
- पाकिस्तान ने अमेरिकी प्रभारी राजदूत को तलब कर दर्ज कराया विरोध
- ट्रंप के ‘ऑपरेशन सिंदूर रुकवाने’ के दावे के बीच गोर का बयान
- कश्मीर पर अमेरिका की पुरानी भाषा से कितना अलग है नया रुख
- भारत को बयान पर जश्न नहीं, वॉशिंगटन की अगली चाल पर नजर रखनी होगी
- दिल्ली और इस्लामाबाद में राजनयिक परिसरों की सुरक्षा पर ‘जैसे को तैसा’
- जम्मू-कश्मीर के लिए अमेरिकी यात्रा चेतावनी में ढील के संकेत
- क्या अमेरिका पाकिस्तान से दूरी और भारत के करीब आने की नई रणनीति बना रहा है?
जम्मू-कश्मीर को लेकर अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए विशेष दूत सर्जियो गोर का बयान महज कुछ शब्दों का बयान नहीं है। गोर ने जम्मू-कश्मीर की अपनी पहली यात्रा के दौरान इसे ‘भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा’ बताया। तथ्य की दृष्टि से देखें तो इसमें नया कुछ नहीं है। भारत लंबे समय से जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग बताता रहा है और पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से समेत पूरे जम्मू-कश्मीर पर अपने दावे को स्पष्ट करता रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कई बार क्या कहा गया से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि किसने, कब और किस परिस्थिति में कहा। सर्जियो गोर के बयान ने इसी वजह से नई बहस को जन्म दिया है। यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत-पाकिस्तान संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिये पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र में आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाया था। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार यह दावा किया कि उनके हस्तक्षेप से भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य कार्रवाई रुकी। पाकिस्तान ने ट्रंप की भूमिका के लिए सार्वजनिक रूप से आभार भी जताया, जबकि भारत ने लगातार यह स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर किसी तीसरे देश के दबाव में बंद नहीं किया गया।
यहीं से सर्जियो गोर के बयान की राजनीतिक और कूटनीतिक अहमियत बढ़ जाती है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत-पाकिस्तान के बीच कथित मध्यस्थता का दावा करते रहे हैं, दूसरी ओर उन्हीं के प्रशासन का एक वरिष्ठ राजनयिक जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताता है। यह अंतर केवल शब्दों का अंतर है या अमेरिकी नीति में कोई वास्तविक बदलाव आकार ले रहा है, यही सबसे बड़ा सवाल है।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। इस्लामाबाद ने अमेरिकी प्रभारी राजदूत नताली बेकर को तलब कर सर्जियो गोर के बयान पर अपना विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान के लिए जम्मू-कश्मीर का प्रश्न केवल सीमा विवाद नहीं, बल्कि उसकी विदेश नीति का केंद्रीय मुद्दा रहा है। इसलिए अमेरिका के किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा जम्मू-कश्मीर को सीधे भारत का हिस्सा बताना इस्लामाबाद के लिए स्वाभाविक रूप से असहज करने वाला है।
असली परीक्षा सर्जियो गोर के एक बयान की नहीं, बल्कि वॉशिंगटन की निरंतरता की होगी। यदि अमेरिका आगे भी जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने की यही स्पष्ट भाषा अपनाता है, पाकिस्तान पर आतंकवाद को लेकर दबाव बनाता है और कश्मीर पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की अपनी पुरानी भाषा से पीछे हटता है, तब इसे अमेरिकी नीति में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा सकता है। लेकिन यदि दिल्ली में एक भाषा और इस्लामाबाद में दूसरी भाषा सामने आती है, तो भारत को ऐसे बयानों से उत्साहित होने के बजाय उन्हें कूटनीतिक बयानबाजी के दायरे में ही रखना होगा।

गोर का बयान, पाकिस्तान की बेचैनी
सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर दौरा कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत में अमेरिकी राजदूत के रूप में उनकी यह पहली यात्रा थी और इसी दौरान जम्मू-कश्मीर को भारत का ‘एक महत्वपूर्ण हिस्सा’ बताया गया। बयान की भाषा सीधी थी और उसमें न तो किसी जनमत-संग्रह का उल्लेख था, न ‘कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं’ जैसी पारंपरिक अमेरिकी कूटनीतिक भाषा। यही बदलाव पाकिस्तान को सबसे ज्यादा खटक रहा है। पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विवादित विषय के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। उसकी कोशिश रही है कि कश्मीर को भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय विवाद के बजाय अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के रूप में स्थापित किया जाए। ऐसे में अमेरिका जैसे प्रभावशाली देश के वरिष्ठ अधिकारी का बयान उसके कूटनीतिक नैरेटिव के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। इस्लामाबाद ने अमेरिकी प्रभारी राजदूत नताली बेकर को तलब कर विरोध दर्ज कराया। यह कदम बताता है कि पाकिस्तान ने बयान को सामान्य टिप्पणी मानकर नजरअंदाज नहीं किया है। लेकिन यहां भारत को भी सावधान रहने की जरूरत है।
ट्रंप के दावों की छाया में आया बयान
सर्जियो गोर का बयान उस समय आया है जब डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव को रोकने में भूमिका निभाई। ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप की ओर से इस तरह के दावे कई बार किए गए। पाकिस्तान ने ट्रंप की भूमिका का स्वागत किया और उन्हें धन्यवाद भी दिया। भारत ने हालांकि यह स्वीकार नहीं किया कि ऑपरेशन सिंदूर किसी बाहरी दबाव में रोका गया। यही वह बिंदु है जहां अमेरिकी नीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। यदि एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति भारत-पाकिस्तान के बीच अपनी मध्यस्थ भूमिका को रेखांकित करते हैं और दूसरी ओर अमेरिकी राजदूत जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हैं, तो इन दोनों संदेशों को एक साथ समझना जरूरी होगा। भारत के लिए समस्या यह नहीं कि अमेरिका ने जम्मू-कश्मीर पर क्या कहा। समस्या यह है कि भविष्य में अमेरिका क्या करेगा।
भाजपा का उत्साह और सावधानी की जरूरत
सर्जियो गोर के बयान के बाद भाजपा ने इसे स्पष्ट संदेश के रूप में पेश किया। पार्टी की ओर से सोशल मीडिया पर कहा गया कि गोर ने जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है और यह संदेश जमीन पर स्वीकार किया गया है तथा दुनिया ने भी इसे मान्यता दी है। राजनीतिक दृष्टि से यह बयान भाजपा के लिए स्वाभाविक रूप से उत्साह पैदा करने वाला है। लेकिन विदेश नीति के स्तर पर थोड़ी अधिक सावधानी उपयोगी होती। भारत का जम्मू-कश्मीर पर दावा किसी अमेरिकी अधिकारी के बयान पर निर्भर नहीं है। भारत की संवैधानिक, राजनीतिक और कूटनीतिक स्थिति दशकों से स्पष्ट रही है। इसलिए किसी अमेरिकी राजनयिक के बयान को भारत की संप्रभुता की बाहरी ‘मान्यता’ के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से भी अनावश्यक है। बेहतर प्रतिक्रिया यह होती कि जो बात भारत दशकों से कहता आया है, वही बात अमेरिकी राजनयिक ने कही है। इससे भारत का आत्मविश्वास भी दिखाई देता और किसी बाहरी प्रमाणपत्र की जरूरत का संदेश भी नहीं जाता।
कश्मीर पर अमेरिका की पुरानी भाषा बनाम नया सुर
कश्मीर के सवाल पर अमेरिकी नीति में कई बार ऐसी भाषा इस्तेमाल हुई है जिसमें ‘कश्मीरी लोगों की इच्छाओं’ और भारत-पाकिस्तान संवाद का उल्लेख रहा है। पाकिस्तान ने इसे अपने पक्ष में देखा, जबकि भारत ने तीसरे पक्ष की भूमिका को लगातार अस्वीकार किया।
डोनाल्ड ट्रंप भी अपने पहले कार्यकाल और उसके बाद कई मौकों पर भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं। ऐसे में सर्जियो गोर की वर्तमान टिप्पणी को अमेरिकी नीति के व्यापक संदर्भ में देखना आवश्यक है। यदि वॉशिंगटन अब यह मानकर चलता है कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है और भारत-पाकिस्तान के बीच विवादों का समाधान दोनों देशों को ही करना है, तो यह उसकी भाषा में महत्वपूर्ण बदलाव होगा।
दिल्ली-इस्लामाबाद में ‘जैसे को तैसा’
भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव का एक नया संकेत दोनों देशों के राजनयिक परिसरों की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव से मिला है। इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर सुरक्षा बैरिकेड हटाए गए। इसके बाद नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के बाहर भी सुरक्षा बैरिकेड, ट्रैफिक बोलार्ड और कतार नियंत्रित करने वाले ढांचे हटाए गए। इसे दोनों देशों की ओर से ‘जैसे को तैसा’ प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनयिक परिसरों की सुरक्षा से जुड़े कदम सामान्य प्रशासनिक फैसले नहीं होते।
पाकिस्तान की अंदरूनी कमजोरी और बाहरी रणनीति
पाकिस्तान के लिए कश्मीर का प्रश्न केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। वहां की राजनीति, सेना और राष्ट्रीय विमर्श में कश्मीर की भूमिका गहरी रही है। वर्तमान परिस्थितियों में पाकिस्तान के सामने आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी अनेक चुनौतियां हैं। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच शक्ति संतुलन को लेकर भी लगातार चर्चा होती रही है। डोनाल्ड ट्रंप की ओर से पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की सार्वजनिक प्रशंसा ने भी भारत में सवाल पैदा किए हैं।
अमेरिका की असली परीक्षा अब होगी
सर्जियो गोर का बयान महत्वपूर्ण है, लेकिन निर्णायक नहीं। अमेरिका की असली परीक्षा अब यह होगी कि वह आने वाले दिनों और महीनों में भारत तथा पाकिस्तान के साथ किस भाषा में संवाद करता है। क्या वॉशिंगटन पाकिस्तान से आतंकवाद के मुद्दे पर स्पष्ट बात करेगा,
क्या कश्मीर पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का पुराना प्रस्ताव पीछे छूट जाएगा। अमेरिकी प्रशासन भारत-पाकिस्तान संबंधों को केवल द्विपक्षीय मामला मानेगा। क्या पाकिस्तान के साथ बातचीत में भी जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने वाली वही भाषा इस्तेमाल होगी।
यात्रा चेतावनी में ढील से कश्मीर को राहत
सर्जियो गोर ने जम्मू-कश्मीर में अमेरिकी नागरिकों के लिए जारी यात्रा चेतावनी की समीक्षा के संकेत भी दिए हैं। पहलगाम हमले के बाद अमेरिकी नागरिकों को जम्मू-कश्मीर की यात्रा से बचने की सलाह दी गई थी।
यदि वॉशिंगटन इस चेतावनी को कम करता है तो इसका सीधा सकारात्मक असर जम्मू-कश्मीर के पर्यटन क्षेत्र पर पड़ सकता है। विदेशी पर्यटकों के लिए किसी देश की यात्रा चेतावनी सुरक्षा की धारणा को प्रभावित करती है। इसलिए अमेरिकी एडवाइजरी में ढील एक सकारात्मक संकेत मानी जा सकती है।



