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कम्पोजिट विद्यालय ठेकहां के प्रकरण में सचिन कुमार साथ,जांच का क्या होगी खाक

बीएसए चन्दौली का गोल माल

  • एक महीने बाद जांच करने पहुंची टीम, फिर भी कार्रवाई का इंतजार!
  • कंपोजिट विद्यालय ठेकहां प्रकरण में जांच की धीमी रफ्तार पर उठे सवाल,
  • निरीक्षण में कमियां मिलने के दावे के बाद भी अंतिम कार्रवाई का इंतजार

चकिया, चंदौली। बेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय विद्यालयों में व्यवस्था सुधारने और शिक्षण व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए शासन स्तर से लगातार निर्देश जारी किए जा रहे हैं, लेकिन शहाबगंज विकासखंड के कंपोजिट विद्यालय ठेकहां का मामला विभागीय कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर रहा है। विद्यालय से जुड़ी शिकायतों और समाचार प्रकाशन के बाद जांच टीम गठित की गई, लेकिन शिकायतकर्ताओं के अनुसार टीम को विद्यालय तक पहुंचने में करीब एक महीने का समय लग गया। अब जांच के दौरान कई बिंदुओं पर कमियां मिलने की बात जांच अधिकारियों द्वारा कही जा रही है, इसके बावजूद अंतिम कार्रवाई सामने नहीं आने से सवाल और गहरे हो गए हैं।

शिकायतों से शुरू हुआ मामला, अब कार्रवाई का इंतजार

विद्यालय में प्रधानाध्यापक की कथित अनुपस्थिति, विद्यालय संचालन, वित्तीय अभिलेख, इको क्लब, मध्यान्ह भोजन योजना यानी एमडीएम और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि किसी विद्यालय के संबंध में लगातार शिकायतें मिल रही हों तो विभाग को तत्काल मौके पर निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति की जांच करनी चाहिए। उनका आरोप है कि इस मामले में शिकायतों के बावजूद कार्रवाई की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी रही।

हालांकि, इन आरोपों की वास्तविकता विभागीय जांच और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ही तय की जा सकती है।

16 मई की खबर के बाद बीएसए ने दिया था कार्रवाई का भरोसा

बताया जाता है कि 16 मई 2026 को विद्यालय में प्रधानाध्यापक के बिना सूचना अनुपस्थित रहने, वित्तीय अनियमितताओं, इको क्लब और एमडीएम सहित कई मुद्दों को लेकर खबर प्रकाशित हुई थी।

मामला सामने आने के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी सचिन कुमार ने जांच कराने और तथ्यों की पुष्टि होने पर नियमानुसार कार्रवाई का आश्वासन दिया था।

उस समय उम्मीद थी कि विभाग तत्काल जांच कराकर मामले का निस्तारण करेगा, लेकिन बाद की घटनाओं ने जांच प्रक्रिया की गति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए।

7 जुलाई को समय से पहले बंद मिला विद्यालय

मामले में नया मोड़ तब आया जब 7 जुलाई 2026 को विद्यालय निर्धारित समय से पहले बंद मिलने और शिक्षकों के अनुपस्थित होने की बात सामने आई।

विद्यालय संचालन को लेकर उठे इस सवाल के बाद एक बार फिर मामला चर्चा में आया। समाचार प्रकाशन और अधिकारियों से संपर्क के बाद बताया गया कि मामले की जांच के लिए दो सदस्यीय टीम गठित की गई है।

इस टीम में खंड शिक्षा अधिकारी चकिया अजीत कुमार पाल तथा खंड शिक्षा अधिकारी नियामताबाद मनोज कुमार यादव को शामिल किए जाने की जानकारी दी गई।

14 जुलाई के निरीक्षण में भी सामने आईं कमियां

इसके बाद 14 जुलाई 2026 को खंड शिक्षा अधिकारी शहाबगंज अजय कुमार द्वारा विद्यालय का निरीक्षण किए जाने की जानकारी सामने आई।

शिकायतकर्ताओं के अनुसार निरीक्षण में विद्यालय की साफ-सफाई, वित्तीय अभिलेख, बिल-वाउचर तथा एमडीएम से संबंधित व्यवस्थाओं में कमियां पाई गईं। निरीक्षण की आख्या बीएसए कार्यालय को भेजे जाने की बात भी कही गई।

यदि निरीक्षण आख्या में वास्तव में कमियां दर्ज हैं तो अब यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि विभाग उस रिपोर्ट के आधार पर क्या कदम उठाता है।

स्पष्टीकरण का सिलसिला, लेकिन अंतिम फैसला नहीं

निरीक्षण के बाद प्रधानाध्यापक से स्पष्टीकरण मांगे जाने की बात सामने आई। जानकारी के अनुसार 20 जुलाई 2026 को तीन दिन के भीतर जवाब मांगा गया था।

निर्धारित अवधि में जवाब नहीं मिलने पर 27 जुलाई 2026 को दोबारा स्पष्टीकरण तलब किए जाने की जानकारी सामने आई।

अब सवाल यह है कि यदि विभागीय स्तर पर स्पष्टीकरण मांगा गया है और निरीक्षण में कमियां मिलने की बात अधिकारियों द्वारा कही जा रही है, तो जांच प्रक्रिया का अंतिम निष्कर्ष कब सामने आएगा?

जांच टीम करीब एक महीने बाद विद्यालय पहुंची

इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू जांच टीम के विद्यालय पहुंचने की समय-सीमा को लेकर है।

विभागीय जानकारी के अनुसार जुलाई में दो सदस्यीय जांच टीम गठित की गई थी, जबकि टीम द्वारा विद्यालय का निरीक्षण 5 अगस्त 2026 को किए जाने की बात सामने आई है।

शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि यदि मामला बच्चों की शिक्षा, विद्यालय संचालन और सरकारी योजनाओं से जुड़ा था तो जांच टीम को मौके पर पहुंचने में इतना समय क्यों लगा?

दूसरी ओर विभाग के पास प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के अपने कारण हो सकते हैं। ऐसे में वास्तविक स्थिति विभागीय रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकती है।

क्या जांच से पहले विद्यालय को मिल गई थी सूचना?

शिकायतकर्ताओं की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि जांच टीम के विद्यालय पहुंचने की सूचना पहले से विद्यालय को मिल गई थी। उनका दावा है कि इसके बाद विद्यालय परिसर में साफ-सफाई कराई गई, बच्चों को सतर्क किया गया और सामान्य दिनों में बंद रहने वाली आईसीटी लैब भी खोल दी गई।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

इसलिए इस बिंदु की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है कि जांच टीम के दौरे की सूचना विद्यालय को कब और किस माध्यम से मिली तथा निरीक्षण के दौरान उपलब्ध कराए गए अभिलेख और व्यवस्थाएं वास्तविक स्थिति को दर्शाती थीं या नहीं।

जांच अधिकारियों ने कई बिंदुओं पर कमियां मिलने की बात कही

जांच के बाद खंड शिक्षा अधिकारी अजीत कुमार पाल ने बताया कि जांच में कई बिंदुओं पर अनियमितताएं मिली हैं और विस्तृत रिपोर्ट बेसिक शिक्षा अधिकारी को भेजी जाएगी।

वहीं खंड शिक्षा अधिकारी मनोज कुमार यादव ने भी रसोई सामग्री, बिल-वाउचर और एमडीएम से संबंधित अभिलेखों में कमियां मिलने की बात कही।

यदि दोनों अधिकारियों की रिपोर्ट में कमियां दर्ज होती हैं तो अब विभागीय स्तर पर यह तय करना होगा कि वे कमियां किस प्रकृति की हैं, उनकी जिम्मेदारी किसकी है और उनके लिए क्या कार्रवाई बनती है।

इको क्लब की धनराशि पर भी सवाल

विद्यालय के इको क्लब को लेकर भी शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं।

आरोप है कि पिछले दो वर्षों में इको क्लब के लिए उपलब्ध कराई गई धनराशि के उपयोग और उससे संबंधित कार्यों का स्पष्ट विवरण सामने नहीं आया है।

हालांकि धनराशि के उपयोग में कोई वास्तविक अनियमितता हुई है या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित वित्तीय अभिलेखों, बिलों, वाउचर और विभागीय रिकॉर्ड के परीक्षण के बाद ही किया जा सकता है।

आईसीटी लैब की सामग्री की गुणवत्ता पर भी उठे प्रश्न

विद्यालय की आईसीटी लैब भी शिकायतों के दायरे में है।

शिकायतकर्ताओं ने लैब में खरीदी गई सामग्री की गुणवत्ता, उपयोगिता और खरीद प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। ऐसे मामलों में केवल मौके पर सामान मौजूद होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि खरीद प्रक्रिया, भुगतान, बिल, स्टॉक रजिस्टर और सामग्री की वास्तविक उपयोगिता का परीक्षण भी जरूरी होता है।

यदि विभागीय जांच में कोई कमी सामने आती है तो जिम्मेदारी निर्धारित करने की आवश्यकता होगी।

आंगनबाड़ी अभिलेखों को लेकर भी शिकायत

विद्यालय परिसर से जुड़े आंगनबाड़ी केंद्र के अभिलेखों को लेकर भी शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि कुछ रजिस्टरों का समुचित रखरखाव नहीं किया गया।

इस मामले में भी वास्तविक स्थिति संबंधित रजिस्टरों और अभिलेखों के भौतिक सत्यापन से ही स्पष्ट हो सकती है।

पुरानी शिकायत भी जांच के घेरे में लाने की मांग

शिकायतकर्ताओं के अनुसार 26 नवंबर 2025 को भी विद्यालय निर्धारित समय से पहले बंद मिला था और शिक्षक तथा प्रधानाध्यापक के अनुपस्थित रहने का मामला सामने आया था।

उनका आरोप है कि उस समय भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

यदि यह तथ्य विभागीय रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो वर्तमान जांच में पुराने निरीक्षणों और शिकायतों की स्थिति को भी शामिल किया जाना उपयोगी होगा। इससे यह पता चल सकेगा कि पूर्व में कोई शिकायत हुई थी या नहीं और उस पर क्या कार्रवाई की गई थी।

पत्रकारिता की भूमिका पर भी चर्चा

इस मामले में पत्रकारिता की भूमिका को लेकर भी बहस सामने आई है।

किसी विद्यालय या शिक्षक के खिलाफ शिकायत सामने आने पर पत्रकारिता का दायित्व केवल आरोप प्रकाशित करना ही नहीं, बल्कि संबंधित विभाग और आरोपी पक्ष का पक्ष भी सामने रखना है। इसी प्रकार विभागीय जांच लंबित होने की स्थिति में अंतिम निष्कर्ष आने से पहले किसी आरोप को पूरी तरह सही या गलत घोषित करना भी उचित नहीं माना जा सकता।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य तथ्यों को सामने लाना, सवाल उठाना और संबंधित पक्षों को जवाबदेह बनाना है।

इसी तरह किसी पत्रकार या मीडिया संस्थान पर आर्थिक लाभ लेकर खबर प्रकाशित करने या रोकने जैसे गंभीर आरोप भी बिना ठोस प्रमाण के तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किए जाने चाहिए।

बच्चों की शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा

इस पूरे विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा का है।

विद्यालय में शिक्षकों की उपस्थिति, समय पर विद्यालय खुलना और बंद होना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, एमडीएम की व्यवस्था, साफ-सफाई तथा आवश्यक शैक्षणिक संसाधनों की उपलब्धता सीधे बच्चों के भविष्य से जुड़ी हुई है।

यदि किसी स्तर पर लापरवाही है तो उसका प्रभाव केवल सरकारी रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और उनके अधिकारों पर पड़ता है।

अब जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

अब पूरा मामला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय की ओर देख रहा है। जांच टीम द्वारा निरीक्षण किए जाने और कई बिंदुओं पर कमियां मिलने की बात सामने आने के बाद विभाग के सामने अगली चुनौती जिम्मेदारी निर्धारित करने की है।

क्या जांच रिपोर्ट के आधार पर विभागीय कार्रवाई होगी? क्या वित्तीय अथवा अभिलेखीय अनियमितता पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति से जवाबदेही तय की जाएगी? क्या विद्यालय की व्यवस्थाओं में सुधार के लिए समयबद्ध निर्देश जारी होंगे?

इन सभी सवालों का जवाब विभागीय अंतिम रिपोर्ट और उसके बाद होने वाली कार्रवाई से ही मिलेगा।

क्या इस बार जांच का होगा निष्कर्ष?

कंपोजिट विद्यालय ठेकहां का मामला केवल एक विद्यालय की शिकायत तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सरकारी विद्यालयों में शिकायत मिलने के बाद जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया कितनी समयबद्ध है।

यदि जांच में कमियां पाई जाती हैं तो कार्रवाई में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए और यदि आरोप जांच में गलत पाए जाते हैं तो संबंधित पक्ष को भी स्पष्ट रूप से दोषमुक्त किया जाना चाहिए।

दोनों परिस्थितियों में पारदर्शिता जरूरी है।

जांच से आगे बढ़कर कार्रवाई की जरूरत

कंपोजिट विद्यालय ठेकहां को लेकर लगातार सामने आ रही शिकायतों, विभिन्न निरीक्षणों और स्पष्टीकरण की प्रक्रिया के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अंतिम कार्रवाई कब होगी?

विभागीय अधिकारियों द्वारा जांच में कमियां मिलने की बात कही जा रही है और रिपोर्ट बीएसए कार्यालय को भेजे जाने की प्रक्रिया बताई जा रही है। ऐसे में अब केवल जांच और स्पष्टीकरण तक मामला सीमित रहने के बजाय तथ्यों के आधार पर स्पष्ट निर्णय सामने आना चाहिए।

यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो इसकी भी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

फिलहाल कंपोजिट विद्यालय ठेकहां के मामले में जांच पूरी होने के बाद विभाग क्या फैसला लेता है और क्या जिम्मेदारी तय होती है, इस पर शिक्षकों, अभिभावकों और ग्रामीणों की निगाहें टिकी हुई हैं।

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