यूपी के डिप्टी सीएम केशव मौर्य का मदरसों पर दिए आपत्तिजनक बयान,बेहद घिनौना ये इंसान
मदरसों को आतंक की फैक्ट्री बताकर केशव मौर्य ने खोला सांप्रदायिक राजनीति का मोर्चा

- अगर मदरसों में आतंकवादी बनते हैं तो 12 साल से केंद्र और यूपी की जांच एजेंसियां क्या कर रही
- मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने वाले बयान पर उठे गंभीर सवाल
- सीबीआई, आईबी और रॉ की विश्वसनीयता पर भी खड़ा हुआ प्रश्नचिह्न
- मौर्य बताएं यूपी में कितने मदरसों से आतंकवादी पकड़े गए
- अगले विधानसभा चुनाव से पहले फिर क्यों गरमाया अल्पसंख्यक विरोधी विमर्श
- मदरसों में कामिल-फाजिल पाठ्यक्रम बंद करने की तैयारी के बीच बयान से बढ़ा विवाद
- 2024 में यूपी में भाजपा को लगा था बड़ा चुनावी झटका
- मंदिरों के चढ़ावे और कथित अनियमितताओं पर विपक्ष के सवालों से बच रही सत्ता
- नई पीढ़ी रोजगार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था पर जवाब मांग रही है, नफरत पर नहीं
- जंतर-मंतर के सवालों से भागकर मदरसे की तरफ मोड़ दी राजनीति

देश में बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और शिक्षा व्यवस्था जैसे सवाल लगातार युवाओं के सामने खड़े हैं। जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन ने केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग नहीं उठाई, बल्कि उस व्यापक असंतोष को भी सामने रखा, जो युवाओं के भीतर व्यवस्था को लेकर पैदा हो रहा है। आंदोलन में सरकार, मीडिया, बेरोजगारी, महंगाई, मणिपुर की स्थिति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों पर भी सवाल उठे। इससे यह संकेत मिला कि नई पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक विमर्श को केवल हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने के बजाय शिक्षा, रोजगार और भविष्य के सवालों से जोड़कर देखना चाहता है। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का मदरसों को लेकर दिया गया कथित बयान राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। मौर्य ने कहा कि मदरसे चाहे बांग्लादेश के हों, पाकिस्तान के हों या भारत के, वे अघोषित रूप से आतंकवाद पैदा करते हैं। बयान सामने आते ही राजनीतिक विवाद तेज हो गया और हिंदूवादी संगठनों की ओर से समर्थन भी सामने आया। सवाल यह है कि क्या किसी पूरे शैक्षणिक-सामाजिक संस्थान को बिना ठोस आंकड़े और आधिकारिक जांच के आतंकवाद से जोड़ देना जिम्मेदार राजनीतिक बयान माना जा सकता है। भारत के मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने का दावा किया जा रहा है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि पिछले वर्षों में केंद्र और राज्य की सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों ने इस संबंध में क्या ठोस कार्रवाई की। कितने मदरसों की पहचान आतंकवादी गतिविधियों के केंद्र के रूप में हुई। कितने मामलों में आरोप सिद्ध हुए, कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया और कितने मामलों में अदालतों ने दोष साबित किया, यदि ऐसे आंकड़े मौजूद हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि आंकड़े मौजूद नहीं हैं तो फिर इस तरह का व्यापक आरोप किस आधार पर लगाया गया। यही वह बिंदु है जहां मौर्य के बयान को लेकर राजनीतिक मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। ऐसे माहौल में शिक्षा और रोजगार जैसे कठिन सवालों के बजाय धार्मिक ध्रुवीकरण का मुद्दा उठाना क्या पुराने चुनावी फार्मूले की वापसी नहीं है? भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। 80 लोकसभा सीटों वाले प्रदेश में भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई, जबकि समाजवादी पार्टी को 37 और कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। अयोध्या की फैजाबाद सीट का परिणाम भी भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश था। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी कांग्रेस के अजय राय से मुकाबले में अपेक्षाकृत कड़ी चुनौती मिली। ऐसे परिणामों के बाद यदि पार्टी के भीतर राजनीतिक चिंता है तो उसका समाधान जनता के वास्तविक सवालों का जवाब देना होना चाहिए, न कि मदरसों को आतंकवाद से जोड़कर नया विवाद खड़ा करना। नई पीढ़ी पूछ रही है नौकरी कब मिलेगी, परीक्षा निष्पक्ष कब होगी, पेपर लीक कब रुकेगा और शिक्षा व्यवस्था कब सुधरेगी? इन सवालों का उत्तर धार्मिक ध्रुवीकरण से नहीं दिया जा सकता।

आंकड़े हैं तो सामने रखिए, आरोप हैं तो वापस लीजिए
मौर्य के बयान का सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण आंकड़ों की कसौटी पर होना चाहिए। यदि भारत के मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने के पीछे सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट है तो उसे सार्वजनिक विमर्श में लाया जाना चाहिए। केवल राजनीतिक मंच से किसी समुदाय से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों पर गंभीर आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। मौर्य यदि दावा करते हैं कि मदरसे आतंकवाद पैदा करते हैं तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में कितने मदरसों को इस आधार पर चिन्हित किया गया। कितने लोगों के विरुद्ध मुकदमे दर्ज हुए, कितने मामलों में आतंकवाद से संबंधित आरोप सिद्ध हुए, कितने मदरसों के खिलाफ कार्रवाई हुई।
सीबीआई-आईबी-रॉ की चुप्पी पर सवाल
मदरसों को आतंकवाद से जोड़ना सामान्य आरोप नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर दावा है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि देश की प्रमुख जांच एवं खुफिया एजेंसियों ने अब तक ऐसी कोई व्यापक आधिकारिक तस्वीर क्यों नहीं रखी। यदि किसी विशेष मदरसे या संस्था से आतंकवादी गतिविधियों का संबंध मिलता है तो कानून अपना काम करे। लेकिन किसी पूरी शिक्षा व्यवस्था को ही आतंकवाद से जोड़ देना अलग बात है। मौर्य को चाहिए कि वे राजनीतिक बयान से आगे बढ़कर प्रमाण दें। क्योंकि आतंकवाद का मुकाबला आरोपों से नहीं, खुफिया सूचना, जांच, साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया से होता है।
मदरसा कानून में बदलाव और बयान का समय बना सवाल
उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम, 2004 में संशोधन को लेकर भी राजनीतिक बहस चल रही है। प्रस्तावित बदलावों के तहत कामिल और फाजिल जैसे उच्च शिक्षा स्तर के पाठ्यक्रमों को बंद करने और मदरसा शिक्षा को 12वीं स्तर तक सीमित करने की चर्चा है। ऐसे समय में मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने वाला बयान स्वाभाविक रूप से और अधिक राजनीतिक महत्व हासिल करता है। सवाल उठता है कि क्या शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर किए जा रहे बदलाव को सांप्रदायिक विमर्श के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है। सरकार का उद्देश्य केवल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना है तो चर्चा पाठ्यक्रम, शिक्षक, आधुनिक विषय, रोजगार और उच्च शिक्षा के अवसरों पर होनी चाहिए। किसी संस्था को आतंकवाद से जोड़ना इस बहस को पूरी तरह दूसरी दिशा में ले जाता है।
चुनावी डर का इलाज सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं
2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा के सामने कई कठिन सवाल खड़े किए। राम मंदिर निर्माण के बाद भी अयोध्या की फैजाबाद सीट भाजपा के हाथ से निकलना महज एक चुनावी परिणाम नहीं था, बल्कि मतदाताओं के बदलते राजनीतिक व्यवहार का संकेत भी माना गया। वाराणसी में पीएम मोदी की जीत जरूर हुई, लेकिन विपक्ष ने मुकाबले को काफी चुनौतीपूर्ण बना दिया। ऐसे परिणामों के बाद यह मान लेना कि चुनाव केवल धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे जीते जा सकते हैं, जोखिम भरी राजनीतिक सोच होगी।
नई पीढ़ी का मतदाता सोशल मीडिया, डिजिटल सूचना और प्रत्यक्ष राजनीतिक बहस के दौर में जी रहा है।
युवाओं का सवाल नौकरी या नया विवाद
जंतर-मंतर पर छात्रों की नाराजगी का मूल प्रश्न शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था था। पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और रोजगार जैसे सवाल सीधे युवाओं के भविष्य से जुड़े हैं। युवा यदि सरकार से रोजगार मांगता है और जवाब में उसे मदरसा, मंदिर और हिंदू-मुस्लिम की बहस में उलझा दिया जाए तो इससे उसकी मूल समस्या समाप्त नहीं होती। युवाओं को परीक्षा में पारदर्शिता चाहिए। उन्हें समय पर भर्ती चाहिए। उन्हें रोजगार चाहिए। उन्हें महंगाई से राहत चाहिए। इन सवालों का समाधान धार्मिक विवादों में नहीं है।
मंदिर के चढ़ावे पर सवाल तो मदरसों पर आरोप क्यों
मदरसों के हिसाब-किताब की बात करना सरकार का अधिकार है। यदि कहीं आर्थिक अनियमितता है तो जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन यही कसौटी धार्मिक स्थलों और मंदिरों पर भी लागू होनी चाहिए। राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे और कथित चोरी के आरोपों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। संसद में भी इसे लेकर राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप देखने को मिले हैं। यदि किसी धार्मिक संस्था के आर्थिक प्रबंधन पर सवाल उठते हैं तो जांच की मांग को भी समान दृष्टि से देखा जाना चाहिए। कानून चाहिए तो सबके लिए चाहिए और जांच चाहिए तो बिना धार्मिक भेदभाव के होनी चाहिए।
विरोध की आवाज को आतंकवाद कहना खतरनाक प्रवृत्ति
राजनीतिक विमर्श में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों को कभी देशद्रोही, कभी अराजक और कभी आतंकवादी जैसे विशेषणों से संबोधित करने की राजनीति लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करती है।
यदि पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने वाला छात्र आतंकवादी है, यदि सरकार से सवाल पूछने वाला व्यक्ति देशविरोधी है और यदि किसी नीति का विरोध करने वाला नागरिक राष्ट्र का दुश्मन है, तो फिर लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह कहां बचेगी। सत्ता की मजबूती विपक्ष की आवाज दबाने में नहीं, बल्कि सवालों का जवाब देने में होती है।
मौर्य के बयान से भाजपा को ही करना होगा आत्ममंथन
केशव प्रसाद मौर्य का बयान भाजपा के लिए केवल विपक्षी हमला झेलने का कारण नहीं होना चाहिए। इसे पार्टी के भीतर आत्ममंथन का अवसर भी बनना चाहिए।
यदि जनता के सामने रोजगार, शिक्षा, महंगाई और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे हैं तो सरकार को उन्हीं मुद्दों पर जवाब देना चाहिए। यदि मदरसों में कोई अनियमितता है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई हो। यदि कोई संस्था आतंकवाद में शामिल है तो उसके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई हो। लेकिन किसी व्यापक समुदाय की शिक्षा व्यवस्था को ही आतंकवाद से जोड़ देना समस्या का समाधान नहीं है। राजनीति में डर दिखाई देने लगे तो सबसे पहले भाषा बदलती है। मुद्दों के जवाब देने के बजाय विरोधियों की पहचान पर हमला शुरू होता है। लेकिन मतदाता अब केवल भाषण नहीं सुनता, वह परिणाम भी देखता है। उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की आहट के बीच असली संघर्ष यही है। चुनाव रोजगार, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और विकास के सवालों पर लड़ा जाएगा या फिर एक बार फिर हिंदू-मुस्लिम के पुराने हथियार को धार दी जाएगी। केशव प्रसाद मौर्य का बयान इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है। मदरसों की जांच करनी है तो कीजिए, जहां अपराध मिले, कार्रवाई कीजिए। जहां आतंकवाद का प्रमाण मिले, कानून का शिकंजा कसिए। लेकिन प्रमाण के बिना पूरे संस्थान को आतंकवाद से जोड़कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करेगी। क्योंकि अब सवाल केवल मदरसों का नहीं है। सवाल यह है कि सत्ता जनता के असली सवालों से मुकाबला करेगी या फिर हर बार एक नया सांप्रदायिक दुश्मन खड़ा करके चुनावी संघर्ष को आसान बनाने की कोशिश करेगी। जंतर-मंतर की आवाज का सबसे बड़ा संदेश भी यही था। नई पीढ़ी से उसके भविष्य का सवाल पूछिए, उसके धर्म का नहीं।




