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फ्लॉप हो गई मोदी की हाइड्रोजन ट्रेन, हफ्तेभर में ट्रेन को करना पड़ा मेंटेन

  •  रेल्वे ने पाल लिया सफेद हाथी, अब ट्रेन में नहीं मिल रहे हैं मुसाफिर साथी
  •  17 जुलाई को पीएम मोदी ने किया था ट्रेन का उद्घाटन
  •  विगत सप्ताह मेंटेनेंस के लिए शकूर बस्ती के यार्ड में भेजा
  •  रेल्वे ने बताया तकनीकी गड़बड़ी, अब ठीक होने के बाद चलेगी ट्रेन
  •  किराया सस्ता होने के बावजूद रेल्वे को नहीं मिल रहे हैं मुसाफिर
  •  जितने खर्च में ट्रेन चल रही है, उतने में ट्रैक का विद्युतीकरण हो जाता
  •  हाईड्रोजन तकनीक छोड़ रहे हैं यूरोपीय देश, मोदी सरकार को इसकी सनक पड़ी

नई दिल्ली/जींद। पीएम नरेंद्र मोदी की हाईड्रेजन ट्रेन एक सप्ताह में ही फ्लॉप हो गई है। शुक्रवार को पानीपत ट्रैक पर प्रस्तावित हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल अंतिम समय में स्थगित कर दिया गया। दोपहर बाद हाइड्रोजन ट्रेन को नियमित रखरखाव और तकनीकी निरीक्षण के लिए शकूरबस्ती भेज दिया गया। यहां ट्रेन के हाइड्रोजन सिस्टम, तकनीकी उपकरणों, सुरक्षा मानकों और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सों की जांच की जाएगी। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि नियमित सेवा शुरू करने से पहले सभी जरूरी तकनीकी परीक्षण और रखरखाव कार्य पूरे किए जा रहे हैं, ताकि यात्रियों को सुरक्षित, भरोसेमंद और सुचारु रेल सेवा उपलब्ध कराई जा सके।

 

सस्ता किराया, लेकिन मुसाफिर नहीं

हाइड्रोजन ट्रेन में सोमवार को जींद जंक्शन से दूसरे दिन भी केवल 20 यात्रियों ने सफर किया। जबकि उद्घाटन वाले दिन भी जींद से केवल 20 यात्रियों ने ही हाइड्रोजन ट्रेन में सफर किया था। अभी हाइड्रोजन ट्रेन में बिल्कुल भी भीड़ नहीं हो रही है। हालांकि, रेलवे को आने वाले दिनों में हाइड्रोजन ट्रेन में यात्रियों के बढ़ने की उम्मीद है। ट्रेन में जींद से सोनीपत तक का किराया भी मात्र 25 रुपये है। इससे यात्रियों को समय और पैसे दोनों की बचत है। जींद-सोनीपत रेलवे ट्रैक पर हाइड्रोजन ट्रेन के अलावा तीन पैसेंजर और एक एक्सप्रेस ट्रेन चलती हैं। इस रूट पर पहली पैसेंजर ट्रेन 6.15 बजे जींद जंक्शन से चलती है। उसके बाद सुबह 7:40 बजे हाइड्रोजन ट्रेन सोनीपत के लिए रवाना होती है। यह ट्रेन जींद से सोनीपत के बीच करीब 89 किलोमीटर के रूट पर चलेगी और सबसे खास बात ये है कि इसका किराया सिर्फ 5 रुपये से 25 रुपये के बीच रखा गया है।

हर किलोमीटर पर 8 लीटर पानी पीयेगी

रेलवे के अनुमान के मुताबिक, यह ट्रेन रोजाना दो फेरे लगाएगी और इस दौरान करीब 356 किलोमीटर की दूरी तय करेगी, जिसके लिए रोज लगभग 300 किलोग्राम हाइड्रोजन की जरूरत पड़ेगी। यानी हर एक किलोमीटर के लिए ट्रेन को करीब 0.8 किलोग्राम हाइड्रोजन चाहिए होता है। विज्ञान के हिसाब से 1 किलोग्राम हाइड्रोजन बनाने के लिए लगभग 9 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है, क्योंकि पानी में हाइड्रोजन के मुकाबले ऑक्सीजन का वजन ज्यादा होता है। इस हिसाब से अगर देखा जाए तो हर एक किलोमीटर के सफर के लिए ट्रेन को हाइड्रोजन बनाने में करीब 7 से 8 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इस ट्रेन को बनाने में करीब 82 करोड़ रुपये का खर्च आया है। इसे चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में तैयार किया गया है। 10 कोच वाली यह ट्रेन एक बार में करीब 2,600 यात्रियों को ले जा सकती है और इसकी अधिकतम रफ्तार 75 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है।

35 ट्रेन चलाने का प्लान

आने वाले समय में ऐसी 35 ट्रेन चलाने का प्लान है और उन इलाकों के लिए योजना तैयारी की जा रही है जहां बिजली के केबल बिछाना आसान नहीं है। हाइड्रोजन बनाने वाले इलेक्ट्रोलायजर से एक किलो हाइड्रोजन बनाने में ही 40 से 55 यूनिट बिजली खर्च हो जाती है। इसी तरह एक किलो ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए 8 से 9 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। ये चीजें मिलकर ही हाइड्रोजन की कीमत का उत्पादन बढ़ा देती हैं। वैश्विक स्तर पर देखा जा रहा है कि हाइड्रोजन से ऊर्जा पैदा करने वाले प्रोजेक्ट्स को लेकर उतना उत्साह नहीं है। नेचर एनर्जी की रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल 2026 तक वैश्विक स्तर पर सिर्फ 7 प्रतिशत प्रोजेक्ट ही समय पर हुए। साल 2025 में 50 प्रोजेक्ट कैंसल कर दिए गए थे। कई प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में भी डाले जा चुके हैं। हरियाणा के ही जींद और सोनीपत के बीच चलने वाली यह ट्रेन 89 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। ट्रेन एक ही है और दो ट्रिप पूरी करनी है तो एक दिन में यह ट्रेन 356 किलोमीटर चलेगी। इतना चलने के लिए इसे 300 किलो हाइड्रोजन चाहिए और इस ट्रेन में 440 किलो हाइड्रोजन स्टोर की जा सकती है। 430 किग्रा हाइड्रोजन से 10 डिब्बों की नान एसी ट्रेन 420 किलोमीटर लगातार जा सकती है। मगर जितनी बिजली (24 हजार यूनिट) ख़र्च कर इतना हाइड्रोजन बनाया गया उससे 10 डिब्बों की यही ट्रेन इलेक्ट्रिक ट्रैक पर 1200 किलोमीटर से ज्यादा चल सकती है।

 

इतने खर्च पर तो विद्युतीकरण हो जाता

जींद-सोनीपत के 89 किलोमीटर ब्राड गेज रेल ट्रेक को ओवरहेड इलेक्ट्रिक ट्रैक में बदलने का खर्च 100 से 110 करोड़ रुपए आता। रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण करने में 1.1-1.3 करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर का औसत खर्च माना जाता है। मगर एक डीएमयू को हाइड्रोजन ट्रेन में बदलने पर 112 करोड़ रुपए खर्च आया है। इतने में तो पूरे जींद-सोनीपत रूट का विद्युतीकरण हो जाता।”

महंगी क्यों पड़ती है हाइड्रोजन गैस?

हाइड्रोजन से बिजली बनाना और फिर उससे कुछ भी चलाना महंगा क्योंकि हाइड्रोजन का उत्पादन ही एक खर्चीला काम है। मौजूदा वक्त में काफी काम तो सरकारी सब्सिडी पर ही निर्भर है। जिन देशों में सरकारें अपनी ओर से कोशिश नहीं कर रही हैं, वहां हाइड्रोजन प्रोजेक्ट शुरुआत में ही दम तोड़ दे रहे हैं। हाइड्रोजन गैस को कई तरीकों से बनाया जा सकता है लेकिन सबसे लोकप्रिय सिस्टम इलेक्ट्रोलिसिस का है। इसमें इलेक्ट्रोलाइजर का इस्तेमाल होता है जिसमें बिजली के जरिए पानी में से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग किया जाता है। हाइड्रोजन भी तीन तरह की होती है- ग्रे हाइड्रोजन, ब्लू हाइड्रोजन और ग्रीन हाइड्रोजन। पानी से बनाई जाने वाली हाइड्रोजन को ग्रीन हाइड्रोजन कहते हैं और इसमें कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं होता। वहीं, ग्रे हाइड्रोजन में भारी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो सीधे हवा में घुल जाती है। वहीं, ब्लू हाइड्रोजन बनाने से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड को जमीन में दबा दिया जाता है। इस तरह सबसे साफ हाइड्रोजन ग्रीन हाइड्रोजन है, इसीलिए यही सबसे महंगी भी होती है। अब भारत में ग्रीन हाइड्रोजन से ही ट्रेन और कारें चलाने की योजना है इसलिए यह काम खर्चीला होने वाला है। इसकी वजह है इलेक्ट्रोलाइजर को चलाने के लिए खर्च होने वाली बिजली और उसकी बढ़ती कीमत। मोटे तौर पर देखें तो हाइड्रोजन बनाने वाले इलेक्ट्रोलायजर से एक किलो हाइड्रोजन बनाने में ही 40 से 55 यूनिट बिजली खर्च हो जाती है। इसी तरह एक किलो ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए 8 से 9 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। ये चीजें मिलकर ही हाइड्रोजन की कीमत का उत्पादन बढ़ा देती हैं।

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