजनीतिक हिस्सा वह था जब उन्होंने पितृसत्तात्मक सोच को ‘मनुस्मृति वाले हिंदुस्तान’ से जोड़ा। यह कोई सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी। भारत के राजनीति में संविधान बनाम मनुस्मृति की बहस पुरानी है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मनुस्मृति की सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की थी और आधुनिक भारत के लिए समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था को महत्व दिया। राहुल गांधी ने इसी वैचारिक टकराव को नई पीढ़ी और महिला अधिकारों के सवाल से जोड़ दिया। उनका संदेश साफ था कि भारत का भविष्य बराबरी पर संविधान तय करेगा या सामाजिक गैरबराबरी की पुरानी धारणाएं। यही प्रश्न अब भाजपा के सामने खड़ा किया जा रहा है।
भाजपा के लिए चुनौती सवालों का जवाब नारे से नहीं मिलेगा
भाजपा की राजनीति का बड़ा हिस्सा हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों के इर्द-गिर्द रहा है। राहुल गांधी अब बहस को दूसरी जमीन पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा, युवाओं का भविष्य, महिलाओं की बराबरी, संवैधानिक अधिकार ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध रोजमर्रा की जिंदगी से है। जो भाजपा के सामने चुनौती कठिन हो जाती है। धार्मिक या सांस्कृतिक मुद्दों का जवाब राजनीतिक नारों से दिया जा सकता है। लेकिन जब सवाल किसी लड़की की शिक्षा, नौकरी, सुरक्षा, स्वतंत्र पहचान और बराबरी का हो तो जवाब भावनात्मक नारे से नहीं दिया जा सकता। वहां ठोस नीति और ठोस जवाब चाहिए।
जेन-जी और जेन-अल्फा के बीच नई राजनीतिक भाषा
राहुल गांधी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वे नई पीढ़ी से सीधे संवाद की कोशिश कर रहे हैं। नई पीढ़ी पुराने राजनीतिक नारों से अलग सवाल पूछ रही है। उसे रोजगार, उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, इंटरनेट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लड़कियों को बराबरी चाहिए। यही कारण है कि ‘छात्रों की गूंज’ जैसा कार्यक्रम केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहता। यह नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को राजनीतिक विमर्श में जगह देने की कोशिश बन जाता है। अब लड़ाई मुद्दों की जमीन पर होगी। राहुल गांधी का पुणे प्रयोग भाजपा के सामने एक अलग तरह की राजनीतिक चुनौती खड़ी करता है। अगर भाजपा महिला बराबरी के सवाल का समर्थन करती है तो उसे संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को मजबूती से स्वीकार करना होगा। अगर वह राहुल गांधी की बात का विरोध करती है तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि महिला समानता पर उसकी अपनी वैचारिक स्थिति क्या है। यही वह राजनीतिक ‘जाल’ है जिसे राहुल गांधी ने बिछाने की कोशिश की है। मुद्दा यह नहीं कि राहुल गांधी ने भाजपा को घेरा, मुद्दा यह है कि उन्होंने बहस का सवाल बदल दिया। उन्होंने पूछा महिला को वोटर के रूप में देखते हैं या बराबर नागरिक के रूप में, यह सवाल जितना सरल है, राजनीतिक रूप से उतना ही विस्फोटक भी।
असली संघर्ष बराबरी की सोच बनाम पितृ सत्ता
भारत की लड़ाई केवल राजनीतिक सत्ता की लड़ाई नहीं है। यह सामाजिक सोच की भी लड़ाई है। कानून बराबरी दे सकता है, लेकिन समाज को बराबरी स्वीकार करनी होगी। संविधान अधिकार दे सकता है, लेकिन परिवार और संस्थानों को उन अधिकारों को व्यवहार में उतारना होगा। महिला के लिए सुरक्षा कानून बन सकते हैं, लेकिन उसकी स्वतंत्रता को लेकर समाज की मानसिकता भी बदलनी होगी। राहुल गांधी ने पुणे में इसी सामाजिक मानसिकता को राजनीतिक प्रश्न बनाया। अब यह भाजपा के लिए केवल राहुल गांधी का सवाल नहीं रह गया है। यह सवाल नई पीढ़ी का है और नई पीढ़ी से पूछे गए सवालों का जवाब पुरानी राजनीतिक शब्दावली में देना आसान नहीं होगा।
* ‘छात्रों की गूंज’ में लड़कियों को बोलने और नेताओं को सुनने का मंच दिया गया।
* ‘हिंदुस्तान में महिला होने के क्या मायने हैं?’ सवाल को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया गया।
* महिला की पहचान को मां, बहन, बेटी और पत्नी के रिश्तों से बहस का हिस्सा बनाया।
* ‘मनुस्मृति वाला हिंदुस्तान नहीं चाहिए’ कहकर संविधान बनाम सामाजिआगे देखने पर जोर।* हंसा मेहता के समानता संबंधी ऐतिहासिक हस्तक्षेप का संदर्भ।
* भाजपा-संघ नेताओं के पुराने विवादित बयानों को राहुल ने राजनीतिकक गैरबराबरी की बहस तेज की।
* पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा के साथ महिला अधिकारों को जोड़ा।
* नई पीढ़ी के सामने रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और बराबरी को प्रमुख मुद्दा बनाया।
* भाजपा के सामने महिला सशक्तीकरण के नारों से आगे ठोस जवाब देने की चुनौती।
* राजनीतिक संघर्ष को सांप्रदायिक मुद्दों से हटाकर रोजमर्रा के सवालों पर लाने की कोशिश।




