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जेन अल्फा के हाथ में तिरंगा, मोदी सरकार के विकास के दावे को कर दिया नँगा

खस्ताहाल स्कूल, टूटी सड़कें, महंगा किराया और जानलेवा रास्ते

  • जेन जी के बाद जेन अल्फा ने शुरू किया अपने हक के लिए संघर्ष
  • सरकारी स्कूलों की बदहाली ने बच्चों को सड़क पर उतरने को मजबूर किया
  • हमीरपुर में तिरंगा लेकर 5-6 किलोमीटर पैदल चले स्कूली बच्चे
  • सिरोंज में छात्राओं ने 5 से बढ़कर 25 रुपए हुए बस किराए पर विधायक से मांगा जवाब
  • विदिशा में खंभों पर कूदकर स्कूल पहुंच रहे थे बच्चे, खबर के बाद स्कूल अपग्रेड
  • पुल टूटा तो उत्तराखंड में नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर बच्चे
  • सोलापुर में स्कूल की छत गिरी, 13 छात्र घायल, झालावाड़ में सात बच्चों की मौत
  • दिव्यांग विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति, ब्रेल शिक्षक, किताब और लैपटॉप की मांग भी अनसुनी

जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, कॉपियां और स्कूल बैग होने चाहिए, उस उम्र में यदि उनके हाथों में तिरंगा और मांगों की तख्तियां दिखाई देने लगें तो इसे केवल एक स्थानीय घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह उस व्यवस्था का आईना है, जो बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी तो लेती है, लेकिन जब बुनियादी सुविधाएं देने की बारी आती है तो बजट, व्यवस्था और जिम्मेदारी के नाम पर बहाने तलाशने लगती है। देश में जेन जी के बाद अब जेन अल्फा भी अपने हक के लिए आवाज उठाने लगी है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड समेत कई राज्यों से सामने आ रही तस्वीरें बताती हैं कि नई पीढ़ी सरकारी स्कूलों की बदहाली, टूटी सड़कों, महंगे परिवहन, पुलों की अनुपलब्धता, जर्जर इमारतों और शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं की कमी को चुपचाप स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। 2010 या उसके बाद जन्म लेने वाली पीढ़ी को सामान्यतः जेनरेशन अल्फा कहा जाता है। यह वह पीढ़ी है जिसका बचपन इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, डिजिटल शिक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में बीत रहा है। तकनीक ने इस पीढ़ी को सूचना तक पहुंच का ऐसा अवसर दिया है, जो पिछली कई पीढ़ियों को उपलब्ध नहीं था। भारत में इस आयु वर्ग की अनुमानित आबादी 32.7 करोड़ से लेकर 41.7 करोड़ तक बताई जाती है। यानी देश की कुल आबादी का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा इसी उम्र वर्ग में आता है। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत के आने वाले दशकों की दिशा तय करने वाली विशाल आबादी है। भारत को दुनिया का सबसे युवा देश होने का गौरव लंबे समय तक मिल सकता है, लेकिन युवा आबादी अपने आप देश की ताकत नहीं बन जाती। उसके लिए अच्छी शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षित स्कूल, प्रशिक्षित शिक्षक, डिजिटल और तकनीकी संसाधन तथा रोजगार के अवसर जरूरी हैं। यदि इन बच्चों को आज जर्जर स्कूल, टूटे रास्ते, महंगा किराया, घटिया भोजन और असुरक्षित भवन मिलेंगे तो कल इसी पीढ़ी से विकसित भारत की उम्मीद करना महज राजनीतिक नारा रह जाएगा। सबसे गंभीर सवाल शिक्षा पर सरकारी खर्च को लेकर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत शिक्षा पर अपनी अर्थव्यवस्था का लगभग 4.1 प्रतिशत खर्च करता है, जबकि यूनेस्को का न्यूनतम मानक चार प्रतिशत बताया जाता है। लेकिन सरकार के कुल खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी घटकर करीब 14.2 प्रतिशत रह गई है, जबकि यूनेस्को की अनुशंसा कम से कम 15 प्रतिशत की है। 2015 में यह हिस्सेदारी 15.7 प्रतिशत थी। यानी 11 वर्षों में शिक्षा पर सरकारी खर्च की प्राथमिकता बढ़ने के बजाय घटती दिखाई देती है। नतीजा जमीन पर साफ दिखाई दे रहा है। कहीं बच्चे दलदल वाली सड़क के खिलाफ तिरंगा लेकर निकल रहे हैं, कहीं छात्राएं 25 रुपये के बस किराये का हिसाब मांग रही हैं, कहीं बच्चे नदी और कंक्रीट के खंभे पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं, तो कहीं स्कूल की छत बच्चों के सिर पर गिर रही है। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उस भविष्य के साथ खिलवाड़ है जिसे देश अपनी सबसे बड़ी ताकत बताता है। अच्छी बात यह है कि जेन अल्फा अब सवाल पूछ रही है। वह डरकर चुप नहीं बैठ रही, वह जानती है कि उसका अधिकार क्या है और वह उसे मांगना भी सीख रही है। यही संघर्ष आने वाले भारत की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक कहानी बन सकता है।

तिरंगा लेकर सड़क पर उतरे बच्चे तो प्रशासन को आया होश

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में स्कूली बच्चों ने खराब और दलदल वाली कच्ची सड़क को पक्का करवाने की मांग को लेकर लगभग पांच से छह किलोमीटर पैदल मार्च किया। बच्चों के हाथों में तिरंगा था और वे जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। यह तस्वीर केवल सड़क की मांग की तस्वीर नहीं थी। यह उस पीढ़ी की आवाज थी, जो यह पूछ रही थी कि स्कूल तक पहुंचने के लिए सुरक्षित रास्ता भी सरकार की जिम्मेदारी है या नहीं।
बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए यदि रोजाना कीचड़, दलदल और खराब रास्ते से गुजरना पड़े तो शिक्षा का अधिकार कागज पर भले मौजूद हो, जमीन पर उसका अर्थ अधूरा रह जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चों को जिलाधिकारी कार्यालय तक पैदल क्यों जाना पड़ा? क्या सड़क की समस्या प्रशासन को पहले से पता नहीं थी? क्या अधिकारियों को कार्रवाई के लिए बच्चों के हाथ में तिरंगा लेकर सड़क पर उतरने का इंतजार था।

पांच रुपये का किराया 25 हुआ तो छात्राओं ने विधायक को घेरा

मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज में बस किराये में बढ़ोतरी के बाद छात्राओं ने विधायक उमाकांत शर्मा से सवाल किया कि वे रोजाना 25 रुपये किराया कैसे देंगी।
छात्राओं का सवाल सीधा था पहले पांच रुपये लगते थे, अब 25 रुपये देने पड़ रहे हैं। गरीब परिवारों से आने वाली छात्राओं के लिए यह मामूली वृद्धि नहीं है। महीने भर का हिसाब लगाया जाए तो यह परिवार के बजट पर अतिरिक्त बोझ बन जाता है। छात्राओं ने यह भी बताया कि उनकी बड़ी बहनें पढ़ाई के लिए सिरोंज से विदिशा, भोपाल और अन्य स्थानों पर जाती हैं और उन्हें पहले ही भारी परिवहन खर्च उठाना पड़ता है। यह विरोध केवल किराये का विरोध नहीं है। यह उस शिक्षा व्यवस्था पर सवाल है जिसमें स्कूल और कॉलेज तक पहुंचने का खर्च ही गरीब परिवार के बच्चे की पढ़ाई रोकने का कारण बन सकता है।

खंभों पर कूदकर स्कूल पहुंचते बच्चे, एक खबर ने बदल दी व्यवस्था

विदिशा के ककरौआ गांव की तस्वीर इससे भी ज्यादा भयावह थी। यहां बच्चे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए बेतवा नदी पर बने चेक-डैम के करीब दस कंक्रीट के खंभों को कूदकर पार करते थे और उसके बाद हाईस्कूल पहुंचते थे। सोचिए, जिस उम्र में बच्चे मैदान में खेलते हुए स्कूल जाना सीखते हैं, उसी उम्र में उन्हें पानी और खंभों के बीच संतुलन बनाकर अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही थी। इस खतरनाक रास्ते का वीडियो सामने आया तो महज एक दिन के भीतर गांव के स्कूल को अपग्रेड कर हाईस्कूल का दर्जा दे दिया गया।
इस घटना ने एक महत्वपूर्ण तथ्य भी साबित किया। यदि मीडिया और सोशल मीडिया जनहित के मुद्दों को मजबूती से सामने लाएं तो प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर किया जा सकता है। दुर्भाग्य यह है कि आज मुख्यधारा के मीडिया का बड़ा हिस्सा जनहित की बुनियादी समस्याओं से दूर होता जा रहा है। लेकिन सोशल मीडिया ने अभी भी ऐसी तस्वीरों के लिए जगह बचा रखी है, जिन्हें दबाया नहीं जा सकता।

उत्तराखंड में पुल बहा, बच्चों की राह आज भी नहीं बनी

विदिशा जैसा ही दृश्य उत्तराखंड के चौबट्टाखाल से सामने आया। यहां बारिश में एक साल पहले बह चुका पुल अब तक नहीं बन सका। नतीजा यह कि बच्चों को नदी के रास्ते स्कूल जाना पड़ रहा है और हर दिन उनकी जान जोखिम में रहती है। सवाल यह नहीं कि पुल कब बहा। सवाल यह है कि एक साल बीत जाने के बाद भी पुल क्यों नहीं बना? यदि किसी बड़े शहर की मुख्य सड़क टूट जाए तो उसकी मरम्मत के लिए प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय हो जाती है। लेकिन गांव के बच्चे नदी पार करके स्कूल जाएं तो क्या वह समस्या छोटी हो जाती है? शिक्षा का अधिकार शहर और गांव के हिसाब से अलग नहीं हो सकता।

स्कूल की छत बनी मौत का खतरा

सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतें बच्चों के लिए शिक्षा के मंदिर के बजाय खतरे का स्थान बनती जा रही हैं।
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के बबलाद गांव में जिला परिषद स्कूल की छत का स्लैब गिरने से 13 छात्र घायल हो गए। इस घटना ने राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव की घटना की याद दिला दी, जहां पिछले वर्ष सरकारी स्कूल की जर्जर छत गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत हो गई थी। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के अमृता खास गांव में भी स्कूल की कक्षा के ऊपर लगी भारी-भरकम टीन की छत गिरने से 12 बच्चे और दो शिक्षिकाएं उसके नीचे दब गए। इन घटनाओं के बाद कुछ दिनों तक जांच, मुआवजा और कार्रवाई की घोषणाएं होती हैं। फिर खबरें पुरानी हो जाती हैं और जर्जर इमारतें वहीं खड़ी रहती हैं। लेकिन बच्चों के लिए स्कूल की छत कोई आंकड़ा नहीं है। वह उनके सिर की सुरक्षा है।

मध्याह्न भोजन में कहीं जला चावल, कहीं रोटी के साथ नमक

मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य साफ था गरीब परिवारों के बच्चों को स्कूल में कम से कम एक पौष्टिक भोजन मिले, उनकी पढ़ाई जारी रहे और भूख उनकी शिक्षा में बाधा न बने। लेकिन समय-समय पर सामने आने वाले वीडियो इस योजना की जमीनी तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कहीं बच्चों को जले और सूखे चावल दिए जाने की तस्वीर सामने आती है तो कहीं रोटी के साथ नमक परोसे जाने का मामला चर्चा में आता है। सबसे पीड़ादायक बात भोजन की गुणवत्ता से भी आगे है। कई स्थानों पर गरीब बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो वे अधिकार नहीं, किसी की कृपा मांगने आए हों। जिस बच्चे को सम्मान के साथ भोजन नहीं दिया जा सकता, उससे देश के भविष्य को सम्मान देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

दिव्यांग बच्चों की आवाज भी व्यवस्था की दीवार से टकरा रही

देहरादून स्थित राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान के मॉडल स्कूल में दृष्टिबाधित छात्र एक सप्ताह से आंदोलन कर रहे हैं। उनकी मांगें किसी विलासिता की नहीं हैं। वे पहले मिलने वाली मेरिट और संस्थागत छात्रवृत्ति फिर शुरू करने, लैपटॉप उपलब्ध कराने, कैंटीन के भोजन की गुणवत्ता सुधारने, प्राथमिक कक्षाओं में ब्रेल शिक्षकों की कमी दूर करने, अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों को समय पर किताबें उपलब्ध कराने और स्किल विषयों के लिए पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति की मांग कर रहे हैं। इन मांगों को सुनकर सवाल उठता है यदि दृष्टिबाधित विद्यार्थी भी अपनी शिक्षा के लिए आंदोलन करने को मजबूर हैं तो समावेशी शिक्षा की सरकारी घोषणाओं का वास्तविक अर्थ क्या है?
दिव्यांग बच्चों को अतिरिक्त सहारे की जरूरत होती है, अतिरिक्त बाधाओं की नहीं।

जेन अल्फा को अब चुप कराना आसान नहीं

जेन अल्फा तकनीक के दौर की पीढ़ी है। वह सूचना के लिए केवल शिक्षक, अभिभावक या सरकारी विज्ञप्ति पर निर्भर नहीं है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, उसके सामने इंटरनेट है और उसके पास घटनाओं को रिकॉर्ड कर दुनिया तक पहुंचाने की क्षमता है। यही कारण है कि गांव का बच्चा भी अब अपनी समस्या को राष्ट्रीय मुद्दा बना सकता है। स्कूल की टूटी छत का वीडियो हो, नदी पार करते बच्चों की तस्वीर हो या भोजन की खराब गुणवत्ता एक वीडियो व्यवस्था की पूरी पोल खोल सकता है। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, लोकतांत्रिक भी है। अब बच्चे पूछ रहे हैं हमारे स्कूल में शिक्षक कहां हैं, रास्ता क्यों नहीं है, पुल कब बनेगा, बस किराया इतना क्यों बढ़ा, किताबें क्यों नहीं मिलीं, छात्रवृत्ति क्यों बंद हुई, भोजन ऐसा क्यों है, स्कूल की छत सुरक्षित क्यों नहीं है। इन सवालों को दबाने के बजाय सरकारों को सुनना होगा। क्योंकि जेन अल्फा केवल भारत की अगली युवा आबादी नहीं है। यही वे बच्चे हैं जो आने वाले वर्षों में देश के मतदाता, कर्मचारी, वैज्ञानिक, डॉक्टर, शिक्षक, उद्यमी और नागरिक बनने वाले हैं। यदि आज उन्हें अच्छी शिक्षा, सुरक्षित स्कूल और सम्मानजनक वातावरण मिलता है तो यही पीढ़ी भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

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